बुन्देलखंड में नये चहरे हो सकते है भाजपा की शान की पहचान..

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  • पुराने पर नहीं लगा रहीं है दांव, नए चेहरो में देख रहीं है विकल्प
  • सांसद उमा भारती, भानू वर्मा, पुष्पेन्द्र चंदेल के अलावा अन्य सांसदो ने 2014 में भारी बहुमत से जीत हासिल की थी

बुन्देलखंड में अस्तित्व बचाने के लिए भाजपा तलाश रहीं है प्रत्याशियों को ताकि 2014 में जो सीटें उनकी रहीं है उनमें कमी न आ सकें। इसलिए जातिगत समीकरण से लेकर अन्य छोटी से लेकर बड़ी बातों पर ध्यान दिया जा रहा है। वहीं भारी बहुमत से जीतें सांसदों पर किसी भी तरह का कोई भी रिस्क संभवत: पार्टी लेने को तैयार नहीं है और लगभग बुन्देलखंड के नए चेहरे उतारने की पूरी मंशा हाईकमान की नजर आ रहीं है। यहीं कारण है कि अब तक नामों की द्योषणा नहीं हुई है।
मिलीं जानकारी के अनुसार बुन्देलखंड में सांसद उमा भारती, भानू वर्मा, पुष्पेन्द्र चंदेल जिन्होने जीत हासिल की थी। हमीरपुर क्षेत्र से पूर्व में सपा सांसद रहें राजनारायण बुधौलिया (रज्जू महाराज) जो कि ब्राम्हण है और क्षेत्र में लोग कयास लगा रहें है कि अब पार्टी ठाकुर पर दांव न लगाकर ब्राम्हण को टिकट देगीं। यहीं कारण है उनको पार्टी में जगह दी गई है। चूंकि पुष्पेन्द्र चंदेल का क्षेत्र में जबरदस्त विरोध है वहीं झांसी क्षेत्र से सांसद रहीं उमा भारती जिन्हें धीमे से दरकिनार करके पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया गया है। इनकी जगह विकल्प के रूप में चेहरे तलाशे जा रहें है और पूर्व भाजपा सांसद गंगाचरण राजपूत जो कि लोधी समाज से आते है उन्होंने भी इस क्षेत्र से अपनी दावेंदारी पेश की है परंतु उनकी दावेंदारी पार्टी में कितना महत्व रखती है यह तो पार्टी के कददावर नेता हीं बता सकतें है। इसके अलावा जालौन गरौठा भोगनीपुर में मौजूदा सांसद भानुृप्रताप वर्मा के विकल्प के रूप में कुछ लोगो ने अपनी दावेदारी ठोंकी थी परंतु उनको लगभग निराशा हाथ लगी है। सपा में विधायक रहें दयाशंकर वर्मा से लेकर घनश्याम अनुरागी ने भी पार्टी में डुबकी लगाकर अपना भविष्य तलाशने का प्रयास किया है। अपने भविष्य को सुरक्षित रखने में कितने कामयाब हो सकतें है यह तो समय और परिस्थितियों पर निर्भर करता है परंतु जो कुछ चुनावी समीकरण निकल कर आ रहें हैं उसमें भाजपा के लिए बुन्देलखंड से सीटें निकालना अब उतना आसान समझ में नहीं आता है जो तिलिस्म मोदी का 2014 में चला था। चूंकि सपा-बसपा में गठबंधन हो चुका है और गठबंधन में भाजपा को हराने के लिए कार्यकर्ता एकजुटता दिखाने का प्रयास कर रहें है इनकी एकजुटता कितनी कामयाब होंगी यह लोकसभा परिणाम पर नजर आयेंगा परंतु दिन प्रतिदिन स्थितियां चुनाव की कठिन होती जा रहीं है। कांग्रेस जो कई दशक से हाशिए पर थी अब उसमें भी थेाड़ा बहुत जोश नजर आया है। हालांकि बुन्देलखंड में वों अपना खाता खोल पाते है या नहीं यह तो मतदाताओं पर निर्भर करता है लेकिन भाजपा में टिकट को लेकर जो उठा पटक चल रहीं है और पार्टी में जिस तरह के अंदरूनी गतिवरोध पैदा हो रहें है और जिन लोगो ने टिकट को लेकर एक लंबी पाली पार्टी में खेलीं है उनको दरकिनार करके अगर बाहरी प्रत्याशी जो जुमां जुमां चार दिन पहले पार्टी में आए है उन पर पार्टी दांव लगातीं है तो निश्चित रूप से यह दांव भाजपा के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। जिस तरह से विधानसभा में अन्य दलों के लोगो को लेकर पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं को दरकिनार करके उनको मौंका दिया है उससे कहीं न कहीं भाजपा कार्यकर्ता नाराज है परंतु नेतृत्व को लेकर वों चुप्पी साधें बैठा हुआ है अगर इसी तरह से लोकसभा में टिकट को लेकर भाजपा हाईकमान सक्रिय न रहा तो बुन्देलखंड से भाजपा का सूपड़ा साफ भी हो सकता है और सीटो में भी जबरदस्त गिरावट आ सकतीं है।