MP में भाजपा बदलाब के दौर से गुजर रही है…

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भोपाल : किसी भी कप्तान के लिए रणनीतिक तौर पर यदि सबसे अधिक कुछ अहम रहता है, तो वह है उसकी टीम का चयन। ऐसी टीम, जिसके जरिए वह खुद के सामने आने वाली हर विपरीत परिस्थितियों का मजबूती के साथ सामना कर सके। और ऐसी टीम का चयन करने के प्रक्रिया को उस कप्तान की सबसे बड़ी चुनौती के तौर पर देखा जाता है। मौजूदा वक्त में कुछ इसी तरह की चुनौती से जूझ रहे हैं मध्यप्रदेश भाजपा के मुखिया नंदकुमार सिंह चौहान।

जी हां. भाजपा की नई कार्यकारिणी के गठन को लेकर जिस तरह कयासों और अटकलों का दौर परवान चढ़ता जा रहा है। ठीक उसी तरह व्यक्तिगत तौर पर प्रदेश भाजपा के मुखिया नंदकुमार चौहान की उलझन भी बढ़ती जा रही है। उलझन संगठन से जुड़े सभी नेताओं को साधने की, उलझन सत्ता और संगठन में एक तालमेल स्थापित करने की। उलझन, तमाम बड़े और दिग्गज नेताओं की मंशा के अनुरूप अपनी कार्यकारिणी के विस्तार की।

वैसे तो भाजपा का संविधान नंदकुमार सिंह चौहान को 25 फीसदी से ज्यादा का बदलाव करने के इजाजत नहीं देता, लेकिन इसके इतर चौहान अपनी टीम में एक बड़ा फेरबदल करने के पक्ष में हैं। हालांकि यह बात अलग है, कि इस बदलाव में उन्हे सिर्फ उन कुछेक चेहरों की जगह दूसरे चेहरों को जगह देनी है, जो संगठन में रहते या तो सांसद या विधायक के तौर पर निर्वाचित हो गए या जिन्हे निगम मंडलों में शिफ्ट किया गया है। ऐसी स्थिति में नंदकुमार सिंह चौहान अपनी नई टीम के गठन के गठन को लेकर कितने दबाव में है, इस बात को हम आसानी से समझ सकते हैं।

नंदकुमार सिंह चौहान को दूसरे कार्यकाल मिलने के बाद उनसे अपेक्षाएं बढ़ना भी लाजमी है। फिर चाहे बात कार्यकर्ताओं की करें, या आलाकमान की। या इन सबसे इतर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की। इस बात को हम नकार नहीं सकते, कि नंदकुमार सामने 2018 में होने जा रहे विधानसभा चुनाव का एक बड़ा लक्ष्य है। और इस चुनाव से पहले खुद के द्वारा गढ़े गए संगठन को एक नई पहचान देना भी उनकी अहम जिम्मेदारी है।

गौर हो, कि इस वक्त भाजपा संगठन में पद पाने की दौड़ में सिर्फ उसके पुराने नेता ही नहीं है, बल्कि कई ऐसे चेहरे भी हैं जो अन्य दलों से भाजपा में शामिल हुए हैं। यदि यहां पर चौहान अपनी नई टीम में किसी अन्य दल से भाजपा में आए नेता को जगह देते हैं। तो यह तय है, कि उन्हे खुद की पार्टी के नेता और कार्यकर्ताओं की खिलाफत मोल लेनी पड़ेगी। और यदि ऐसा होता है, तो इसका नुकसान उन्हे और उनके संगठन को किस हद तक उठाना पड़ सकता है, इस बात का अंदाजा हम आसानी के साथ लगा सकते हैं।

संगठन विस्तार की जब बात करें, तो इसे हम सिर्फ पार्टी की रणनीतिक कवायदों तक ही सीमित नहीं रख सकते। यहां पर व्यक्तिगत तौर पर कुछेक नेताओं के हित साधने का मसला भी प्रमुख तौर पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है। क्योंकि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के अलावा ऐसे नेताओं की कमी नहीं है, जिन्होने पर्दे के पीछे रहकर दिल्ली में नंदुकमार के नाम की पैरवी की थी। ऐसे में चौहान को संबंधित नेताओं की अपेक्षाओं का ख्याल रखना भी रखना होगा। और उन अपेक्षाओं का सीधा मतलब हम उनके चहेतों को उपकृत करने के साथ लगा सकते हैं।

पार्टी के सबसे निचले स्तर के कार्यकर्ता का भी ध्यान रखना है, और आलाकमान की उम्मीदों पर भी खरा उतरना है। इस सबके इतर अपनी पार्टी की जमीन की को संभालने के साथ लगातार विस्तार देने की चुनौती का सामना करना है। कुल मिलाकर अपनी नई टीम को लेकर नंदकुमार सिंह चौहान चौतरफा अलग अलग चुनौतियों से घिरे हुए हैं। और इन चुनौतियों का वह कैसे सामना करते हैं यह एक बड़ा और अहम सवाल हैं।

अगर हम भाजपा की पिछली कार्यकारिणी को देखें, तो ऐसे चेहरे निकलकर सामने आते हैं, जिनका चयन पार्टी ने सिर्फ तुष्टिकरण की राजनीति के तहत किया। लेकिन मौजूदा वक्त में नंदकुमार चौहान किसी भी तरह से तुष्टिकरण के पक्ष में नहीं है। और उनकी प्राथमिकता ऐसे नेताओं पर दांव खेलने की है, जो अपने आप में सक्षम हो और जनता के बीच जिनकी पहचान हो। ऐसा नेताओं का चयन चौहान के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। लेकिन हाल ही में सामने आ रही छोटी छोटी चुनौतियों से उबरकर यदि चौहान सशक्त फैसला लेते हैं तो इसका फायदा उन्हे सीधे तौर पर साल 2018 के चुनाव में मिलेगा।

गौर हो, कि इस वक्त भाजपा संगठन में पद पाने की दौड़ में सिर्फ उसके पुराने नेता ही नहीं है, बल्कि कई ऐसे चेहरे भी हैं जो अन्य दलों से भाजपा में शामिल हुए हैं। यदि यहां पर चौहान अपनी नई टीम में किसी अन्य दल से भाजपा में आए नेता को जगह देते हैं। तो यह तय है, कि उन्हे खुद की पार्टी के नेता और कार्यकर्ताओं की खिलाफत मोल लेनी पड़ेगी