सत्ता सुख में नेता भूल जाते जनता के दुख दर्द

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ललितपुर- संत विनोवा की जयंती संकल्पपूर्वक मनायी गई। इस मौके पर आयोजित विचार गोष्ठी में वयोवृद्ध समाजसेवियों ने कहा कि वर्तमान समय राजनीति की दिशा भटक गयी है। लोग राजनीति का उपयोग अपने हित के लिए करते है। जिस जनता के वोट से वह सत्ता की कुर्सी तक पहुंचते है उसी जनता के दुख दर्द को कुर्सी पाने के पश्चात भूल जाते। उन्होंने संसद में उछाले गए नोटों की घटना के अलावा अपराध, भय, भूख, भ्रष्टाचार, महगाई पर भी रोष जताया।

संत विनोवा भूदान आश्रम ककरूआ समिति के तत्वावधान में आयोजित विचार गोष्ठी का शुभारम्भ सर्वधर्म प्रार्थना सभा के साथ हुआ। वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान समय देश व प्रदेश में अपराध, भ्रष्टाचार का बोलवाला बना हुआ है। इसके लिए रोक पाने में केन्द्र व राज्य सरकार पूरी तरह असफल साबित हो रही है। दीनहीन किसानों की कोई सुध नहीं ली जा रही। संत विनोवा जी के आदर्श अधूरे पडे़ हुए है। राजनीति के अपराधीकरण पर भी चिंता जतायी तथा का कि राजनीति की मर्यादा बचाये रखने का कार्य बुद्धिजीवियों को समय रहते करना होगा। उन्होंने कहा कि आज भी अधिसंख्य लोगों के पास सिर छिपाने के लिए जगह नहीं है और न ही खाने के लिए भोजन। फिर भी इस देश को विकसित बनाने का सपना दिखाया जा रहा है। देश को आजादी मिलने के पश्चात जिस खाके का निर्धारण महात्मा गाधी, संत विनोवा के अलावा जय प्रकाश नारायण, डा.राम मनोहर लोहिया ने किया था वह समय बदलने के साथ-साथ बदलता चला गया। पूंजीवादी व्यवस्था का पोषण किया जा रहा है जबकि समाजवादी का नारा धूमिल पड़ चुका है। इसके लिए केवल सरकारे ही जिम्मेदार नहीं है वरन वह बुद्धिजीवी तपका भी है जो भ्रष्टाचार, अत्याचार को चुपचाप बर्दाश्त करता है। यदि चुपचाप बैठा बुद्धिजीवी जागरुक हो जाए तो इस देश की राजनीति में भूचाल आ जाएगा।

विचार गोष्ठी में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परमानंद मोदी, प्यारे लाल सुडेले, वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानचंद्र अलया, कालूराम रजक, शिव प्रसाद श्रोतीय ने अपने सम्बोधन के दौरान आजादी के दौरान की राजनीति को श्रेष्ठ बताया तथा कहा कि अब तो केवल नाम राजनीति रह गया है। इसका मकसद स्वयं की उन्नति तक सीमित बना हुआ है। असली समाजसेवी अभावग्रस्त है जबकि जनता के हितों के साथ खिलबाड़ करने वाले सुख सुविधाएं प्राप्त कर रहे है। इस मौके पर कवियों ने काव्य रचनाओं के माध्यम से वर्तमान समय की समस्याओं का प्रमुख रूप से उल्लेख किया। जिनमें व्यंग्यकार अशोक क्रातिकारी की रचना ‘समलैंगिक जोडे़ सुनो न बदलो निज रूप, पछताओगे जब उम्र की ढल जाएगी धूप’ काफी सराही गई। वहीं वरिष्ठ कवि शिखर चंद्र मुफलिस की रचना ‘धन वालों के पास सम्पदा दौड़ी जाती, रोने वालों को यह दुनिया और रूलाती-कुत्ते गली-गली में भोंका ही करते है, लाठी जिसके पास भैंस उसकी हो जाती’ काफी पसंद की गई। सत्तार नजमी ने कहा ‘संसद में नोट देखो कैसे उछल रहे है मर्यादा देश भर की पग से कुचल रहे है’ इसके अलावा विजय नारायण रावत ने रचना ‘चुनौतिया स्वीकार करना लक्ष्य मेरा बन गया है, गर्व से सीना हमारा और भी अब तन गया है’ सुना कर राजनीति के प्रदूषण पर तीखा प्रहार किया।