शिक्षक समाज का आईना

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बांदा- कहा जाता है कि शिक्षक समाज का आईना होता है। चार दशक पूर्व कुर्ता पायजामा पहनकर साइकिल पर सवार होकर निकले गुरूजी जहा से भी गुजर जाते वहा पर लोग सम्मान से झुक जाते थे। गुरूजी सम्मान का अपेक्षित जवाब देकर आशीर्वाद देते थे। इस देश में गुरू का दर्जा भगवान से भी ऊंचा बताया गया है, लेकिन गाहे बगाहे हो रही शिक्षकों की पिटाई से जाहिर होता है कि या तो गुरू बदल गये है या फिर समाज बदल गया है। पिछले कुछ वर्षो से सब कुछ बदल गया। कुर्ता पायजामा की जगह गुरू जी जीन्स टीशर्ट में नजर आने लगे। काला चश्मा, हाथ में मोबाइल, वाहन एक शिक्षक की जरूरत बन गयी है। इनके द्वारा किया जाने वाला योगदान हमेशा चर्चा में रहता है। शिक्षक की केवल वेषभूषा बदल गयी है अथवा अंत:करण भी बदल गया है। यह तो कुछ कहा नहीं जा सकता लेकिन इतना तय है कि गुरू जी की प्रतिष्ठा समाज में कमजोर हो रही है। आये दिन विद्यालयों में घटित हो रहे पिटाई के मामलों से लग रहा है कि अब विद्यालयों का समाज में मन्दिर का दर्जा समाप्त हो गया है। एक वह भी दिन था जब लोग भगवान से भी बढ़कर गुरू जी को पूज्यकर गाव में बच्चों को पढ़ाने के लिए लाते थे। उनके रहन-सहन के अलावा जरूरत की पूर्ति ग्रामीण ही किया करते थे।
विद्यालयों में प्रतिवर्ष लाखों रुपये भेजे जा रहे है। इन रुपयों से भवन निर्माण के अलावा विद्यालयों को चमकाने का कार्य होता है। इसके अलावा अन्य मदों में धन व्यय किया जाता है। धन की कहीं कोई कमी नहीं रहती, लेकिन पता नहीं समाज की आखों में एक शिक्षक क्यों अखरने लगा है। शिक्षक का बढ़ गया रुतवा समाज को फूटी आखों नहीं सुहा रहा है। लगता है समाज अभी भी एक शिक्षक को फटे हाल देखना चाहता है। उसे शिक्षक को मिलने वाले लम्बे चौड़े वेतन के अलावा अन्य सुख सुविधायें रास नहीं आ रही है। शायद यही बड़ी वजह है कि समाज अब शिक्षकों का सम्मान नहीं करना चाहता है। कोई व्यक्ति यदि शिक्षक के सामने आ भी जाता है तो वह इस तरह से मुंह फे र लेता है जैसे कि उसके सामने कोई दुश्मन आ गया हो। हालाकि जो शिक्षक आज भी शिक्षण कार्य को भगवान की पूजा समझते है वह सामने आने वाले लोगों को सम्मान देने से नहीं चूकते है। समाज ने भले ही इनको तिरस्कृत कर दिया हो लेकिन वह अपनी प्रतिभा का परिचय देना कदापि नहीं भूलते। गाव में गवई लोगों की तादाद भी बढ़ी है इसमें कोई संशय नहीं है। जिन गावों में सायं चौपाल में रामायण, महाभारत की चर्चायें हुआ करती थीं वहा अब शराब का दौर चलता है। पुत्र के सामने पिता, पिता के सामने पुत्र नशा करके हदें पार करने वाली गालिया देते रहते है।
शिक्षक के जिम्मे राष्ट्र के होनहार नागरिकों को तैयार करने का कार्य है। वर्तमान समय की पीढ़ी साक्षर है, जिन्हे सम्भवत: उन्हीं शिक्षकों ने पढ़ाया है जो अभी भी विद्यालय में योगदान दे रहे है फिर भी यह विद्यार्थी कुछ साल पढ़ने के पश्चात शिक्षक के प्रति क्या संदेश लेकर जा रहे है यह समझ में नहीं आ रहा है। यह भी कटु सत्य है कि जितने भी असामाजिक तत्व है उनमें से ज्यादातर पढ़े लिखे है। आतंकवादी भी प्रतिभावान के अलावा उच्च शिक्षित होते है। आखिर कमी कहा रह जाती है कि देश के होनहार अपनी दिशा बदल देते है। समय रहते 15 वीं लोकसभा को इस दिशा में अवश्य चिंतन करना होगा। या तो समाज बदलने के लिए कार्यवाही करनी होगी या फिर शिक्षकों को बदलने की।