मोदी सरकार में किसको मिलेगा विभाग, कौन आएगा कौन जायेगा

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने नेतृत्व में हो सकता है रीसेट बटन को प्रेस करने की तरफ रुख कर रहे हैं। सरकार के सीनियर सूत्रों ने बताया कि वह इसके जरिए सुस्त पड़े आर्थिक सुधारों को फिर से जिंदा कर आलोचकों को शांत करना चाहते हैं। मोदी की नजर एक मिश्रित कोशिश के तहत परखे हुए सहयोगी दलों और फ्रेश ब्लड पर है। सरकार तेज आर्थिक विकास चाहती है लेकिन टैक्स और लैंड रिफॉर्म्स को पास कराने में नाकाम रही। 2014 में मोदी की जीत के बाद जहां निवेशकों में उत्साह देखा जा रहा था वहां अब मोहभंग की स्थिति है। मोदी के सत्ता में आने के बाद इंडियन स्टॉक मार्केट ने जो हासिल किए थे वे सारे खत्म हो गए।

सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी 2017 में देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में बेहद मुश्किल चुनाव का सामना करने वाली है। यदि मोदी 2019 में भी केंद्र की सत्ता में बने रहना चाहते हैं तो संभवतः इस चुनाव को जीतना बेहद जरूरी है। इंडियन एक्सप्रेस के पूर्व संपादक और टिप्पणीकार शेखर गुप्ता ने कहा, ‘मोदी को नई प्रतिभा की पहचान कर अपनी सरकार में तब्दीली लाने की जरूरत है। यदि ऐसा अभी नहीं कर पाते हैं तो फिर बहुत देर हो जाएगी।’

सूत्रों का कहना है कि उत्तर प्रदेश को देखते हुए मोदी चाहते हैं कि अमित शाह पार्टी चीफ बने रहें। मोदी के सबसे करीबी सहयोगी और इलेक्शन कैंपेन मैनेजर अमित शाह के तीन साल का कार्यकाल इसी हफ्ते खत्म हो रहा है। सूत्रों का कहना है कि इंटरनैशनल इन्वेस्टर्स तक मोदी के संदेश पहुंचाने की जिम्मेदारी थामे वित्त मंत्री अरुण जेटली को फरवरी के अंत में वार्षिक आम बजट पेश करने के बाद रक्षा मंत्रालय में शिफ्ट किया जा सकता है।

63 साल के जेटली बड़े टैक्स रिफॉर्म्स लाने में नाकाम रहे हैं और आलोचकों को उनके प्रबंधन में कमी नजर आती है। 20 खरब डॉलर से ऊपर की इंडियन इकॉनमी तेजी से बढ़ तो रही है लेकिन पर्याप्त जॉब क्रिएट नहीं हो रही है। मोदी के एक प्रवक्ता ने इस पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया कि जेटली का मंत्रालय बदलने वाला है। उन्होंने कहा कि मंत्रिमंडल में संभावित फेरबदल के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है। मोदी ने जब कमान संभाली थी तब जेटली के पास रक्षा मंत्रालय भी था। कहा जा रहा है कि इस जाने-माने कॉर्पोरेट वकील को यह मंत्रालय ज्यादा रास आएगा और रणनीतिक रूप से अहम पोर्टफोलियो एक भरोसेमंद हाथ में भी रहेगा।

कोयला मंत्री पीयूष गोयल को वित्त मंत्रालय के लिए एक विकल्प के रूप में देखा जा रहा है जबकि अन्य आशा के मुताबिक कम परफॉर्मेंस करने वाले छोटे पदों को खत्म किया जा सकता है। एक केंद्रीय मंत्री और दो बीजेपी पदाधिकारियों ने बताया कि 51 साल के गोयल को अगली बड़ी भूमिका के लिए तैयार किया जा रहा है। बैंकिंग पर एक श्वेत पत्र हाल ही में उनकी राय जानने के लिए साझा किया गया था।

गोयल के एक सहयोगी ने कहा कि उन्हें संभावित प्रमोशन के बारे में कोई जानकारी नहीं है। गोयल को बढ़िया कम्यूनिकेटर माना जाता है। वह मोदी के साथ अक्सर विदेशी दौरों पर जाते हैं। हालांकि उनमें राजनीतिक और चुनावी अनुभव की कमी है। पूर्व इन्वेस्टमेंट बैंकर गोयल ने कोल इंडिया में बहुत कुछ बदला है। जब देश में बिजली का संकट आया तो उन्होंने इसे कायदे से हैंडल किया और ऊर्जा के अक्षय स्रोतों की तरफ रुख किया।

मोदी को जीत दिलाने में जिन चीजों ने सबसे ज्यादा मदद की है वह है गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए 24/7 बिजली मुहैया कराना। मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में इसका अहम योगदान रहा है। नई दिल्ली में सेंटर फोर पॉलिसी रिसर्च के सीनियर फेलो राजीव कुमार ने कहा, ‘गोयल बढ़िया काम कर रहे हैं। उन्होंने कोल और पावर सेक्टर में ऊर्जा भर दी है। लेकिन मैं इस बात से आश्वस्त नहीं हूं कि वह जटिल फाइनैंस पोर्टफोलियो के साथ न्याय कर पाएंगे। गोयल माइक्रो ओरीएन्टेशन के लिए जाने जाते हैं। ऐसे में शायद उन्हें बहुआयामी और गंभीर व्यापक आर्थिक मुद्दों पर जूझना पड़ सकता है।’

मोदी के पास प्रधानमंत्री ऑफिस में केंद्रीकृत ताकत है। नई प्रतिभा को लाने में आखिरी फैसला उन्हीं का होगा। गुजरात में अमित शाह मोदी के दांया हाथ थे। आम चुनाव में जीत दिलाने में शाह को अहम माना जाता है। पिछले साल दिल्ली में शाह की रणनीति चारों खाने चित हो गई थी। इसके बाद बेहद अहम राज्य बिहार में भी उनकी नहीं चली। यही कारण है कि बीजेपी के मातृ संगठन और हिन्दू राष्ट्रवादी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सब्र टूटता दिख रहा है। लेकिन पार्टी के बुजुर्गों द्वारा छोटे विद्रोह के बाद मोदी ने अपनी ताकत से सारी चुनौतियों को खत्म भी किया है।

इस महीने की शुरुआत में नई दिल्ली में बीजेपी और आरएसएस नेताओं की बीच हुई बैठक में मोदी ने शाह का खुलकर समर्थन किया था। शाह को कोई चुनौती नहीं देने जा रहा है। इसका मतलब यह हुआ कि शाह का कार्यकाल इस हफ्ते खत्म होते है तीन साल के लिए बढ़ा दिया जाएगा। हालांकि पार्टी कार्यकार्ता शाह में सख्त और प्रभावी प्रशासक के लिए तारीफ करते हैं। कई लोग चाहते हैं कि नए चेहरों को आगे किया जाए। नवंबर में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में मोदी ने 30 रैलियों को संबोधित किया था लेकिन कारारी हार मिली। यहां तक कि बिहार में किसी को सीएम कैंडिडेट भी घोषित नहीं किया गया था। इसके बाद महसूस किया जाने लगा कि शाह के पास अब बहुत कुछ करने के लिए बचा नहीं है। 2016 में पांच राज्यों में चुनाव होने हैं। बीजेपी इन राज्यों में प्रदर्शन के जरिए अगले साल उत्तर प्रदेश में खुद को मजबूती से ले जा सकती है। यदि इन राज्यों में बीजेपी जीत दर्ज कर पाती है तो 2019 के आम चुनाव में उसे भविष्य नजर आएगा। बीजेपी के एक सीनियर नेता ने कहा कि यदि अमित शाह उत्तर प्रदेश को जीतने में कामयाब रहते हैं तो अगली सरकार मोदी को पुनः प्रधानमंत्री बनने से कोई रोक नहीं पाएगा।

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