मनरेगा घोटाले से पहले खुली पोल

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घोटाले के पहले पकड़ा लाखों का खेल
– कार्ययोजना स्वीकृति के पहले करा लिया टेंडर
– सक्षम अधिकारी को छोड़ दूसरे से कराई तकनीकी स्वीकृति
झाँसी। मनरेगा से कराए जाने वाले एक निर्माण कार्य में घोटाला होते-होते रह गया। ताना बाना ऐसा बुना था कि लाखों के वारे न्यारे हो जाते। पहले तो स्टीमेट मंजूर होने से पूर्व ही टेंडर निकाल दिए। इसमें भी धनराशि का भारी अंतर रखा गया। जांच में जब मामला पकड़ा गया तो भुगतान पर रोक लगाते हुए दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति कर दी गई है।
विकासखंड गुरसरांय की ग्राम पंचायत रजवारा में प्रेमनारायण से दीवान बाबा मंदिर की ओर नाला ड्रेन बनाने के लिए 23.79 लाख रुपये का स्टीमेट तैयार किया गया, जिसकी 9.98 लाख रुपये की सामग्री खरीद के बिल भुगतान के लिए एमआईएस फीडिंग की गई लेकिन श्रमांश पर कोई खर्च नहीं दिखाया गया। मनरेगा में कुल बजट का 60 प्रतिशत श्रमांश पर खर्च करने का प्रावधान है लिहाजा शक गहरा गया। मुख्य विकास अधिकारी अन्नावि दिनेशकुमार ने सहायक परियोजना अधिकारी मनरेगा लोकानंद झा से जांच कराई। उन्होंने विकासखंड में तैनात लेखाकार प्रेमनारायण पाल से दस्तावेज मांगे। जांच में पाया गया कि कार्य की अनुमानित लागत 20.77 लाख रुपये है जबकि प्रशासनिक, तकनीकी व वित्तीय स्वीकृति पत्र पर अनुमानित लागत 23.79 लाख दर्शायी गई। इसमें करीब 3.02 लाख रुपये की गड़बड़ी आंकी गई। यही नहीं स्टीमेट में कहीं भी ग्राम पंचायत तकनीकी सहायक या ब्लॉक तकनीकी सहायक के हस्ताक्षर नहीं पाए गए जबकि शासनादेश के अनुसार प्राक्कलन तकनीकी सहायक द्वारा तैयार किया जाना चाहिए। सात लाख रुपये से अधिक के निर्माण कार्यों का स्टीमेट विकासखंड पर कार्यरत तकनीकी सहायक द्वारा तैयार कराकर तालाब, बंधी, ड्रेन निर्माण की स्वीकृति लघु सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता से प्राप्त की जाना चाहिए, लेकिन ऐसा न कर ग्रामीण अभियंत्रण सेवा के अधिशासी अभियंता से तकनीकी स्वीकृति कराई गई। यह काम वित्तीय वर्ष 2017-18 की कार्ययोजना में लिया गया लेकिन सात जून 2017 को हुई ग्राम सभा की खुली बैठक में किसी भी सदस्य, विकासखंड अधिकारी एवं तकनीकी अधिकारी के हस्ताक्षर कार्यवाही रजिस्टर में नहीं कराए गए।
इससे बड़ा तो खेल यह किया गया कि कार्य से संबंधित टेंडर में ई टेंडरिंग का नियम न अपनाकर बिना तिथि अंकित कराए कुटेशन मांग लिए गए। टेंडर भी नियम विरुद्ध तरीके से केवल एक समाचारपत्र में प्रकाशित किया गया। खास बात यह रही कि टेंडर नौ दिसंबर 2017 को मांगे गए और 2.77 लाख रुपये के कार्य होना दर्शाए गए लेकिन कार्यों की स्वीकृति तीन दिन बार 12 दिसंबर को दी गई। जांच में प्रथम दृष्टया वित्तीय व प्रशासनिक स्वीकृति के बिना अनियमित तरीके से एमआईएस फीडिंग कराने का आरोप सिद्ध हुआ जिस पर बिलों का भुगतान रोकते हुए संबंधित के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की संस्तुति कर दी गई है।

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