सनातन धर्म की परिसंपत्तियों के लिये भी बने बोर्ड -अधोक्षजानंद

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पुरी के स्वामी अधोक्षजानंद ने कहा है कि हरिद्वार के कुंभ मेले में सभी संत मिलकर एसजीपीसी और मुस्लिम वक्फ बोर्ड की तर्ज पर सनातन धर्म की सारी परिसंपत्तियों का अधिग्रहण कर उनके नियमन के लिए एक बोर्ड गठित कराने का प्रयास करेगे। मंदिर, मठों की जायदाद के लिए होने वाले झगड़ों का अंत करने और धार्मिक परिसंपत्तियों का लोक कल्याण के लिए सदुपयोग करने के उद्देश्य से की जा रही यह पहल कामयाब होने की पूरी उम्मीद है।

गोवर्धन पीठाधीश्वर जगन्नाथपुरी 1008 स्वामी अद्योक्षजानंद ने शनिवार को संस्कृत महाविद्यालय उरई में पत्रकारों से बातचीत में कहा भारतीय संस्कृति लगातार क्षीणता की ओर बढ़ रही है। इसका उत्थान करने के लिए हमें वेदों, पुराणों की ओर देखना चाहिये क्योंकि वेद अपौरुषेय है और सर्वदा सत्य है। गोवर्धन पीठाधीश्वर ने कहा कि संस्कृति का प्रचार प्रसार करना चाहिये। संस्कृति की सुरक्षा के लिये ग्रंथों का अध्ययन करना अति आवश्यक हो गया है। उन्होंने कहा कि गुरुकुल में ही अच्छी शिक्षा दी जाती थी। अब उनका अभाव लोगों को खल रहा है। इसके बावजूद लोगों में चेतना नहीं जाग रही है।

कई दशकों से जो आतंकवाद और अस्थिरता का माहौल देश में व्याप्त हो रहा था उसमें कमी आ रही है। पूर्वोत्तर भारत से लेकर कश्मीर तक माहौल बदला हुआ है। यह देश के लिये अच्छा संकेत है। वैसे भी आध्यात्मिक स्तर पर सभी धर्मो की मंजिल एक है। इसी कारण भारत में शुरू से धार्मिक सामंजस्य को बढ़ावा दिया गया। सनातन धर्म के अद्वैतवाद का संदेश धर्म विशेष के लिए न होकर समूची विश्व मानवता के लिए है। कट्टरवादी भी इसे स्वीकार कर रहे है। इससे धार्मिक एकता और सद्भावना मजबूत होना लाजिमी है। उन्होंने कहा कि धर्म परिवर्तन बुराई है लेकिन इसे सुधारने का तरीका अच्छा होना चाहिये।

गोवर्धन पीठाधीश्वर ने साधु संतों के चुनाव लड़ने को गलत बताया। पीठाधीश्वर ने कहा कि जब संत किसी पार्टी के सांसद बनते है तो उनका प्रभा मंडल कमजोर हो जाता है। वे राजनीति का मार्गदर्शन कर सकते है, राजनीति नहीं। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म में किसी धर्माचार्य को ईसाई धर्म के पोप की तरह कार्यकारी शक्तियां नहीं दी गयीं। वैराग्य के बाद सत्ता हासिल करना लक्ष्य नहीं रह जाता। इसी कारण संतों ने हमेशा इस देश में पवित्र व्यवस्था के लिए सत्ता का दिशा निर्देशन किया है स्वयं सत्तावान होने की कामना नहीं की। सामाजिक भेदभाव समाप्त करने के लिये ठोस प्रयास किये जाने चाहिये लेकिन इसे कहने की आवश्यकता नहीं है। वैसे भी पहले की तुलना में व्यापक सामाजिक परिवर्तन हो चुका है।