हड़बड़ी में रहने वाले साहित्य से दूर रहें

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सागर- वरिष्ठ कवि एवं आलोचक अशोक वाजपेयी ने डा. हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय की पहली व्याख्यानमाला में अपने नाम और शोहरत के अनुरूप व्याख्यान देकर यह साबित किया कि उन्हें हिंदी साहित्य में आलोचक क्यों कहा जाता है। वाजपेयी ने साहित्य क्यों विषय पर दो टूक शब्दों में कहा कि हड़बड़ी में रहने वाले साहित्य से दूर रहें तो बेहतर है। यह हिंसा का समय है। ऐसे में साहित्यकार अपना धर्म न छोड़ें। सभी धर्म हिंसक हो गए हैं। यह दुनिया घायल लोगों का महाद्वीप बन गई है।

वाजपेयी ने कहा कि ऐसा हिंसक समय पहले कभी नहीं देखा। सौ से ज्यादा क्षेत्र सिविल हिंसा की चपेट में है। हर तरफ हिंसा है। समाज घट रहा है और बाजार बढ़ रहा है। मध्यम वर्ग के घर गोदाम बनते जा रहे हैं। ऐसा माना जाता है कि दुनिया विचारों से बदलती है, लेकिन अब यह दुनिया सामान से बदल रही है। सब घरों की गंध एक जैसी हो गई है। लोग एक जैसा भोजन कर रहे हैं और चैनल भी एक ही देख रहे हैं। समय ने धर्मो में घृणा फैला दी है। ऐसा धर्म किस काम का जो हमारे लोगों को अस्पृश्य करार दे।

श्री वाजपेयी ने कहा कि सौ साल पहले महात्मा गांधी ने चेतावनी दी थी कि यह पश्चिम हमारे देश को बाजार में बदल रहा है। वह चेतावनी आज सच साबित हो रही है। नरेंद्र मोदी डंके की चोट पर चुनाव जीते। झूठ का सहारा लेकर इराक पर हमला किया गया। यह हमारे झूठ की विजय का समय है। लोकतंत्र में भी विकृतियां आ गई हैं।

गोपालगंज जाने में घबराता हूं- अशोक वाजपेयी गोपालगंज में रहते थे। यहीं पढ़े और आगे बढ़े। उन्होंने कहा कि जब सागर आता हूं तो गोपालगंज जाने में घबराता हूं। गोपालगंज दुकानों में तब्दील हो गया है। दुनिया चलना भूल गई है। स्थानीयता गायब हो गई है। सागर की भी गायब हो गई होगी। हम अकेले रहने से घबराते हैं। हम टुच्च सपना देखते हैं। हम फ्रीज, कूलर, फर्नीचर और सामान का सपना देखते हैं। यदि हमारे पास हुनर, हिम्मत और हौसला है तो विकल्प संभव है। न्याय, स्वतंत्रता और सामाजिकता का सपना संकट में है।

साहित्य अपनी सत्ता स्थापित नहीं करता- अशोक वाजपेयी ने साहित्य की जरूरत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि साहित्य दूसरा जीवन जीने की सुविधा प्रदान करता है। साहित्य भौतिक सीमाओं से मुक्त कराता है। वह अधूरा सच प्रस्तावित करता है। साहित्य कभी अपनी सत्ता स्थापित नहीं करता। साहित्य ऐसी संसद है जिसमें आप प्रवेश पा गए तो अपदस्थ नहीं किए जा सकते। साहित्य का देवता ब्यौरों में बसता है। वर्तमान समय में तीन नायक पैदा हो गए हैं। नेता, अभिनेता और खिलाड़ी। इन्हें खल त्रिमूर्ति कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। उन्होंने कहा हमारे और दूसरों के बीच की दूरी साहित्य ही ध्वस्त करता है। साहित्य के सारे सच मटमैले होते हैं। साहित्य निरंतरता का आकाश पैदा करता है।

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