प्रदेश का मुखिया हो सकता है एक बुंदेलखंड का चेहरा

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लखनऊ (विकास शर्मा) भाजपा ने उत्त्तर प्रदेश में 403 में से भारी बहुमत के साथ 325 सीटों पर जीत हासिल की. इस प्रचंड बहुमत के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री कौन , बुंदेलखंड की 19 सीटो पर काबिज भजपा, बुंदेलखंड के स्वतंत्र देव सिंह को यूपी की बागडोर दे सकती है। प्रदेश में एक दम नया चेहरा होगा मुख्यमंत्री स्वतंत्र देव पार्टी में लो प्रोफाइल तरीके से रहने वाले काबिल नेता हैं। पार्टी में उनकी छवि बहुत ही शानदार और साफ है। साथ ही स्वतंत्र देव का संघ से जुड़े है, लेकिन वह खुद को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं समझते हैं। स्वतांत्र देव की काबिलियत उन्हें दूसरे दावेदारों में सबसे आगे खड़ा करती हैं।

swatantradev singhलेकिन इनमें एक चेहरा अनजाना सा भी है, जिसको दौड़ने की जरुरत ही नहीं। फिर भी वे सीएम की रेस में सबसे आगे चल रहे हैं। इनका नाम है स्वतंत्रदेव सिंह। आरएसएस के प्रचारक स्वतंत्रदेव सिंह चेहरे—मोहरे से मोदी जैसे ही दिखते हैं।
पीएम नरेन्द्र मोदी की तमाम रैलियों से पहले वे सबसे पहले उस शहर में डेरा डाल देते थे, जहां पर मोदी की रैली होने जा रही होती थी। सिंह एक कार्यकर्ता से लेकर सबसे पदाधिकारी तक की जिम्मेदारी खुद तय करते थे।

वे सबसे पहले रैली को कामयाब बनाने के लिए अकेले ही निकल पड़ते थे। सोचनीय बात ये है कि वे नेता के नाम पर एक बार एमएलसी बने थे। उनके पास संपत्ति के नाम पर महज दो पहिया वाहन है।

स्वतंत्रदेव सिंह कॉलेज के समय से ही आरएसएस और छात्रसंघ की राजनीति से जुड़ गए थे। आज वे आरएसएस के साथ ही मोदी के भी बेहद करीबी माने जाते हैं। सिंह का नाम आज यूपी के सीएम की रेस में सबसे अधिक प्रमुखता के साथ आगे आया है।

जैसा कि हरियाणा और महाराष्ट्र में भाजपा ने सीएम पद के लिए सबको चौंकाया था, ठीक उसी तरह यूपी के सीएम के लिए भी स्वतंत्रदेव का नाम महज उछाला नहीं गया है, बल्कि प्रबल संभावना है। बताया जाता है कि हालांकि सिंह हमेशा कैमरे की चमक से दूर रहाकर ही पर्दे के पीछे रहकर काम करना पसंद करते हैं। यह बिलकुल संघ के काम करने की शैली जैसा ही है। वर्ष 1986 से आरएसएस से जुड़े स्वतंत्रदेव सिंह उसी अंदाज में काम करते रहे हैं। तब से अब तक 31 साल में केवल एक बार उन्हें पार्टी ने एमएलसी बनाया था।

हालांकि उनको साल 2012 में जालौन की कालपी सीट से टिकट मिला था, लेकिन वे चुनाव हार गए थे। मिर्जापुर निवासी स्वतंत्रदेव सिंह अब वर्तमान निवासी जालौन के उरई में रहते हैं।

यूपी के अधिकांश परिवारों की तरह किसान फैमिली से आने वाले सिंह कुर्मी जाति के जमीनी स्तर के नेता माने जाते हैं। उनके पास एक छोटा सा स्वयं का मकान है, और वाहन के नाम पर महज एक दोपाहिया।

बीजेपी सूत्रों की मानें यूपी चुनावों के प्रचार में उत्तर प्रदेश में मोदी की तमाम सभाओं की जिम्मेदारी स्वतंत्रदेव सिंह के पास ही थी। बताया जाता है कि उनका ग्राउंड लेवल पर काम इतना जोरदार रहा है कि पीएम की रैली के कई दिन पहले ही वे शहर में पहुंचकर काम संभाल लेते थे। बूथ से लेकर विधानसभा स्तर तक के सभी कार्यकर्ताओं व पार्टी पदाधिकारी की जानकारी रखते थे स्वतंत्रदेव सिंह।

उनके बारे में यह भी कहा जाता है कि उनकी बैठक में जाने वाला हर एक पदाधिकारी गजब की तैयारी से जाता था। वे बैठक में किसी से भी पदाधिकारी से बूथ स्तर का सवाल कर लेते हैं। जिस स्तर का कार्यकर्ता, उसको उसी तरह की जिम्मेदारी रैली में सौंपना स्वतंत्रदेव की खास बात रही है।
स्वतंत्रदेव की राजनीतिक पारी

—सबसे पहले साल 1986 में आरएसएस से जुड़े, इसके बाद वे संघ के प्रचारक काम करने लगे।
—वर्ष 1989 में स्वतंत्रदेव अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में संगठन मन्त्री बन गए।
—साल 1991 में बीजेपी में कानपुर से युवा शाखा के पार्टी मोर्चा प्रभारी बने।
—साल 1994 वे बुन्देलखण्ड के बीजेपी युवा मोर्चा के प्रभारी बन गए।
—वर्ष 1996 में उनको युवा मोर्चा का पार्टी का महामन्त्री बना दिया गया।
—साल 1998 में उनको फिर से भाजपा युवा मोर्चा का महामन्त्री बना दिया गया।
—वर्ष 2001 में बीजेपी के युवा मोर्चा में प्रदेश अध्यक्ष बन गए।
—वर्ष 2004 में पहली बार सदन में भेजा गया, जहां वे विधान परिषद के सदस्य चुने गए।
—साल 2004 में स्वतंत्रदेव सिंह प्रदेश महामन्त्री बने।
—वर्ष 2004 से 2014 तक, दस साल में दो बार प्रदेश महामन्त्री बने।
—साल 2010 में यूपी के उपाध्यक्ष बनाए गए।
—वर्ष 2012 से अब तक वे यूपी में पार्टी के महामंत्री बने हुए हैं।

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