2017 चुनावी समर : उत्तर प्रदेश में भी महा गठ बंधन की त्यारी ?

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  विकास शर्मा
उत्तरप्रदेश/बुंदेलखंड । यू तो राजनीति एक संभावनाओं का खेल है। इसमें कोई स्थायी अपना पराया नहीं होता। लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार ने बिहार में महागठबंधन करके इसे साबित भी कर दिया। बिहार के चुनावी नतीजों के बाद उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले महागठबंधन की आहट सुनाई देने लगी है।
महागठबंधन के पक्ष, विपक्ष में नेताओं के बयान भी आने लगे हैं। वैसे भी यूपी में दलों का गठबंधन कोई नया नहीं है। पर, महागठबंधन बन पाएगा, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी। हां मगर , महागठबंधन के स्वरूप को लेकर अटकलें जरूर लगाई जाने लगी हैं। लालू-नीतीश की तरह बेमेल कही जाने वाली राजनीतिक संभावनाएं भी इसमें शामिल हैं।
सपा के प्रमुख नेता शिवपाल यादव ने महागठबंधन की दिशा में सकारात्मक सोच की बात रखी तो अखिलेश सरकार के एक मंत्री सपा-बसपा के बीच दोस्ती की दुआ के साथ सामने आ गए। फिलहाल सियासी वजहों से ऐसी आवाज को महत्व मिलने की संभावनाएं तो नहीं बन रहीं, लेकिन चुनाव करीब आने और विरोधियों के पत्ते खुलने पर सियासी दल इस दिशा में आगे बढ़ते दिख सकते हैं। वैसे भी अपने विरोधियों को पछाड़ने के लिए हर दांव आजमाना सियासत का नया अंदाज है, इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह बिहार में तो दिखा ही और यूपी की जमीन भी उससे अलग नहीं है।
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव 2017 में विकास की दम पर प्रदेश में फिर से सपा की सरकार बनने की योजना की तयारी शुरू कर दी है। वही लोग भी इन उम्मीदों को हवा भी देने लगे हैं। यह बात इसलिए भी अहम है क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की अभूतपूर्व जीत के बाद से ही एक आम धारणा-सी बन गई थी कि यूपी में अगली सरकार बीजेपी की ही होगी। नुक्कड़ों से लेकर सियासी हलकों तक में इस चर्चा को वजन मिल रहा था। चुनाव विश्लेषक भी इसी धारणा को पुष्ट करते नजर आते थे, लेकिन बिहार चुनाव के नतीजे ने इस धारणा की नींव हिला दी है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सोच यह है कि अपने कामकाज के बूते अगर नीतीश कुमार सत्ता में वापसी कर सकते हैं तो वे क्यों नहीं? अखिलेश के इस आत्मविश्वास की वजह जहां उनकी पार्टी के प्रमुख सियासी दुश्मन भाजपा की बिहार के चुनाव में करारी हार है, वहीं कहीं न कहीं उन्हें यह भी लगता है कि उन्होंने प्रदेश को विकास की पटरी पर लाकर खड़ा कर दिया है। वैसे कुछ हद तक यह बात सच भी है कि बुनियादी क्षेत्र की कई परियोजनाओं के माध्यम से सपा सरकार ने प्रदेश के विकास की ओर एक मजबूत कदम बढ़ाया है। इसके अलावा कई मामलों में त्वरित और सहज कार्रवाई से अखिलेश यादव अपनी अलग छवि बनाने की ओर भी बढ़ते दिख रहे हैं।
इसके लिए हाल की कुछ घटनाओं का जिक्र जरूरी होगा। ज्यादा पीछे लौटने के बजाय दादरी कांड से ही बात शुरू करते हैं। इस घटना ने बहुत ही तेज गति से सियासी रंग ले लिया। अनायास या सायास ही यह बिहार में चुनावी मुद्दा भी बन गया। भले ही यह प्रदेश सरकार के लिए कानून-व्यवस्था का प्रश्न था, लेकिन बिहार चुनाव में इस मुद्दे की वजह से भाजपा और खुद प्रधानमंत्री भी सीधे तौर पर इसके निशाने पर आ गए। खैर, अखिलेश ने इस मामले में तेजी से कार्रवाई कर और मुआवजे का मरहम लगाकर अपनी सरकार को इसकी आग से बचा लिया। मुजफ्फरनगर दंगे की आग से आहत अखिलेश शायद जान गए हैं कि ऐसी घटनाओं पर उनका शासन प्रभावी नियंत्रण नहीं पा रख पा रहा है, लिहाजा इस तरह की घटनाओं के बाद तेजी से कार्रवाई केजरिये वे अपनी विश्वसनीयता तो कायम कर ही सकते हैं। इसीलिए छोटी से छोटी घटना पर सरकार की ओर से, और खास तौर पर उनकी ओर से त्वरित पहल होती है। लखनऊ की सड़क पर टाइपिंग कर जीवन बसर करने वाले मामूली नागरिक के खिलाफ पुलिसिया दमन की कहानी हो या वाराणसी में तेजाब हमले की शिकार विदेशी युवती का मसला, अखिलेश खुद पहल करते दिखे। इसके लिए उन्हें नंबर जरूर मिलेंगे।
मगर अभी से प्रदेश में महागठबंधन की अलग अलग दलो के बीच तालमेल की सम्भाबनाये और अटकलें लगाई जाने लगी है उम्मीद भी यही होगी कि 2017 में महागठबंधन के लिए बंद कमरो में गुंटरगु होने लगी है।