हमको भी आइने की जरूरत है

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Post by-{बृजेश निगम}

वैसे हम देश  का चोथा स्तंभ कहलाते है और इस चौथे स्तंभ की सबसे बड़ी जो सकती होती है वो होती रिपोर्टर लेकिन हम इन्ही रिपोर्टर और स्ट्रिन्गेर का दोहन करते रहते है कियू आखिर कियू एक तरफ हम समाज का आइना कहलाते है जो समज को रुपहले परदे पार सचः की तस्वीर दिखता है वही कही न कही खोट हमरी सोच हमारे जर्नलिज्म के समाज मैं है जो हम समाज के लिए आइना तो नहीं काजल जरूर बनते जा रहे है  

हम समाज का आइना है या समाज का काजल 
 बहुत सोचा था की इस छोटी सी  जिन्दगी मै छोटे से समय मै ही एक अच्छी पत्रकारिता करके समाज मै फैली हुयी कुरीतियों को दूर करुगा   मगर जब तक ये बात हम को समझ मै आती तब तक ये बात भी साफ़ हो चुकी थी हम समाज का आइना कहलाने वाले देश के चौथे स्तम्भ के नाम से जाने – जाने वाले हमें – भी एक आइने की जरूरत है जरूरत है हमको उस आइने की जो हमको   हमारा उस आइने मै कड़वा सच दिखा दे

लेकिन हम इसको सौभाग्य कहे या दुर्भाग्य जो ऐसा आइना नहीं बना जो की सच को देखने वालो को ही सच का आइना दिखा सके उस सच का आइना जिस सच को हम जानते हुए भी अंजान बन जाते है और फिर होता है पत्रकारिता के नाम पर दोहन जो नीचे से स्ट्रिन्गेर से लेकर चेनल के उच्च अधिकारी तक करते है मैं ये नहीं कहता ही इस पत्रकारिता के तलब मैं सभी लोग एक से है लेकिन कहावत है की एक मछली सारे तलब को गन्दा कर देती है वही हाल हमारे समाज का हो रहा है

आज के इस आधुनिक युग मै और इस बदलते परिवेश मै सायद इस पत्रकारिता के मायने ही बदल दिए है एक पत्रकार अपने चेनल ,अपने संस्थान को जोखिम उठाकर खबरे लाकर देता है ये बात जग जाहिर है   अगर हम देखे तो किसी भी परिवार  को पालने वाला उसका पिता सामान होता है      मगर जब वो अपनी मेहनत का पैसा मांगता है तो उसका चेनल उस  संतान मुह मोड़ लेता है जसे वो अपना पालन हार मानता था आखिर ऐसा क्यू हम समाज को आइना दिखाते है और ईमानदारी का पाठ पढ़ते है जब हम एक दूसरे के प्रति ही इमानदार नहीं है तो हमको समाज को आइना दिखने का कोई हक नहीं है

एक पुरानी कहावत है की माँ बाप खुद भूखे सो जायेगे मगर अपने बच्चो को भूखा नहीं सुला सकते { स्वानो{कुत्ते} को मिलता दूध दही , बच्चे भूखे सो जाते हैं .

माँ की आँचल से ठिठुर – ठिठुर जाड़े की रात बिताते हैं}एक पत्रकार के लिए उसके माँ उसके बाप और उसका परिवार सिर्फ और सिर्फ उसका संसथान होता है मगर आज का ये कलयुगी परिवार और ये कलयुग के माँ बाप अपना पेट बहरकर तो सो जाते है और  उन बच्चो को  “मंदी” का निवाला खिला कर सुला देते है कैसे ये माँ बाप है …?
 
क्या  हम अब कह  सकते है की हम समाज का आइना है या समाज को आइना दिखा सकते है वही  अगर हम और हमारा संसथान अपनी गिरेवान मै झांक कर देखे तो आइना बनने की दूर आइने मै अपनी सकल देखने के काबिल नहीं है क्यू की आज संस्था को  अपने रिपोर्टर से खबर के साथ साथ पैसा भी चाहिए एक अच्छा पत्रकार एक अच्छी खबर ही ला सकता है न की किसी की जेब से पैसा जो भी इस आर्टिकल को पढ़ रहे है उनसे मै गुजारिस करता हु की देश के इस चौथे स्तम्भ को वाकई मै समाज का आइना बनाने की कोसिस करे

बृजेश निगम
{एम् .डी. विधाता मीडिया नेटवर्क }

 
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