षरद पूर्णिमा पर षहीद मर्दनसिंह जयंती एवं काव्योसव सम्पन्न

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भोपाल ,29 अक्टूवर,‘1857 के प्रथम स्वातंत्र्य संग्राम में बंुदेलखण्ड का महत्वपूर्ण येागदान रहा। एक तरफ झाॅंसी मंें लक्ष्मीबाई को अंग्रेजों ने एक पर एक संकट खड़े कर तहस नहस कर रखा था और उधर बंुदेला राज्य में,षरदपूर्णिमा 1802को जन्मे,मर्दनसिंह को युवावस्था में ही अनेक अत्याचारों से त्रस्त कर,विदेषी सत्ता का विरोधी बना दिया था। मर्दनसिह के पैत्रिक राज्य चंदेरी से गोरों ने उनके नरेष पिता मोदप्रहलाद को बेदखल कर, केवल बानपुर तक सिमटा दिया था। एक तरफ ग्वालियर के सिंधिया और दूसरी ओर ओरछा के विषाल राजघराने अंगे्रजों के साथ जा चुके थे तब मर्दन सिंह ने गद्दी पर बैठते ही अपनी बहादुरी से न केवल अंग्रेजों से संघर्ष कर चंदेरी,तालबेहट ललितपुर आदि बानपुर के अन्तर्गत ले लिये थे वरन् झाॅंसी की रानी लक्ष्मीबाई को संवेदनापूर्ण अपूर्व सहारा भी दिया था।मर्दनसिंह ने अंग्रेजों को झाॅंसी जाने से न केवल रोका वरन् षाहगढ़ के बखतबली को गढ़ोकोटा पर कब्जा कराकर,राहतगढ़ से लेकर बरोदिया सागर, नारहट,मड़ावरा आदि स्थलों पर अंग्रेजो से युद्ध कर अंग्रजों छकाया भी।बानपुर के किले पर मर्दन की अनुपस्थिति में ह्यूरोज ने जब उनके राज्य पर कब्जा कर लिया, वस्ती में आग लगवा दी तब भी मर्दन ने अंग्रेजों को लक्ष्मीबाई तक न पहॅंच पाने के लिये हर स्तर पर अनेकों जवर्दस्त लड़ाइयाॅं लड़ी और तात्याटोपे के साथ मिलकर झाॅंसी को बचाये रखा। यह अलग बात है कि तूफान के आगे दिया अधिक दिनों नहीं जला रह सका। लक्ष्माबाई ही षहीद नहीं हुईं वरन् मर्दनसिंह  को गिरफ्तार कर लाहौंर जेल में डाल दिया गया और 22जुलाई 1879 को वे अन्ततः वीरगति को प्राप्त हुये थे।पर आजादी की नींव में लगी मर्दनसिंह की षहादत को,षरदपूर्णिमा पर उनकी जयंती पर 110 वर्ष बाद भी देष भर में स्मरण किया जारहा है।’…उक्त उद्गार वरिष्ठ साहित्यकार श्री कैलाष मड़बैया ने ,अखिल भारतीय बंुदेलखण्ड साहित्य एवं संस्कृति परिषद् की जिला इकाई भोपाल के तत्वावधान में पी.एण्ड टी. चैराहे स्थित हिन्दी साहित्य सम्मेलन भवन में ,षरद पूर्णिमा  पर  1857 के षहीद मर्दनसिंह की जयंती पर विमर्ष के विषय का प्रवर्तन करते हुये व्यक्त किये। विमर्ष में अन्य अनेक विद्वानों ने भी मर्दनसिंह कालीन इतिहास पर अपने विचार व्यक्त किये।समारोह की अध्यक्षता पन्ना के विषिष्ट वि़द्वान पं0 योगेष दीक्षित सम्पादक ‘षुभ्र ज्योत्सना’ ने करते हुये अपनी अनेक प्रासंगिक रचनाओं का पाठ किया ।         दूसरे चरण में षरद पूर्णिमा पर काव्य गोष्ठी का विषिष्ट आयोजन सम्पन्न हुआ जिसकी अध्यक्षता पं. गौरीषंकर षर्मा गौरीष सम्पादक ‘कलाश्री’ने की और अनेक कविताओं का पाठ किया।इस अवसर पर अनेक कवियांे ने भी उत्क्ष्ट कविताओं का पाठ कर षरद ऋतु  और जीवन की उमंग व उर्जा का आवाहन किया। संयोजक-मनोहर..9826015643

सुरेन्द्र अग्निहोत्री
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