शांति के बिना लंबी उम्र का अर्थ नहीं

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मोरारी बापू
जीवन में व्यक्ति को संसार से वैराग्य हो तो यह अच्छी बात है, लेकिन यह बात सदैव ध्यान में रहे कि सोच नकारात्मक नहीं, सकारात्मक होनी चाहिए। जो प्रेम की संपदा प्रभु ने तुम्हें दी है, उस प्रेम को प्रकट करो, फिर यह संसार इतना भयंकर नहीं लगेगा। यह तो इसलिए बड़ा दारुण और विषम लगता है कि हम प्रेम प्रकट नहीं कर पाए। जिन भक्तों ने प्रेम पा लिया, वे सभी तर गए। उनके लिए संसार बाधक नहीं बना।

शांति के बिना लंबी उम्र का अर्थ नहीं
23 Apr 2009, 2359 hrs IST,नवभारत टाइम्स

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मोरारी बापू
जीवन में व्यक्ति को संसार से वैराग्य हो तो यह अच्छी बात है, लेकिन यह बात सदैव ध्यान में रहे कि सोच नकारात्मक नहीं, सकारात

्मक होनी चाहिए। जो प्रेम की संपदा प्रभु ने तुम्हें दी है, उस प्रेम को प्रकट करो, फिर यह संसार इतना भयंकर नहीं लगेगा। यह तो इसलिए बड़ा दारुण और विषम लगता है कि हम प्रेम प्रकट नहीं कर पाए। जिन भक्तों ने प्रेम पा लिया, वे सभी तर गए। उनके लिए संसार बाधक नहीं बना।

यह बात विशेष रूप से गौर करने की है कि जब संसार को बनाने वाला अपना है और हम उसके अंश हैं, तो क्या संसार हमारा अपना नहीं होगा? यदि आप संसार की टीका करते हैं तो फिर वह निंदा तो सीधे-सीधे राघव की हो गई, क्योंकि इसे तो उन्होंने बनाया है। संसार की आसक्तियां प्रभु प्रेम में डूबने से स्वत: समाप्त हो जाती हैं। कृष्ण प्रेम में डूबी हुई ब्रज बालाओं को संसार का कोई बंधन नहीं रोक पाया था।

तुम्हारा हृदय यदि पिघलेगा तो केवल हरि कथा से। तुम्हारी आंखों से अश्रु धारा बहेगी। लोग तो कहते हैं कि हरि कथा में हमारे सब जवाब मिल जाते हैं। वास्तविक बात तो यह है किकथा जवाब नहीं देती, तुम्हारे सभी प्रश्न और संशयों को मिटा देती है। भीतर से एक महाउत्तर मिलता है कि गाओ हरि, कहो हरि और करो हरि प्रेम। पुकारो हरि को, क्योंकि इसकेबिना मुक्ति नहीं होने वाली।

राघव ने भरत की नहीं, भरत-प्रेम की खोज थी। भरत-प्रेम ही उन्हें दुनिया को देना था। भरत क्या है? यह कौन वर्णन कर सकता है। भगवान राम के वनवास का एक कारण यह भी था। भगवान कृष्ण की भी यही खोज है कि विश्व को प्रेम मिले। लोग एक दूसरे से प्रीति करें। ‘सब नर करहिं परस्पर प्रीति’। मैंने तो न कभी सुना, न देखा कि एक सांप ने कभी दूसरे सांप को डसा हो। लेकिन कमाल है कि एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को मार देता है। प्रत्येक व्यक्ति परस्पर प्रेम करे, श्रद्धा रखे, आदर करे और असहकार का त्याग करे। दूसरों का सहयोगी होने पर ही यह माना जाएगा कि तुम पर सत्संग कर प्रभाव पड़ा।

जब तक विकार है, विश्राम संभव ही नहीं। अविकार की भूमिका विश्राम का स्वरूप या कहें कि विश्राम की पहचान है। प्रेम ही इस भवसागर से पार उतारने वाला एकमात्र उपाय है। प्रेमी बैरागी होता है, जिससे आप प्रेम करते हैं, उस पर न्यौछावर हो जाते हैं। त्याग और वैराग्य सिखाना नहीं पड़ता। प्रेम की उपलब्धि ही वैराग्य है।

जिन लोगों ने प्रेम किया है, उन्हें वैराग्य लाना नहीं पड़ा। जिन लोगों ने केवल ज्ञान की चर्चा की, उनको वैराग्य ग्रहण करना पड़ा, त्यागी होना पड़ा, वैराग्य के सोपान चढ़ने पड़े। कभी गिरे, कभी चढ़े लेकिन पहुंच गए। जैसे जब कृष्ण ब्रज से गए तो क्या ब्रजांगनाएं घर छोड़कर चली गईं। क्या गोप भागे? नहीं, वे सब वहीं रहे। वही गायें, वही बछड़े, वही गोशालाएं, वही खेत, वही घर- सब वहीं थे लेकिन वे सभी परम वैराग्य को उपलब्ध हो गए। प्रेम में वैराग्य निर्माण करने की शक्ति है। भक्ति का अर्थ है जिसको तुम प्रेम करते हो उसकी इच्छानुकूल रहो, यही भक्ति है।

शांति ही तो जीवन का अर्थ है। इसलिए सदैव इसकेलिए प्रयासरत रहना चाहिए । इधर विज्ञान यह खोज कर रहा है कि मनुष्य की उम्र कैसे बढ़ाई जाए। विज्ञान के लिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं। सौ साल की जगह उम्र एक सौ बीस साल कर दे, लेकिन आयु लंबी हो जाए और शांति न मिले तो क्या अर्थ रह जाएगा ऐसी लंबी आयु का? विज्ञान उम्र को लंबी कर सकता है, पर सत्संग तो पूरी उम्र को मस्ती में डुबो सकता है। यही फर्क है। उम्र कितनी भी हो लेकिन सत्संग उसे शांति से भर देता है। जीवन में शांति और मस्ती जरूरी है, तब जीने की उम्र पांच हजार साल भी हो तो भी आनंद आएगा।

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