बुन्देलखण्ड सियासत की दाल फ्राई…..

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रिपोर्ट-(प्रीती शर्मा)

बुंदेलखण्ड लगातार अपनी बदहाली और सूखा तो कभी दैवीय आपदा को लेकर हमेशा से चर्चा में रहा है। और राजनैतिक दलों के लिए बुंदेलखण्ड एक दाल फ्राई की तरह हो गया जिसका जब मन आया और छौंक कर खा लिया मनो बुन्देलखण्ड एक राजनीति का एक अड्डा बन गया हो। चुनाव आने के पूर्व सभी राजनैतिक दलों का फुल फोकस केवल बुंदेलखण्ड पर हो जाता है। सभी अपनी-अपनी राजनैतिक रोटिया सेंकने के लिए यहां आकर बुंदेलखण्ड वासियों को मुंगेरीलाल के हशीन सपने दिखाने में लगते हैं या जख्मो को कुरेदने में, जब चुनाव खत्म हो जाते हैं तो इन नेताओं को यहां आना तो दूर, दिल्ली और लखनऊ में बैठकर बुंदेलखण्ड के बारे में सोचना भी कष्टदायक लगने लगता है। एक बार फिर कांग्रेस ने बुंदेलखण्ड के दर्द को कैश कराने का अभियान छेड़ रखा है। पहले रीता बहुगुणा जोशी और अब राहुल गांधी। लगता है बुंदेलखण्ड न हुआ, दाल फ्राई हो गया।

चुनाव आओ नइ के चलो बुन्देलखण्ड

जब-जब उत्तर प्रदेश के चुनाव सन्निकट होते हैं, सभी राजनैतिक दलों को बुंदेलखण्ड की याद सताने लगती है। बुंदेलखण्ड के सूखे को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने अपनी जिम्मेदारी प्राथमिकता के आधार पर निभाई और यहां की बदहाली को दूर करने एवं लोगों को राहत देने के लिए खजाने का मुंह खोल दिया। तमाम योजनाएं चलाई और स्थानीय स्तर पर ही रोजगार देने के निर्देश अधिकारियों को दिए। अखिलेश ने कहा कि बुंदेलखण्ड की बदहाली दूर करके ही दम लेंगे। अधिकारी भेजे, मगर कोई दिग्गज नेता सपा का बुंदेलखण्ड के हालात जानने नहीं आया। बसपा की मायावती ने भी बुंदेलखण्ड कार्ड खेला और पृथक राज्य के लिए किए गए अपनी सरकार के प्रयासों को गिनाना शुरू कर दिया। स्थानीय नेता भी अपने बयानों में बुंदेलखण्ड की बदहाली को कैश करा रहे हैं। उधर, भाजपा तो जैसे बुंदेलखण्ड के भरोसे ही सरकार में आने का स्वप्न देख रही है। उसने तो अपने संगठन में बुंदेलखण्ड स्तर की कमेटी भी बना रखी है जो केवल और केवल बुंदेलखण्ड की ही राजनीति करती है। इसके अलावा बुन्देलखण्ड में कांग्रेस में चल रही अन्दरूनी जंग में घी डालने कांग्रेस ने कुछ दिन पूर्व अपनी तेज तर्रार नेता रीता बहुगुणा जोशी को यहां प्लेटफार्म बनाने भेजा और अब राहुल गांधी इस प्लेटफार्म पर अपना परफॉमेंस करने आ रहे हैं। वे महोबा में सात किमी पैदल चलकर यहां की बदहाली को दूर करने का प्रयास करेंगे।

बुंदेलखंडी हुए घुमराह

इतिहास गवाह है कि जब-जब प्रदेश में किसी राजनैतिक दल की सरकार बनी हैं, उसमें बुंदेलखण्ड ने बेगानी भूमिका निभाई है। भाजपा की सरकार बनी तो यहां के भाजपा विधायकों ने खुद को लखनऊ तक पहुंचाया। बसपा ने जब-जब राज किया, तब-तब बुन्देलखण्ड ने बसपा को आजमाने के लिए उसके विधायक लखनऊ भेजे। वर्तमान में सपा की सरकार है तो बुंदेलखण्ड से अधिकांश सपा के विधायक लखनऊ में कुर्सियों पर बैठे हैं। इसके बावजूद बुंदेलखण्ड का दर्द विधानसभा में उठाने वाला कोई विधायक नहीं है। किसी ने भी यहां की जनता के विश्वास पर खरा उतरने तक की कोशिश नहीं की। अब फिर चुनाव आ गए हैं तो एक बार फिर सभी राजनैतिक दलों को बुंदेलखण्ड का दर्द दिखने लगा है। सभी मरहम लगाने के नाम पर यहां आकर बदहाली और सूखे पर राजनैतिक रोटिया सेंक रहे हैं। फिर चाहे वे सपा, बसपा, भाजपा या फिर कांग्रेस के नेता ही क्यों न हों। बुन्देलखण्ड में लगातार किसान आर्थिक तंगी से आत्महत्या कर रहा है, कर्ज से परेशान है किसान नेता भी चिल्ला चिल्ला कर थक गए मगर समाधान के नाम पर कागजी और अधूरे बादे हाथ लिये किसान अपना दर्द किसी को बता भी नहीं पा रहा इसलिए मौत का दामन थामने को मजबूर है। करोडो के बुन्देलखण्ड पैकेज के नाम पर आई धनराशी  का दुरुपयोग हुआ उसकी आज तक जाँच नहीं हो सकी ।
पलायन के लगातार दौर में हमीरपुर राठ से दिल्ली गये सुधांशु दुवेदी कहते है कि बुन्देलखण्ड को पैकेज के नाम पर दिए गए हजारो करोड़ रूपये की बंदरबाट की जाँच CBI से कराई जानी चाइये , इसके लिए अपने आप को बुन्देलखण्ड का हितैसी मान रहे नेता आखिर कियू CBI जाँच की पहल नही करते अगर ऐसा हुआ तो कई बड़े चेहरों का बेनकाब होना तय है।

इलाके को उद्योग के नाम पर स्थापित किये गए ललितपुर में पावर प्लांट में करोडो का हेरफेर का मामला आज भी लखनऊ में लटका पड़ा है, खनिज सपर्दा का लगातार अवैध दोहन हो रहा है इस पर कभी किसी सरकार का ध्यान नही रहा। बुन्देलखण्ड का हमेशा से दोहन होता रहा जो आज भी अनवरत जारी है और बुंदेलखंडी कल भी हाथ फैलाये था और आज भी हाथ फैलाये है।