हिन्दी पर भारी पड़ रही अंग्रेजियत

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ललितपुर- आज फिर हिन्दी दिवस पर लम्बे चौड़े दावे किये जायेंगे, लेकिन अभी भी हिन्दी को भाषाई संक्रमण से मुक्त रहने की अत्यंत आवश्यकता महसूस की जा रही है। एक तरफ जहा सरकारी कार्यालयों में धड़ल्ले से हिन्दी पर अतिक्रमण चल रहा है, वहीं बोलचाल व अन्य कार्यो में भी अंग्रेजियत हावी हो रही है। विद्वानों ने हिन्दी पर हावी अंग्रेजियत को लेकर चिंता जताई।

हिन्दी दिवस की पूर्व सन्ध्या पर आयोजित कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि देश को जब आजादी मिली थी, तब पूरी तरह से अंग्रेजियत हावी थी। जल्दी अंग्रेजियत के संक्रमण से मुक्त हो पाना सम्भव नहीं था, लेकिन अब वह स्थिति नहीं है। इस देश के विभिन्न स्तम्भों में हिन्दी की आवश्यकता महसूस की जा रही है। अभी भी कुछ स्तम्भ अंग्रेजी में लिपिबद्ध है। यह भी तथ्यपूर्ण है कि अंग्रेजी विश्व भाषा है। इसको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता लेकिन हिन्दी इस देश का गौरव है जिसका अस्तित्व पहले होना चाहिए। अंग्रेजी की बाध्यता न हो इस दिशा में मंथन किये जाने की आवश्यकता है। जिस तरह से देशी संस्कृति पर अंग्रेजी संस्कृति हावी हो रही है। इसी तरह का भाषा का भी यह हाल है। कम्पयूटर के अलावा अन्य आधुनिकतम संचार क्षेत्रों में न केवल हिन्दी वरन क्षेत्रीय भाषाओं के भी सॉफ्टवेयर निर्मित कर विभिन्न ग्रन्थों का अनुवाद होना चाहिए। इलैक्ट्रॉनिक युग में पुस्तकालय से आगे बढ़कर ज्ञान का भण्डार अब कम्प्यूटर तक सीमित हो गया है। कम्प्यूटर में भी हिन्दी का महत्व कम नहीं होना चाहिए। एक कम्प्यूटर पर सभी ग्रन्थ पढ़े जा सकें। इसके लिए भी अलग से ध्यान देने की जरूरत है। विश्व में आपूर्तित किये जाने वाले कम्प्यूटर इस देश में भी निर्मित होते है। नये दृष्टिकोण के अनुसार सृजन करना कठिन कार्य नहीं है।

वक्ताओं ने कहा कि संस्कृत में संस्कार निहित है। यह संस्कार हिन्दी के द्वारा ही आगे बढ़ रहे थे, लेकिन अंग्रेजी शब्दों ने भी हिन्दी में घुसपैठ कर उनका मूल माधुर्य दरकाने का कार्य किया है। प्रणाम के स्थान पर हाय हेलो ने स्थान ले लिया है। इसी तरह आम दिनचर्या में भी अंग्रेजियत हावी हो गयी है। यह केवल बोलचाल की भाषा तक ही सीमित नहीं है। वरन, लेखन कार्य में भी इस मिश्रित भाषा का प्रयोग बढ़ रहा है जो हिन्दी के लिए चिंता जनक है। जैन दर्शनाचार्य सुनील जैन बताते है कि असलियत में हिन्दी भाषा और बोली के तौर पर दम तोड़ रही है। विदेशों में भी और अपनी जमीन पर भी जहा जिन्दा है वहा मजबूरी और बदले स्वरूप में। हिन्दी साहित्य के मठाधीशों ने भी इसकी अवनति करने में योगदान देने का कार्य किया है। आज दुनिया भर में बोली जाने वाली भाषाओं में हिन्दी तीसरे नम्बर पर है, लेकिन हिन्दी बोलने वाले व्यक्ति को हेय दृष्टि से देखा जाता है, अंग्रेजी का दबदबा आज भी ज्यादा है। कुछ दिनों पूर्व शिक्षा मंत्री ने भी कहा था कि छात्रों पर जबरदस्ती हिन्दी थोपी नहीं जानी चाहिए। गाधी जी ने भी भारतीय स्कूलों में अंग्रेजी में शिक्षा देने के खिलाफ आवाज उठायी थी। हिन्दी को खतरा बाहर से कम भीतर से ज्यादा है। हिन्दी के सिवा इस देश का अस्तित्व कुछ नहीं हो सकता है लेकिन फिर भी दक्षिणी भाषाविद हिन्दी का विरोध करते रहते है। यही वजह है कि पूरी तौर से हिन्दी इस देश के सभी कार्यो में प्रमुख स्थान हासिल नहीं कर पा रही है। हिन्दी दिवस पर कम से कम हिन्दी को अधिकार मिलना चाहिए। केवल निबन्ध भाषण प्रतियोगिता आयोजित करने से हिन्दी का भला नहीं होगा वरन हिन्दी को कमजोर बनाने वाले तत्वों पर आघात करना होगा तभी हिन्दी न केवल इस देश में वरन विदेशों में भी सम्मान पा सकेगी। पड़ौसी देश नेपाल पूरा नहीं तो आधा भारत पर निर्भर है। इसके बावजूद हिन्दी के प्रति नफरत इतनी है कि नेपाल के उप राष्ट्रपति परमानन्द झा द्वारा हिन्दी में शपथ लेने के विरोध में कार्य पालिका से लेकर न्याय पालिका तक उतर आयी। नेपाल में हार कर भी जीती है हिन्दी, लेकिन इस देश में भी हिन्दी को जिताने का कार्य करना होगा।

पूर्व माध्यमिक विद्यालय मिर्चवारा में शिक्षकों की एक बैठक में राष्ट्रभाषा हिन्दी को राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बताया गया। वक्ताओं ने कहा कि संसार की कोई भी भाषा ऐसी नहीं है जो हिन्दी के समाज सरल व अभिव्यक्त की जाने वाली हो। इस देश के नागरिकों का दायित्व बनता है कि वह हिन्दी का सम्मान करे। हिन्दी का असम्मान करके वह किसी भी देश में सम्मान नहीं पा सकते। महात्मा गाधी ने भी कहा था कि इस देश के बच्चे विदेशी भाषा का बोझ अपने सिर पर न ढोयें और न ही उगती हुई शक्ति का हृास करे।

इस मौके पर एनपीआरसी पंचम लाल, दीपक रजक, गोकुल प्रसाद, अमित श्रीवास्तव, अमित चौधरी, आलोक याज्ञिक, लाल बहादुर आदि उपस्थित थे। अध्यक्षता अरुण गोस्वामी व संचालन मनोज सक्सेना ने किया।

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