पशु बेहाल -चरही में पानी नहीं,

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महोबा- जनपद के विभिन्न गांवों में पशुओं के पानी पीने को बनायी गयीं चरही किसी काम की नहीं रहीं। सूखे के दौरान 80 लाख से ज्यादा रुपये खर्च कर इन्हें बनवाने के बाद भी इनका कोई लाभ नहीं मिला। गांव-गांव में प्यासे जानवर चरही के पास भटकते रहते हैं पर पानी नहीं मिलता। ज्यादातर टूटने के कारण उपयोगी नहीं रहीं शेष में कोई पानी नहीं भरता।
गत वर्ष सूखे के दौरान पशुओं के पेयजल केलिए जिले के सभी गांवों में चरही बनवाई गयी थी। 437 गांवों में बनी चरही में प्रत्येक में लगभग सात हजार का खर्चा आया। इस तरह इनके निर्माण में तकरीबन 80 लाख रुपया व्यय हुआ। मानक की अनदेखी व गुणवत्ता के भारी अभाव के कारण इनमें से ज्यादातर चटक गयीं। जिससे यह निर्माण के पहले वर्ष में ही अनुपयोगी हो गई है। वैसे सभी चरही हैण्डपंप के पास बनवाई गई। सोचा गया था कि ग्रामीण हैण्डपंप चला इन्हें भर देंगे। जिससे पशुओं को पेयजल सुविधा हो जायेगी। चरही का बेसमेंट ही हैण्डपंप से ऊंचा हो गया। जिससे फालतू रहने वाला पानी चरही में जाने की जगह बेकार बहता रहा। दूसरे इन्हें बाल्टियों से भरने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं रहा। यह भी नहीं सोचा गया कि गर्मी बढ़ने के साथ ही जलस्तर तेजी से नीचे खिसकने लगता है। इससे ज्यादातर हैण्डपंप जवाब दे गये है। दूसरे लोगों को किसी उपयोग के लिये ही पानी का भंडारण करना अहम समस्या है। ऐसे में चरही भरेगा कौन। मई आते ही दर्जनों गांवों में पानी का संकट शुरू हो गया है। यहां पशु हैंडपंपों के पास बने गड्ढों के कीचड़ युक्त पानी से अपनी प्यास बुझाने का असफल प्रयास करते हैं।