शिक्षा के विकास में प्राथमिक शिक्षा की दुर्दशा बड़ी बाधा

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चित्रकूट- केन्द्र और सूबे की सरकारे देश में शिक्षा के स्तर को उठाने तथा उसे गुणवत्ता परख बनाने के लिये तरह-तरह की योजनायें लागू कर रहीं है। अभी तक सूबे में शिक्षा की जो तस्वीर है उसमें किसी हद तक निरक्षरता का प्रतिशत तो अवश्य घट रहा है। गुणवत्ता जैसी उपलब्धि अभी बहुत दूर है। वास्तविकता यह है कि माध्यमिक और उच्चस्तर की शिक्षा तब ही गुणवत्ता परख बन सकती है जब शिक्षा की नीव अर्थात प्राथमिक शिक्षा मजबूत हो। राज्य में प्राथमिक शिक्षा का संचालन शासन स्तर से बेसिक शिक्षा परिषद द्वारा किया जाता है। परिषदीय विद्यालयों में शिक्षा की जो दुर्दशा है वह किसी से छिपी नहीं है। इन विद्यालयों में सबसे प्रमुख बात तो यह है कि पर्याप्त अनुपात में शिक्षक ही नहीं है। शिक्षक विहीन कक्षा में शिक्षण कार्य सम्भव नहीं है, यह बात शासन को गम्भीरता से समझना चाहिये। अधिकाश विद्यालयो में एक या अधिकतम दो नियमित शिक्षक ही कार्यरत है, यह स्थिति प्राथमिक और उच्च प्राथमिक दोनों प्रकार के विद्यालयों की है। नियमित अध्यापकों को मिड-डे मील, बजीफा, ड्रेस व बस्ता वितरण, नाना प्रकार की गणनाओं और सूचनाओं को एकत्र करने के कार्य दिये जाते है। विभागीय अधिकारी भी निरीक्षण में इन्हीं कार्यो का प्रमुखता से निरीक्षण करते तथा इन कार्यो का संचालन कागजी दृष्टि से सही बनाये रखने की हिदायत अध्यापकों को देते है। अध्यापक को भी यही कार्य प्रमुखता से करने होते है। शिक्षण कार्य उसके लिये गौण होता है जिसे शिक्षा मित्रों के सहारे छोड़ दिया गया है। कुछ समय पहले तक अध्यापकों के कार्य का मूल्याकन परीक्षा परिणाम के आधार पर होता था किन्तु अब इन विद्यालयों से प्रचलित परीक्षा प्रणाली ही समाप्त की जा रही है। अध्यापक के कार्य का मूल्याकन शिक्षणेत्तर कार्य  के आधार पर होता है। अत: वह भी इन कार्यो को प्रमुखता देने पर बाध्य है।

शासन को यह वास्तविकता समझनी चाहिये कि मिड-डे मील, वजीफा व ड्रेस जैसी योजनायें बच्चों को प्रवेश के लिये प्रेरित तो कर सकतीं है। इनके संचालन मात्र से शिक्षा की गुणवत्ता नहीं बढ़ाई जा सकती है। शिक्षा का स्तर सुधारने के लिये शिक्षण कार्य को महत्व देना होगा। आम लोगों की मानसिकता भी इन सरकारी सुविधाओं को प्राप्त करने की तुलना में अपने बच्चों को गुणवत्ता परख शिक्षा दिलाने में अधिक है। यही कारण है कि नगरों और कस्बों में परिषदीय विद्यालयों के अलावा व्यक्तिगत क्षेत्र में मान्यता प्राप्त अनेक शिक्षण संस्थाएं प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में चल रही हैं। इन प्राइवेट संस्थाओं में छात्रों की संख्या परिषदीय विद्यालयों की तुलना में अधिक रहती है। इन प्राइवेट विद्यालयों में बच्चों को मिड-डे मील, ड्रेस या बस्ता जैसी सुविधायें नहीं है। इसके विपरीत उन्हे लम्बी फीस भी देनी पड़ती है, फिर भी अभिभावक अपने बच्चों को इन्हीं संस्थाओं में प्रवेश दिलाते हैं। यह मानसिकता केवल उच्चवर्ग की ही नहीं अपितु मध्यम और मजदूर वर्ग भी अपने बच्चों को इन संस्थाओं में प्रवेश दिलाने की कोशिश करते है। इसका प्रमुख कारण यही है कि आम लोग यह जानते है कि परिषदीय विद्यालयों में शिक्षण कार्य उचित ढग से नहीं होता है। इसके लिये अध्यापकों को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। एक तो वे संख्या में ही कम नियुक्त है और उनके ऊपर शिक्षणेत्तर कार्य प्रमुखता करने की बाध्यता है। शासन को चाहिये की वह यह शिक्षणेत्तर कार्य किसी अन्य संस्था के माध्यम से कराये या इस कार्य के लिये संस्था में अलग से कर्मचारी नियुक्त करे। अध्यापक पर केवल अध्यापन कार्य की ही जिम्मेदारी हो, तभी शिक्षा में सुधार की आशा की जा सकती है।