बुन्देलखण्ड में विकास की अपार संभावनाऐं छुपी है

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1उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने केंद्र की कांगे्रस सरकार के लिये नया सिरदर्द पैदा करने का मन बना लिया है ।21 नमंबर से शुरु हो रहा बिधान सभा के बिशेष सत्र मे प्रदेश को चार हिस्से में बाटने का प्रस्ताव पास करने का ऐलान कर दिया है। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कई  पत्र लिखकर उन्होंने बुंदेलखण्ड पूवांचल अबध और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को भी अलग राज्य बनाने की मांग की। बसपा पिछले कई साल से बुंदेलखण्ड पूवांचल अबध और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने की मांग कर रही है।

मार्च 2008 में मायावती ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर उत्तर प्रदेश के सभी क्षेत्रों के विकास के लिए छोटे राज्यों में उसे बांटने की बात कही थी। उन्होनंे चारो क्षेत्रों के लोगों से अपील की कि वह अलग राज्य बनाने की अपनी मांग केन्द्र के समक्ष पुरजोर तरह से रखें। मायावती ने  तब कहा  था कि यदि केंद्र बुन्देलखण्ड पूवांचल अबध  व पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने पर सहमत हो तो वह राजा बुन्देला कहते हैं कि मेहनत काम आ गयी है और अब बुन्देलखण्ड राज्य बनकर रहेगा। मुख्यमन्त्री को बधाई देते हुए वह कहते हैं कि उन्हें इस ़कदम को और पहले उठाना चाहिए था। बुन्देलखण्ड कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर सजग प्रहरी की भूमिका निभाएगी। उन्होंने कहा कि विकास की बात करने वाले राजनैतिक दलों को छोटे राज्यों का समर्थन करना चाहिए। यह सिद्ध हो गया है कि छोटे राज्यों से विकास तेज गति से होता है। द्वितीय राज्य पुनर्गठन आयोग के कांग्रेस के प्रस्ताव को खारिज करते हुए वह कहते है कि आयोग का कोई औचित्य नहीं है और पहले भी बगैर आयोग के राज्यों का गठन किया गया है। कांग्रेस को जनता का समर्थन चाहिए, तो राज्य निर्माण के लिए कदम उठाए। विधानसभा मंे इस आशय के प्रस्ताव को लाने केा तैयार हैें। उन्होंने तर्क दिया कि जनसंख्या और क्षेत्रफल के आधार पर उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य का प्रबंधन करने के लिये इसे बांटना जरूरी है।

5खंड-खंड नहीं अखण्ड बुन्देलखण्ड चाहिए, जब तक हमें पूरा बुन्देलखण्ड नहीं  मिलता है हमारा संघर्ष जारी रहेगा यह बुन्देखण्ड काग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजा बुन्देला ने बातचीत करते हुए कहीं। छोटे राज्यों का जिन्न बोतल से बाहर निकल आने के बाद पहली धमक को धमाके के साथ करते हुऐ राजाबुन्देला ने मायावती के बुन्देलखण्ड को लेने से इनकार करते हुऐ कहा कि महाराजा छत्रसाल की सीमाओं वाला बुन्देलखण्ड चाहिऐ इस बुन्देलखण्ड में विकास की अपार संभावनाऐं छुपी है हम बदहाल और वेबस बुन्देलखण्डीयों को देश की मुख्य धारा में लाना चाहता है उनके साथ अंग्रेजों ने छल किया तो किया ही भारत सरकार भी छल कर रही है। 1948 में गृहमंत्री सरदार पटेल के साथ एक मसौदे पर बुन्देलखण्ड के 35 राजा-रजवाड़ों के साथ समझौता हुआ था इस समझौते में बुन्देलखण्ड राज्य की सीमा तक तय हो गई थी लेकिन संधिपत्र को आज तक लागू नहीं किया गया है। श्री बुन्देला ने एक सवाल के जवाब में कहा कि बुन्देलखण्ड के लोग अपने कुल की मार्यादा और प्रतिष्ठा के साथ स्वाभिमान के चलते आज तक ठगे जाते रहे है लेकिन बुन्देलखण्डी अपनी अभिलाषा को मन में पाले है यह अभिलाषा अपने राज्य, स्वराज्य की है। जिसके लिये मुगलों से, अंग्रेजों से लोहा लेने में बुन्देलखण्ड के लोग कभी पीछे नहीं रहे है। लड़ते-लड़ते देश के लिये अपना सर्वस्व होम करने के बाद आजादी तो हमें मिल गयी लेकिन बुन्देलियों के साथ बहुत बड़ा धोखा उन्हंे उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के पिछवाड़े के रूप में बांट कर सारी गंदगी यही उड़ेल दी गयी। जिसके कारण आज बीमारी और बेबस क्षेत्र के रूप में बुन्देलखण्ड जाना जा रहा हैं। खनिज सम्पदा, पुरातत्व सम्पदा से परिपूर्ण इस क्षेत्र में पर्यटन उद्योग के विकास की अपार सम्भावना है। हजारो करोड़ रूपया खनिज रायल्टी के रूप में सरकार को देने वाला यह क्षेत्र खुद अपने विकास के लिये कटोरा लेकर खड़ा होता है। इतनी न इन्साफी तो किसी के साथ नही होती है। हमारा पानी, हमारी बिजली, हमारी मूर्तियाॅ, हमारी श्रमशक्ति का दोहन तो हो रहा है लेकिन इसका लाभ हमंे नहीं मिल पा रहा है। हमारे बच्चे शिक्षा के अभाव में भटक रहे है। बेरोजगार है उनके सामने अन्धेरा ही अन्धेरा है। बुन्देलखण्ड राज्य बन जाने से हमे अपने विकास का माडल प्रकृतिक और भौगोलिक स्थिति के अनुसार चुनने का मौका मिलेगा। लखनऊ से निर्देश आते है बुन्देलखण्ड मंे केले की खेती की जाये लेकिन यहाॅ पानी नहीं किसान बेचारा क्या करंे। लेकिन अनुदान के खेल में कागजों पर केले की खेती होती है और अंगूर उगाये जाते है। यही कुछ हाल सभी सरकारी योजनाओं का है। बदहाल और बेहाल बुन्देलखण्ड के बनने के पीछे सही योजनाआंे का न होना है।

4राजनीति का शिकार बुन्देलखण्ड, बुन्देलखण्ड के विकास के नाम पर अलग अलग पार्टियों द्वारा बुन्देलखण्ड का शोषण 65 साल से होेता रहा हैं आजादी की लड़ाई हो या मुगलों से युद्ध हो बुन्देलखण्ड सबसे आगे रहा है आज वही बुन्देलखण्ड अपनी बदहाली, भूखमरी, सूखे और बेरोजगारी के लिये पूरी दुनिया में चर्चित है। विकास की योजनायें तो 65 साल से लगातार बुन्देलखण्ड के नाम पर आती रही पर सरकारों मंे दूसरे क्षेत्रों का वर्चस्व होने की वजह से इन योजनाओं का लाभ कभी बुन्देलखण्ड को नही मिला, कहाॅ आजादी से पहले का बुन्देलखण्ड और कहाॅ आज आजादी के बाद का बुन्देलखण्ड, लोगांे का मानना है अगर भारत में कोई नरक है तो इस वक्त बुन्देलखण्ड में है। आकड़ों की माने तो 62 प्रतिशत लोग बुन्देलखण्ड से पलायन कर चुके है। बुन्देलखण्ड राज्य की माॅग 1948 से चल रही है। टीकमगढ़ मध्यप्रदेश में मधुकर का बुन्देली राज्य अंक निकालकर पण्डित बनारसी दास चतुर्वेदी ने इस आन्दोलन को एक नहीं दिशा दी थी। जिसे 1960 में बाबू बिन्द्रावन लाल वर्मा, पंडित ब्रजकिशोर पटेरिया तत्कालीन विधायक, डालचन्द जैन, तत्कालीन मंत्री नरेन्द्र सिंह जूदेव ने नेतृत्व किया।  1968 में सागर मध्यप्रदेष में बुन्देलखंड राज्य के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक सम्मेलन तत्कालीन मंत्री नरेन्द्र सिंह जुदेव साहित्यकार डा0 बष्न्दावनलाल वर्मा विधायक डाल चन्द जैन मध्यप्रदेष के पूर्व गष्हमंत्री बष्जकिषोर पटैरिया के नेतष्त्व में हुआ था। इस सम्मेलन में प्रस्ताव पारित करके कहा गया था उदल गरजे दस पुरवा में, दिल्ली में कांपे चैहान को फलित करने के लिए सभी को एक झण्डे के नीचे आना होगा लेकिन भोपाल के राजधानी बनते ही बुन्देलखंड राज्य आन्दोलन को उतनी गति नही मिल पायी जितनी की जरूरत थी लेकिन बुन्देलखंड राज्य के लिए झांसी, ललितपुर, हमीरपुर, बांदा, चित्रकूट, ग्वालियर, छतरपुर, पन्ना, सागर, कभी तेज तो कभी धीमी गति से आन्दोलन चलता रहा है बुन्देलखंड राज्य अन्दोलन के लिए पूर्व सांसद लक्ष्मी नारायण नायक तत्कालीन विधायक देव कुमार यादव, कामता प्रसाद विष्वकर्मा की बुन्देलखंड प्रान्तनिर्माण समिति विधायक तथा अब पूर्ब मंत्री बादषाह सिंह की इन्साफ सेना तथा बुन्देलखंड विकास सेना समय-समय पर राज्य अन्दोलन की मुहिम चलाती रही है। 1989 में षंकर लाल मल्होत्रा के नेतष्त्व में नौगाँव छावनी में बुन्देलखंड मुक्ति मोर्चा के गठन के साथ ही पिछले 17 वर्शो से बुन्देलखंड राज्य के लिए मुहिम तेज हो गई है। फिल्म अभिनेता और  बुन्देलखण्डं कांग्र्रेस के नेता राजा बुन्देला के नेतष्त्व में बुन्देलखंड राज्य के लिए जनजागरण यात्रा की जा रही है।  वही दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के बुन्देलखंड में सूपड़ा साफ करा चुकी भाजपा न हाँ कह पा रही हैं और न ही न कर पा रही हैं।  खनिज सम्पदा के लिए मषहूर बुन्देलखंड के अकेले पन्ना जनपद से 700 करोड़ रूपये केन्द्र सरकार को और मध्यप्रदेष सरकार को 1400 करोड़ राजस्व के रूप में प्राप्त होते है। राजाबुन्देला कहते है कि  बुन्देलखंड का आमजन बदहाली और बेबसी का षिकार है। सम्पन्न एवं मध्यम वर्ग का किसान कर्ज, टैªक्टर की किष्त, नमक-रोटी न जुटा पाने के कारण आत्महत्या कर रहा है। इधर के समय में सैकड़ों उदाहरण सामने आये है। सम्पन्न एवं मध्यम वर्ग के किसानों की अगर यह हालत है, तो गरीब एवं भूमिहीन परिवारों के हालात क्या होगें, कल्पना की जा सकती है? कांग्रेस के झांसी जिलाध्यक्ष सुधांशु त्रिपाठी कहते है बुन्देलखण्ड में सार्वजनिक वितरण प्रणाली पूरी तरह ध्वस्त है। 10-10 वर्शो से अन्त्योदय, बीपीएल कार्ड धारकों को राषन नहीं मिल रहा है। सम्पूर्ण सामग्री कानपुर, वाराणसी आदि के आटा मिलों में समा रही है। बुन्देलखण्ड में ‘भुखमरी’ की घटनाएं अब आम हो चली हैं। गरीब एवं वंचित वर्ग के लगभग 40 प्रतिषत लोगों का काम की तलाष में पलायन इसका प्रमाण है। बुन्देलखंड साहित्य एवं संस्कष्ति परिशद के राश्ट्रीय अध्यक्ष कैलाष मडवैया कहते है कि बुन्देलखंड को दो भागों में वि कांग्रेस के पूर्व प्रदेश महासचिव भानुसहाय ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि देर आए, दुरुस्त आए। मुख्यमन्त्री का निर्णय स्वागत योग्य है, लेकिन चुनाव के पहले इस निर्णय में राजनीति की बू आती है। अब कांग्रेस पर दबाव बनने के सवाल पर उन्होंने कहा कि बुन्देलखण्ड मध्यप्रदेश व उत्तर प्रदेश दो भागों में बाँटा है और संयुक्त रूप से बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण के लिए राज्य पुनर्गठन आयोग की जरूरत है। भाजन करके अंग्रेजों ने इस वीर भूमि के साथ बहुत गहरी साजिष रची थी ताकि अंग्रेजों के छक्के छुड़ा देने वाले विधायक व सांसद के चुनाव में बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण के मुद्दे को अपने एजेण्डा में शामिल करने वाले तथा विधानसभा में बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण को लेकर विधानसभा में प्रस्ताव रखने वाले केन्द्रीय ग्रामीण विकास राज्य मन्त्री व झाँसी-ललितपुर के सांसद प्रदीप जैन आदित्य का कहना है कि मुख्यमन्त्री का यह कदम राजनैतिक शिगूफेबाजी है। उन्होंने विधायक रहते चार साल पहले विधानसभा में बुन्देलखण्ड के तीनों कांग्रेस विधायकों (विवेक सिंह व विनोद चतुर्वेदी) के साथ प्रस्ताव रखा था, मुख्यमन्त्री को उसी समय प्रस्ताव पर चर्चा करानी चाहिए थी। लोग कभी ताकतवर न हो सके लेकिन अफसोस है कि आजादी के बाद हमारे अपने ही हमे एक नही होने दे रहे है। जब दुनिया में पूर्वी और पष्चिमी जर्मनी एक हो गयी ऐसे वक्त में बुन्देलखंडवासियों के एक होने का  वक्त आ गया है। अंग्रेजों के पहले भाशायी अध्यन में यह बात निकल कर आई थी कि आठ करोड़ लोग बुन्देलीभाशा बोलते थे लेकिन बुन्देलीभाषा आज तक आठवी अनुसूची में षामिल नही हो पाई है।

3लेकिन समय-समय पर अश्वासन के अलावा कुछ नहीं हासिल हुआ। दो दशक से बुन्देलखण्ड राज्य के मुक्ति मोर्चा मुहिम चला रहा है। इसी मुहिम के तहत 16 दिसम्बर को चित्रकूट से पैदल यात्रा शुरू की जा रही है। तो वही दूसरी ओर पूर्वाचंल में अपने राज्य को लेकर लड़ाई छिड़ने की आसार तेज हो गये है।

यूं तो बुंदेलखण्ड क्षेत्र दो राज्यों में विभाजित है-उत्तर प्रदेष तथा मध्य प्रदेष, लेकिन भू-सांस्कष्तिक दष्श्टि से यह क्षेत्र एक दूसरे से भिन्न रूप से जुड़ हुआ है। रीति रिवाजों, भाशा और विवाह संबंधों ने इस एकता को और भी पक्की नींव पर खड़ा कर दिया है। उत्तर प्रदेष के झांसी, बांदा, हमीरपुर, चित्रकूट, महोबा,ललितपुर और जालौन के अलावा इस क्षेत्र में ग्वालियर, दतिया, भिंड, मुरैना, षिवपुरी, सागर, छतरपुर, टीकमगढ़, अषोकनगर, पन्ना, दमोह, सतना, गुना जैसे जिले भी षामिल हैं। वैसे बुंदेलखण्ड के अनेक बुद्धिजीवियों का तो मानना है कि इस क्षेत्र के अंतर्गत उत्तर प्रदेष के सात जिले तथा, मध्य प्रदेष के 21 जिले आते हैं। इसी आधार पर कुछ लोगों ने बुंदेलखण्ड राज्य की स्थापना का आंदोलन भी प्रारंभ किया है। यदि कोई इस तर्क से न भी सहमत हो तो भी इस तथ्य से कोई इंकार नही कर सकता है के उत्तर प्रदेष तथा मध्यप्रदेष के योजना आयोग द्वारा घोशित बुन्देली पिछड़े क्षेत्र को मिला कर बुंदेलखण्ड राज्य गठित किया जा सकता है। कभी अंग्रेजों की कूटनीति का शिकार बना बुन्देलखण्ड खण्ड-खण्ड होकर उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के रहनुमाओं के आगे भीख का कटोरा लेकर खड़ा है। बुन्देलखण्ड वासियों को यह समझ नहीं आ रहा है वह क्या करें। सत्ता की चेरी प्राप्त करते ही बुन्देलखण्ड के तथाकथित जन नेता मंत्री पद के मोह पाश में ऐसे जकड़ जाते है कि अपनी मिट्टी का कर्ज उतारना तक भूल जाते है। भोजपुरी बोलने वाले लालू यादव से लेकर नितीश कुमार को अपनी मात भाषा बोलने में तनिक भी शर्म नहीं आती है लेकिन बुन्देली राजनेता दिल्ली जाते ही अंग्रेजी जुबान बोलने लगते है और अंग्रेजी कल्चर में फसकर यहाॅ के बेवस भूखे लोगों से किनारा करने की रणनीति मंे लग जाते है।1947 में प्रख्यात साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन की ओर से शुरू की गई पृथक भोजपुरी राज्य की मांग 1981 में अलग पूर्वाचल राज्य का मुद्दा बनकर खड़ा हो गई। 1981 के अंत में कुछ जगहों पर विधान सभा के चुनाव होने थे। लालगंज (आजमगढ़) विधान सभा उप चुनाव में वीरेन्द्र प्रताप शाही ने अपने संसाधनों से हरिशंकर सिंह उर्फ झिनकू सिंह को पूर्वाचल राज्य बनाने की मांग को लेकर चुनाव लड़ा दिया। इसके बाद वीरेन्द्र प्रताप शाही स्वयं नगर निगम के चेयरमैन पद पर तथा महराजगंज से लोकसभा के लिए पृथक पूर्वाचल राज्य की मांग को लेकर चुनाव लड़े और आसपास के जिलों में विभिन्न कार्यक्रम भी आयोजित किए। उधर, कल्पनाथ राय ने भी पूर्वाचल विकास मंच बनाया और उसी के बैनर तले अपने तथा अपने प्रत्याशियों को चुनाव लड़ाया।

21996 में मधुकर दिघे ने बनारस में प्रभुनाथ मिश्रा, सतरुद्ध प्रकाश, अंजना प्रकाश व श्यामनंदन मिश्र आदि को लेकर पूर्वाचल विकास सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें पूर्वाचल राज्य बनाओ संघर्ष समिति गठित हुई।

जहां एक ओर लालू प्रसाद की अगुवाई वाला राष्ट्रीय जनता दल पूर्वाचंल राज्य के लिये खड़ा है तो पूर्वाचंल का ध्वज लम्बे समय तक धारण करने वाले शतरूद्र प्रकाश और अजंना प्रकाश की चुप्पी कहीं न कहीं सवालिया निशान खड़ा कर रही है। पूर्वाचंल राज्य की मांग जुझारू नेता विस्वनाथ सिह गहमरी ने देश की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा मंे उठाकर 60 के दशक में शुरू की थी। लेकिन आवाज को पूरबिया नेताओं ने सत्ता मिलते ही तिलाजंली दे डाली अभिनेता मनोज कुमार तिवारी  और रवि किसन द्वारा पूर्वाचंल राज्य के पक्ष में खड़े होने के बाद पूर्वाचंल में राज्य आन्दोलन एक बार फिर नई ताकत के साथ कुलांचे भरने लगा है। पूर्वाचंल की राजनीति पर लगे माफिया गिरोह का ग्रहण नये राज्य के गठन मंे सबसे बड़ी बाधा नजर आ रहा है। यहां की जनता अपने अधिकारों के लिये त्राहि -त्राहि कर रही है। लेकिन जगदम्बिका पाल से लेकर मोहन सिंह अलग ही अलाप लगा रहे है। उन्हें अपनी राजनीति के आगे जनता के दुख दर्द समझ नही आ रहे है।  आज का पुरबिया नेता माफिया गिरोहों के मकड़जाल मंे उलझ गया है। इस समय पूर्वांचल के किसी नेता को क्षमता माफिया गिरोहों से टक्कर लेने की नहीं है और पूर्वाचंल के माफिया गिरोह मुख्यमंत्री के दिशा निर्देश पर सुविधा शुल्क लेकर जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत चरितार्थ कर रहे है। इस स्थिति में कौन बनायेगा पूर्वाचंल राज्य यह यक्ष प्रश्न पूर्वाचंल के सामने खड़ा है। पूर्वाचंल की राजनीति पर माफिया गिरोह इस तरह हावी होते जा रहे है कि स्वच्छ राजनीति के पक्षधर लोगों की बोलती बंद हो गयी है। मुख्यमंत्री मायाबती ने विधानसभा में राज्य के  बटबारे  के लिये प्रस्ताव पास कराकर केन्द्र के पास भेजती अथवा राज्य पुनर्गठन आयोग गठन के लिये केंद्र पर दबाव बनाती तो  बुन्देलखण्ड पूर्वाचंल  अबध तथा पश्चिमी उ0प्र0 राज्य के सपने को साकार होने में देर नहीं लगनी चाहिए।

बुंदेलखंड कब-कब उठी मांग
0 बुंदेलखंड राज्य की स्थापना 14वीं षताब्दी में हुई। इसके प्रथम संस्थपाक पंचम सिंह (गढ़ कुंडार) थे। वर्श 1128 में हेमकरण ने इसकी
राजधानी ओरछा बनाई। अकबर के समय वीर सिंह बुंदेला ने इस राज्य का विस्तार किया।
0 महाराजा छत्रसाल ने अपने बाहुबल के आधार पर बुंदेलखंड राज्य की स्थापना की और सीमाए चम्बल, नर्मदा, यमुना और टोंस नदी के परिधि में थी।
0 द्वापर युग में भी बुंदेलखंड का अलग अस्तित्व रहा। तब यह चेदि प्रदेष राजा षिषुपाल तथा दंतवक्र के अधीन थां दोनों ही श्रीकष्श्ण की बुआ के पुत्र थे।
0 1955 में गठित प्रथम राज्य पुनर्गठन आयोग ने बंुदेलखंड के सर्वागीण विकास के लिए इसे अलग राज्य बनाने की सिफारिष की थी।
0 मध्यप्रदेष के विधानसभा में बुंदेलखंड राज्य के लिए पहली बार विधायक ब्रजकिषोर पटैरिया ने की थी।
0 बुंदेलखंड राज्य के लिए 1968 में तत्कालीन मंत्री नरेन्द्र सिंह जुदेव की अध्यक्षता एवं साहित्यकार डा0 वष्न्दावन लाल वर्मा की पहल पर सागर में पूर्व मंत्री बष्जकिषोर पटैरिया के संयोजन में सागर मध्यप्रदेष में सम्मेलन हुआ।
0 1989 में षंकरलाल मल्होत्रा ने नौगांव छावनी में बुंदेलखंड मुक्ति मोरचा की स्थापना की। वह सर्वसम्माति से इसके अध्यक्ष चुने गए। तभी से बुदेलखंड राज्य के लिए आंदोलन षुरू हो गया।

प्रस्तावित जिले
0 उत्तर प्रदेष-बांदा, चित्रकूट, हमरीपुर, महोबा, झांसी, जालौन, ललितपुर।
0 मध्यप्रदेष- छतरपुर, पन्ना, सतना, दतिया, टीकमगढ़, दमोह, सागर।
0 क्षेत्रफल-1.60 लाख वर्ग किलोमीटर (यूपी में 30 हजार वर्ग किलोमीटर)।
0 आबादी-लगभग 3 करोड़ 5 लाख 75 हजार।

समस्याएं
0 उत्तर प्रदेष की राजधानी लखनऊ जाने के लिए 200 से 350 किलोमीटर दूर का रास्ता तय करना पड़ता है। हाई कोर्ट के लिए इलाहाबाद जाना होता है। पाठा क्षेत्र और अविकसित होने से जनप्रतिनिधि और सरकारें विकास की सुध नहीं लेतीं।
0 केंद्र और राज्य सरकारों को बुंदेलखंड से हर वर्श लगभग 500 अरब रूपए राजस्व के रूप में मिलते हैं। लेकिन यहां विकास के लिए मिलने वाला बजट इसका चैथाई भी नहीं होता। उत्तराखंड के आठ जिलों को 425 करोड़ रुपये और छत्तीसगढ़ को 350 करोड़ रुपये मिलते है। जबकि बुंदेलखंड के सात जिलों को मात्र 12 करोड़ और मध्य प्रदेष में आने वाले बुंदेलखंड के छह जिलों को मात्र 20 करोड़ रुपये का बजट आबंटित होता है।

राजनीतिज्ञों का रुख
श्रीमती इंदिरा गांधीःबुंदेलखण्ड के पिछड़ेपन पर चिंतित हूं। यहां के विकास को प्राथमिकता देने के लिए राज्य सरकार प्रस्ताव भेजे तो पूर्ण सहयोग करूंगी। मै योजना आयोग से कहूंगी कि वह पता करे क्या किया जा सकता है।
(सांसद रामनाथ दुबे के पत्र के जवाब में छह फरवरी 1980 को जवाब)
सोनिया गांधीः बुंदेलखंड के विकास के लिए विकास परिशद का गठन कराया जाएगा। मैं यहां की रिपोर्ट मंगा रही हूं।
(2003 में राठ में एक कार्यक्रम के दौरान)
मायावतीः यदि केंद्र तैयार हो हम विधानसभा में बुंदेलखण्ड, पूर्वाचंल, हरितप्रदेष के निर्माण का प्रस्ताव पारित करा सकते है। (9 सितंबर 2007 को लखनऊ रैली को सम्बोधन के दौरान)
सलमान खुर्षीदः कांग्रेस के सत्ता में आने पर बुंदेलखण्ड विकास परिशद का गठन किया जाएगा। इसका उल्लेख आगामी चुनाव घोशणा पत्र में भी होगा।
11 सितंबर 2000 को बांदा में पत्रकार वार्ता के दौरान
रणदीप सिंह सुरजेवालाः बुंदेखण्ड का विकास परिशद का गठन कांग्रेस की सत्ता होने पर। (दस सितंबर 2000 को बांदा में युवक कांग्रेस की मंडलीय क्रांति रैली में)
राहुल गांधीः बुंदेलखण्ड के विकास को कांग्रेस संकल्पित हैं। यहां के पिछड़ेपन और विकास के उपायों का अध्ययन किया जा रहा है।
(जनवरी 2005 में चित्रकूट में पार्टी अधिवेषन के दौरान)
राजनाथ सिंहः बुंदेलखण्ड के विकास के लिए बंदेलखण्ड विकास प्राधिकरण बना देना चाहिए। 12 नवंबर 2006 को मप्र के मुख्यमंत्री षिवराज सिंह चैहान की मौजूदगी में निवाड़ी के गढ़ कुंडार में एक कार्यक्रम के दौरान)
अजीत सिंहः उत्तर प्रदेष के चार टुकड़े किये बिना विकास संभव नही, बुंदेलखण्ड, हरितप्रदष तथा पूर्वाचंल राज्य के लिए हम विधानसभा में आने वाले प्रस्ताव का समर्थन करेंगे। (22 अक्टूबर 2007 लखनऊ प्रेस वार्ता के दौरान)
रामविलास पासवानः विकास के बट वष्क्ष तले सूखता बुंदेलखण्ड को राज्य दर्जा तुरन्त मिलना जरूरी। (बुन्देलखण्डी संसद झांसी में सम्बोधन के दौरान)

बुन्देलखण्ड विकास प्राधिकरण बनाम बुंदेलखण्ड विकास
बुंदेलखण्ड विकास प्राधिकरण
1981-82 में तत्कालीन मुख्यमंत्री वीपी सिंह द्वारा गठन।
राज्य सरकार के अधीन।
मुख्यमंत्री होगा अध्यक्ष।
निर्णय राज्य मंत्रिमंडल के समान।
मंत्रि परिशद की अनुमति जरूरी नहीं।
धन राज्य सरकार देगी।
क्षेत्र को लाभ ऊंट के मुंह में जीरा समान।
बीस करोड़ का बजट। मिले एक करोड़।

बुंदेलखण्ड विकास परिशद
1989-90 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने खत्म की।
संवैधानिक संस्था होगी।
अधिकार क्षेत्र में राज्य सरकार बाधक नहीं है।
केंद्र देगा विषेश क्षेत्र का दर्जा।
अध्यनोपरांत प्रदेष के औसत विकास स्तर पर धन आंबटित।
90 प्रतिषत अनुदान केंद्र सरकार।
षेश दस प्रतिषत राज्य सरकार देगी।

सुरेन्द्र अग्निहोत्री
मो0 9415508695
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