हर दिन रोटी की तलाश

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बांदा- अंग्रेजी में ‘हैण्ड टू माउथ’ की कहावत जनपद के दिहाड़ी मजदूरों पर पूरी तरह खरी उतर रही है। जिस दिन काम मिला, उस दिन तो मुंह में निवाला गया और काम नही मिला तो बच्चों के साथ पूरा परिवार फांके का शिकार होता है। घर में बचा खुचा रखा मिला तो खा लिया, नहीं तो पानी पीकर सो गये और दूसरे दिन फिर चल पड़े काम की तलाश पर।

यह नसीब शहर में काम की तलाश में खड़े लगभग हर दिहाड़ी मजदूर का है। मेहनत बेंचने तैयार खड़े यह मजदूर जब काम नही पाते है तो आधे-तिहाई पर मजदूरी करने को राजी हो जाते है। क्योंकि शाम को घर पहुंचने पर उन्हें अपने मासूम बच्चों को जवाब देना होता है। मेहनत बेंचने को लाइन में बैठे कनवारा गांव के श्यामू का कहना है कि काम न मिलने पर घर में चूल्हा नही जलता। सरकार सौ रूपये प्रतिदिन की दिहाड़ी देने की बात तो लागू किए है, लेकिन यहां कोई नही देता। गंछा से राजा ने बताया कि दोपहर तक जब काम करने को कोई लेने नही आता तो 30-40 रूपये में ही काम करने को राजी होना मजबूरी होती है। क्योंकि शाम को घर पहुंचने पर बच्चे यह जरूर देते है कि बापू शहर से क्या लाये हो। कभी-कभी तो खाली हाथ ही लौटना पड़ता है। निम्नीपार मुहल्ले के रामदीन का अलग ही दर्द है। वह भाग्य में यही लिखा मानकर बताता है कि परिवार की रोटी का यही एक साधन है। अगर काम नही मिला तो पानी पीकर काम चलाते है।
रोटी की तलाश में रोजाना मेहनत बेंचने वाले यह मजदूर तो बानगी मात्र है। रामलीला मैदान हो या पीलीकोठी मुहल्ला, दोनों जगह काम के लिए लाइन में बैठे ऐसे मजदूरों की यहां कमी नही है। सरकार ने नरेगा के तहत भले ही सौ दिन का रोजगार देकर काम की गारंटी दी हो मगर इन दांवों की पोल खोलने के लिए यह तस्वीर काफी है।
श्रम प्रवर्तन अधिकारी एस के त्रिपाठी बताते है कि मजदूरों के लिए इस विभाग में ऐसी कोई योजना नही है। जिससे उन्हें रोजगार दिया जा सके। हां इतना जरूर है कि साल भर में मजदूरी न मिलने सम्बंधी 27 शिकायतों में से 24 का निस्तारण कराया है।