बच्चों की मौत के बाद भी नहीं जागे स्कूल प्रबंधन और प्रशासन अब भी टैक्सियों में ढोये जा रहे बच्चेए सुरक्षा नियमों को ठेंगा

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26-APR-4 (1)

झाँसी। हादसे से सबक न तो स्कूल प्रबंधन ने लिया है और न ही प्रशासन इसकी गंभीरता को समझ पाया है। भले ही गुरुवार की सुबह कुशीनगर के पास स्कूली वैन से हुए हादसे के बाद यहां का प्रशासन सोता नजर आया है। हादसे की जानकारी मिलने के बाद अभिभावक अपने बच्चों को फिर से सुरक्षा नियमों को पूरा न करने वाले वाहनों में भेजते नजर आए।
बच्चों को स्कूल पहुंचाने वाली गाड़ियों की कमी की वजह से चांदी कूट रहे टैक्सी चालक सुरक्षा उपकरणों की परवाह किए बगैर बच्चों को स्कूल पहुंचाने और उन्हें घर छोड़ने में मशगूल हैं। ज्यादातर स्कूलों के बच्चे मारुति कारों व आपे में लादकर लाए.ले जाए जा रहे हैं। इनमें से कई गाड़ियां ऐसी हैं जो टैक्सी परमिट पर चलने के बाद अपनी निर्धारित अवधि को पूरा कर चुकी हैं। आरटीओ कार्यालय से दोबारा परमिट न बनने की वजह से इनके मालिक इन्हें घरेलू इस्तेमाल में ला रहे हैं। इन गाड़ियों का ज्यादातर इस्तेमाल सुबह बच्चों को स्कूल छोड़ने और दोपहर बाद स्कूल से वापस लाने में हो रहा है।
शहर और आसपास करीब तीन दर्जन निजी हैं। हालांकि स्कूल प्रबंधन ने अपने स्तर पर बसों और छोटी गाड़ियों का प्रबंध किया है। लेकिन बच्चों की संख्या ज्यादा होने से सभी स्कूल परिवहन बंदोबस्त पूरे कर पाने में सक्षम नहीं हैं। ऐसे में इन स्कूलों से बच्चों को टैक्सियों में लाया.ले जाया जा रहा है। बच्चों को टैक्सियों में ठूंस.ठूंस कर भरा जा रहा है।

अभिभावक भी जिम्मेदार

निजी स्कूलों में नियमों के विपरीत बच्चों को ढोने में जुटी टैक्सियों को हवा देने में अभिभावक भी जिम्मेदार हैं। थोड़े पैसे बचाने के लिए बच्चों को भीड़ भरी टैक्सी में भेज रहे हैं। स्कूल प्रबंधन पर अतिरिक्त वाहन चलाने को लेकर दबाव नहीं बनाया जा रहा है। अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रबंधन से अतिरिक्त बस चलाने की मांग नहीं कर पा रहे हैं।

आरटीओ विभाग मौन

आरटीओ विभाग ने स्कूली बैन हादसे के बाद बच्चों को ढो रही गाड़ियों के निरीक्षण में तेजी लाने में दिलचस्पी नजर नहीं आ रही है। इक्का दुक्का एक टैक्सी को जब्तकर अपनी वाहवाही लूट लेते हैं। इस टैक्सी चालक के पास परमिट नहीं था। वह बच्चों को स्कूल छोड़ने के लिए जा रहा था। निरीक्षण के दौरान चालक के पास परमिट नहीं मिला और विभाग ने टैक्सी को कब्जे में ले लिया। यह मुहिम नियमित रूप से नहीं चलती है। बड़ा हादसा होने या शिकायत होने पर ही कार्रवाई शुरू होती है।

स्कूल बस के लिए सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन

सभी स्कूल बस में स्पीड गवर्नर लगे होने चाहिए। किसी भी सूरत में बस की रफ्तार 40 किलो मीटर प्रति घंटा से ज्यादा नहीं हो सकती। चलती बस में बच्चों को खड़ा नहीं होना चाहिए। बच्चे इसका पालन करेंए ये सुनिश्चित करने के लिए स्कूल बस में टीचर का होना अनिवार्य है। बस में तय क्षमता के मुताबिक की छात्र हो सकते हैं। बस में दो इमर्जेंसी दरवाज़े होने चाहिए ताकि आपात स्थिति में अंदर फंसे लोगों को निकालने में आसानी हो। बस में लॉकए फ़ॉयर एक्सटिंग्विशर ;आग बुझाने वाला उपकरणद्ध और फ़र्स्ट ऐड की सुविधा मौजूद होनी चाहिए।

स्कूल के लिए दिशानिर्देश

सुप्रीम कोर्ट की दिशा.निर्देशों के अनुसार स्पीड लिमिट के अलावा भी कई और बाते हैं जिनका पालन स्कूलों को करना चाहिए। हर स्कूल बस का रंग पीले रंग का होना चाहिए। बस के आगे और पीछे जरूर लिखा होना चाहिएए स्कूल ड्यूटी। बस की खिड़कियों पर लोहे के ग्रिल लगे होने चाहिए। बस के पीछे स्कूल का नाम और पता भी लिखा होना चाहिए।

ड्राइवर के लिए नियम

स्कूल बस के ड्राइवर को कम से कम पांच साल का गाड़ी चलाने का अनुभव होना चाहिए। बस के ड्राइवर का शिक्षित होना ज़रूरी है। ड्राइवर हमेशा वर्दी में होना चाहिए और उसकी कमीज़ पर उसका नाम लिखा होना चाहिए। किसी ड्राइवर का अगर ओवर स्पीडिंगए शराब पी कर गाड़ी चलानेए या फिर लेन में गाड़ी न चलाने के लिए चालान किया गया हो तो उसे छह महीने तक स्कूल बस का ड्राइवर नहीं बनाया जा सकताए उसे ऐसा करते पाए जाने पर ड्राइवर को सस्पेंड किया जा सकता है।

अभिभावक स्कूलों पर बनाए दबाव पुलिस

एसपी सिटी देवेश कुमार पांडेय का कहना है कि स्कूलों के पास अपनी गाड़ियां नहीं हैं। स्कूल प्रबंधन निजी गाड़ियों की मदद ले रहे हैं। इसमें अभिभावक भी दोषी हैं। उन्होंने कहा कि जिन गाड़ियों में सेफ्टी उपकरण नहीं हैं उनमें बच्चों को न बैठाएं। उन्होंने कहा कि अभिभावक स्वयं स्कूल प्रबंधन से इस बात की मांग करें कि स्कूल अपनी गाड़ियां लगवाएं। उन्होंने कहा कि इस बारे में बैठक हुई है और पूरे जिले में यह समस्या देखने को मिल रही है।

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