भिंड-इटावा रेलमार्ग विवाद निपटा

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ग्वालियर- भिंड से इटावा तक रेल मार्ग बिछाने का विवाद अब जल्द सुलझ जाएगा। उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बाद रेलवे ने वन विभाग से राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य व वन क्षेत्र में रेल पटरी बिछाने व अन्य काम करने की इजाजत मांगी है। इसके लिए उप मुख्य अभियंता (निर्माण) ने अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (भू-प्रबंध) को पत्र भी लिख दिया है। नए रेल मार्ग का काम करीब तीन साल से अटका था। कभी ठेकेदार की समस्या रही तो कभी वन महकमा रोड़ा बनकर खड़ा हो गया। इस वजह से गुना-इटावा रेल प्रोजेक्ट पूरा होने में देरी होती गई। मामला उच्चतम न्यायालय तक दो बार पहुंच चुका है।

रेलवे का कहना है कि पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे की रिटपिटीशन को सुना। उसके बाद निर्देश दिए हैं कि प्रोजेक्ट कॉस्ट की पांच प्रतिशत राशि अलग से जमा नहीं की जाए। इस निर्देश के बाद रेलवे ने राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य परिक्षेत्र (भिंड) की 8.870 हेक्टेयर भूमि तथा वन मंडल भिंड की 146.46 हेक्टेयर वन भूमि पर रेल मार्ग बिछाने व काम को चालू करने की बात कही, जिससे भिंड-इटावा उपखंड का कार्य जल्द पूरा किया जाए। साथ ही यह भी कहा है कि यदि जल्द स्वीकृति दी जाती है तो राष्ट्रीय हित की परियोजना में हो रहे विलम्ब से बचा जा सकता है।

रेलवे शर्तो के मुताबिक गुना-इटावा रेल प्रोजेक्ट लागत की पांच प्रतिशत धन राशि 7.57 करोड़ रुपए सहायक वन महानिरीक्षक एफसी पर्यावरण एवं वन मंत्रालय भारत सरकार के खाते में जमा करा दी थी। यह राशि उप्र को मिल रही थी। जब यह बात मप्र वन विभाग को पता चली, तब स्वीकृति रद्द कर कास्ट की पांच प्रतिशत राशि की डिमांड कर डाली। इस वजह से उक्त क्षेत्र वन व अभयारण्य क्षेत्र में रेलवे को काम रोकना पड़ा था। इसे लेकर रेलवे पुन: उच्चतम न्यायालय में चला गया। उच्चतम न्यायालय के निर्देश को वन विभाग मप्र मानता है तो उसे 7.57 करोड़ रुपए की राशि में से आधी राशि मिलेगी, जो 3.7 करोड़ रुपए से ज्यादा होगी।