21वीं सदी की चकाचौंध में खो गई विरासतें

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महोबा। विरासत चाहे सांस्कृतिक हो या राजनैतिक इतिहास की वस्तु हो गई है। 21वीं सदी के अभ्युदय के साथ इसकी यादें धुंधली होती जा रही है। राजनैतिक परिवार अपनी विरासत नहीं संभाल सके और सांस्कृतिक विरासत पाश्चात्य संस्कृति की चकाचौंध में विलीन होती जा रही है।

सांस्कृतिक क्षेत्र में बुंदेलखंड की लगभग सभी लोक परंपरायें गायन वादन व नृत्य सभी कुछ विलुप्त होता जा रहा है। दरअसल आजाद भारत में पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण को प्रगति या विकास का पर्याय मान लिया गया। वह विधायें जिनकी गूंज पूरे देश में होती थी आज अपना अस्तित्व बचाने को असफल प्रयास मात्र कर रही है। लोक कला और सरकार के सांस्कृतिक विभाग भी इन्हें बचाने के सार्थक प्रयास नहीं कर सका। बुंदेलखंड का दीवाली नृत्य, घट नृत्य, जयपुरा राजघराने का कत्थक एक जमाने में महफिलों की शान माना जाता था। डांस और चलचित्र जगत की अ‌र्द्धनग्न नृत्य संस्कृति ने इन विधाओं को बहुत पीछे ढकेल दिया है। स्थानीय स्तर पर किशोर मंच इन्हें सजाने संवारने का प्रयत्न कर रहा है। मंच के कर्ता धर्ता आचार्य नवल किशोर कहते है कहीं से किसी किस्म का सहयोग न मिलने से यह विधायें सीखने के इच्छुक युवक युवतियां लाचार हो जाते है। वैसे इनकी तमाम शिष्यायें व शिष्य राज्य और राष्ट्र स्तरीय प्रतिस्पर्धा में भाग ले चुके है। कमोवेश यही हालत राजनैतिक विरासत की है। दीवान शत्रुघन सिंह, मन्नीलाल गुरुदेव, स्वामी ब्रम्हानंद पंडित, परमानंद ऐसे नाम है जो स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्र व्यापी ख्याति रखते थे। इनके परिजनों ने उनके विचारों और सिद्धांतों का अनुसरण नहीं किया। यही कारण है कि देश की आजादी के लिये सरवस्व लुटाने वाले इन नेताओं के परिजन आज अपनी पहचान को मोहताज है। दीवन शत्रुघन सिंह के स्वर्गीय पुत्र तेज प्रताप सिंह मात्र एक बार सांसद बन सके। शेष परिवारों के लोग तो गांव स्तर पर भी अपनी पहचान कायम नहीं रख सके।