मध्यप्रदेश : FCI और अधिकारियो की मिली भगत, करोडो का गेंहू निगल गई ब्लैक लिस्टिड फार्म

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मध्यप्रदेश/ भोपाल (प्रीती शर्मा) :- भारतीय खाद्य निगम यानि (food corporation of india) एवं खाद्य व सार्वजनिक वितरण प्रणाली मंत्रालय की ओपन मार्केट सेल स्कीम के तहत व्यापारियों/बल्क उपभोकताओं को की जाने वाली गेंहू की बिक्री टेंडर में खेल हो रहा है। टेंडर में अनियमितता बरतते हुए एक विशेष व्यापारिक ग्रुप का अरबों रुपए का फायदा पहुंचाया जा रहा है। मध्य प्रदेश में भारतीय खाद्य निगम के हर सप्ताह निकलने वाले टेंडरों में उस फर्म को ही फायदा पहुंचाया जा रहा है जिस पर गड़बडिय़ों के आरोप पुष्ट होने के बाद मुख्यालय स्तर से ब्लैक लिस्टेड करने के निर्देश जारी किए गए थे। साथ ही जो टेंडर स्वीकृत किए जा रहे हैं वह भी गेहूं के बाजारू उछाल से बेहद कम हैं, जिससे सरकार को अरबों रुपए की चपत लग रही है।

दरअसल भारतीय खाद्य निगम हर साल रबी की नई फसल आने के पूर्व अपने गोदामों में रखे पुराने गेहूं को बेचकर गोदामों को खाली करता है ताकि नए गेहूं की खरीद कर खाली गोदामों को दोबारा भरा जा सके। इस के लिए एफसीआई खुली निविदा निकालकर रेट आमंत्रित करता है और सर्वाधिक रेट देने वाली फर्म को गेहूं दे दिया जाता है। लेकिन, घलमेल का खेल यहीं से शुरू होता है, जिसमें एफसीआई के अफसर और व्यापारी मिलीभगत से करोड़ों रूपए इधर से उधर कर देते हैं। अफसरों ने इसके लिए सबसे पहले नियम विरुद्ध तरीके से गोदाम स्तर पर होने वाले टेंडरों को रेल हैड यानि रेलवे के माल गोदाम स्तर पर कराना शुरू कर दिया। ऐसा करने से जहां व्यापारी को पहले टेंडर डालने के लिए लगभग 50 लाख रुपए की जमानत धनराशि जमा करनी होती है, लेकिन एफसीआई के आला अधिकारियों ने टेंडर नियमों का उल्लंघन कर रेल हैड स्तर पर कई गोदामों को जोड़कर एक जमानत धनराशि पर कई टेंडर लेने की छूट दे दी, यह नियम एक खास व्यापारी ग्रुप को फायदा पहुंचाने के ही लागू किया गया, जिससे मंत्रालय द्वारा गेहूं के टेंडर के लिए तय की गई न्यूनतम दर 1550 से कम्पटीशन में हाई रेट पर गेहूं बेचे जाने की मंशा भी मात खा गई। मंत्रालय की इस व्यवस्था को अवैध तरीके से जीएम स्तर पर ही बदल दिया गया। इससे जब रेल हैड पर टेंडर होने लगा तो प्रथम वरीयता, द्वितीय, तृतीय व चतुर्थ वरीयता के क्रम में व्यापारियों को बिना कम्पटीशन के ही न्यूनतम दर पर गेहूं मिलना शुरू हो गया। इससे एफसीआई को करोड़ों रुपए का नुकसान हो गया। जबकि, वहीं पंजाब व हरियाणा में गोदाम स्तर पर ही टेंडर किए जा रहे हैं और यहां कम्पटीशन होने से हाई रेट पर गेहूं उठाया जा रहा है। इसके पूर्व 2012-2013 में गोदाम स्तर पर कराए गए टेंडरों में जहां गेहूं की बिक्री निर्धारित मूल्य 1550 के सापेक्ष 1592 तक जा रही थी वह अब 1550 या 1560 तक ही ठहर कर रह गई है। इससे हर रैक पर करोड़ों रुपए का नुकसान एफसीआई को होने लगा। अभी जब देश के कई राज्य सूखे की चपेट में हैं। अधिकांश किसानों ने बारिश नहीं होने के कारण रबी की बुआई नहीं की है। इससे साफ संकेत हैं कि आने वाले समय में गेहूं की कीमत पर उछाल आना तय है। अभी से ओपन मार्केट में गेहूं की कीमत 25 रुपए के करीब पहुंच गई है तो वहीं एफसीआई अपने गोदामों में रखे अच्छी क्वालिटी के गेहूं को निर्धारित दरों यानि 1550 में ही व्यापारियों या कहें उनके जरिए मिलमालिकों तक गेहूं पहुंचा रही है। जो टेंडर किए जा रहे हैं उसमें दो फर्मों को सबसे अधिक गेहूं दिया जा रहा है जो अफसरों के सिण्डीकेट में शामिल है। हाल ही में एफसीआई ने 6 जनवरी व 14 जनवरी को किए टेंडरों में भी उसी फर्म के टेंडर स्वीकृत कर दिए गए जिसे गंभीर अनियमितताओं के आरोप में ब्लैक लिस्टेड किए जाने के आदेश एफसीआई मुख्यालय से पहले ही दिए जा चुके हैं। जानकारी के मुताबिक एक व्यापारिक समूह की कुछ फर्मों को ही अधिकारियों की मिलीभगत से फायदा पहुंचाया जा रहा है। सबसे अधिक फायदा आर बी किसान केंद्र प्राइवेट लिमिटेड एवं राघव  ट्रेडर्स को दिया गया, जिसे पहले ही ब्लैक लिस्टेड करने के आदेश दिए जा चुके हैं। हैरानी की बात तो यह है कि आरबी किसान केन्द्र की अनियमितताएं पकड़ में आने पर ब्लैक लिस्टेड करने के आदेश के बाद भी उसे 5 अक्टूबर 2015 से अब तक ७८,७३,१५,००० रुपए का गेहूं दिया जा चुका है। इसके साथ ही दूसरी ब्लैक लिस्टेड किए जाने के दायरे वाली फर्म राघव ट्रेडर्स को भी ७८,८८,५५,००० रुपए का गेहूं दे दिया गया। यह खेल लगातार जारी है। इन दोनों ही फर्मों के खिलाफ एक तरफ जांच में इन्हें दोषी ठहराया जा रहा है तो दूसरी तरफ उनको करोड़ों का फायदा भी विभागीय अधिकारी ही पहुंचा रहे हैं। हाल ही में 4 व 6 जनवरी में हुए टेंडर में आरबी किसान केन्द्र व राघव ट्रेडर्स को करोड़ों रुपए का फायदा फिर पहुंचा दिया गया और दौनों ही फर्मों को लगातार फायदा पहुंचाया जा रहा है। वहीं मध्य प्रदेश खाद्य निगम के जीएम इस मामले में कुछ भी कहने से बच रहे हैं। अब यदि इस मामले की केंद्र सरकार जाँच करे तो अफसर और गेहूं माफिया के गठजोड़ सामने आ सकता है।