बुंदेलखंड – हमीरपुर में भूजल उपलब्धता, खतरे की घंटी

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untitled-1_r1_c2बुंदेलखंड में वर्ष 2011-12 में जून सितम्बर तक हुई लगातार बारिष ने स्थिति को सम्हाल दिया है अन्यथा भूजल दोहन के कारण पूरे बुंदेलखंड में पानी की विषेष कमी पायी गयी है। बुंदेलखंड के ऐतिहासिक जिले हमीरपुर (1995 तक महोबा जिला हमीरपुर के अंतर्गत था) में तो खतरे की घंटी ही बज गयी थी जहां बुंदेलखंड के जिलों में सबसे अधिक 41 हजार 779 हेक्टेयर मीटर प्रति वर्ष भूजल दोहन हो रहा है।
वर्ष 2010-11 में भारत सरकार के भूगर्भ निदेषालय के द्वारा किये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार वैसे तो उत्तर प्रदेष के 72 में से 40 जिले अति दोहित की श्रेणी में घोषित किये गये है। यहां धरती की कोख से लगातार पानी का भंडार घट रहा है। भूगर्भ सर्वेक्षण के आंकडों के अनुसार यहां प्रति वर्ष एक लाख 92 हजार हेक्टेयर मीटर पानी का दोहन किया जा रहा है जब कि भूगर्भ जल विकास दर दोहन की अपेक्षा अत्यन्त कम है। चित्रकूट मंडल के चारों जिलों बांदा, चित्रकूट, महोबा, हमीरपुर में भूगर्भ जल उपलब्धता 20 लाख 24 हजार 627 हेक्टेयर बताई गयी है जिसमें सबसे कम भूगर्भ जल हमीरपुर (महोबा सहित) में उपलब्ध है। भूगर्भ जल मंत्रालय ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा है कि हमीरपुर के अलावा बंुदेलखंड मंडल झांसी के तीनों जिलों ललितपुर, झांसी और जालौन में जल स्तर घटने से जल संकट बरसात की कमी के कारण हुआ है।
बुन्देलखण्ड का नाम आते ही मन मस्तिष्क में पठारी ककरीली पथरीली जमीन और गरीबी, बदहाली, अभावग्रस्त जीवन जीने वालों लोंगों का चित्र उभरता है। जिन लोगों ने बुन्देलखण्ड के गांवों को देखा है वे एक नजर से ही समझ जायेंगे कि यहां के लोगों का जीवन कितना कठिन है खासकर खेती किसानी से अपनी आजीविका चलाने वाले लोगों का। पानी की अनुपलब्धता यहां की सबसे बडी समस्या है।
बुन्देल खण्ड किसी एक जिले या एक प्रदेष की सीमा में स्थित नहीं है बल्कि यह उत्तर प्रदेष के 7 जिलों और मध्य प्रदेष के 21 जिलों में फैला एक विस्तृत क्षेत्र है। इसी के अंतर्गत विषेष परिस्थितियों वाला यमुना और वेतवा के मध्य बसा हमीरपुर एक जिला है। बुन्देलखण्ड की सीमायें महाराजा छत्रसाल के राज्य में निर्धारित हुयी थीं जो प्राकृतिक रूप से अन्य क्षेत्रों से बंटी हुयी हैं। इसकी सीमा इन पंक्तियों से समझी जा सकती हैं ’’ इत यमुना उत नर्वदा, इत चम्बल उत टोंस। छत्रसाल सो लरन की, रही ना काहू हौंस।।’’ इन पंक्तियों के अनुसार बुन्देलखण्ड के उत्तरी क्षेत्र में यमुना नदी, दक्षिण में नर्मदा नदी पष्चिम मंे चम्बल तथा पूर्व में टोंस नदियां प्राकृतिक सीमायें बनाती हैं। वर्तमान में बुंदेलखंड की एक नयी परिभाषा तय हुई है जो परिस्थित जन्य है। बुन्देलखण्ड की नई सीमा प्राकृतिक आपदा के अनुसार निर्धारित हुयी है। कई वर्षों से पड़ते आ रहे सूखे से राहत देने के लिये केन्द्र सरकार ने बुन्देलखण्ड को एक राहत पैकेज दिया है जिसमें उत्तर प्रदेष के 7 जिले (बांदा, हमीरपुर, महोबा, चित्रकूट, झांसी, जालौन, ललितपुर) तथा मध्य प्रदेष के 6 जिले (दतिया, टीकमगढ, छतरपुर, दमोह, सागर और पन्ना) कुल 13 जिले लिये हैं। इसलिये यदि भीषण सूखा की चपेट वाले बुन्देलखण्ड की बात की जाय तो नयी परिभाषा के अनुसार 13 जिले ही के क्षेत्र को नया बुंदेलखंड कहा जा सकता है।
बुन्देलखण्ड वैसे तो वन सम्पदा, खनिज सम्पदा और षूरवीरता से प्रारम्भ से समृद्ध रहा है, किन्तु प्रकृति ने पठारी अभिषाप दे कर इसे पानी के लिये सदैव तरसते रहने वाला प्यासा क्षेत्र बना दिया है। पानी की कमी का अभिषाप ही बुन्देलखण्ड की सबसे बडी समस्या है जिसके कारण बुन्देलखण्ड के लोग उबर नहीं पा रहे हैं हाॅ यह अवष्य है कि बुन्देलखण्ड के लोग भले ही पानी के लिये तरसते हों किन्तु यहां के लोगों में पानीदारी अर्थात वीरता और षौर्य की कमी नहीं है। भारत के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम सन् 1857 में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने जिस प्रकार झांसी में अंग्रेजों के दांत खट्टे किये थे, बुन्देलखण्ड में यही स्थिति लगभग सब जगह रही। बुन्देलखण्ड में अंग्रेजों को हर जगह कडे संघर्ष का सामना करना पडा। अंग्रेजों को चूंकि बुन्देलखण्ड में जगह जगह मुंह की खानी पडी थी इसलिये जब उनका राज्य स्थापित हो गया तो उन्होंने यहां कम से कम विकास कार्य कराये। आजादी के बाद भी बुन्देलखण्ड की लगभग वही स्थिति बनी रही। यहां का प्रभावी प्रतिनिधित्व न होने तथा वृहद विकासात्मक दृष्टिकोण न होने के कारण बुन्देलखण्ड पिछड़ा का पिछड़ा ही बना रहा। यहां की जो मुख्य समस्या थी पेयजल और सिंचाई के साधनों की आवष्यकता उसमें जो थोड़ी बहुत योजनाएं बुन्देलखण्ड आयीं, वे ऊंट के मुंह में जीरा ही सिद्ध हुई। यहां का किसान सिंचाई की समस्या से ही जूझता रहा। वर्षा आधारित खेती के लिये पिछले 7 साल पहले तक यहां इतनी बरसात हो जाती थी कि काम चलाऊ खेती किसानी हो जाती थी किन्तु पिछले 6 – 7 साल से पड़ रहे लगातार सूखे ने यहां के किसानों की कमर तोड़ दी है इसीलिये यहां लगातार किसानों की आत्महत्या की घटनायें हो रही हैं।
पिछले वर्ष 2009-10 में केन्द्र सरकार ने जो बुंदेलखंड राहत पैकेज की घोषणा की थी उसमें यद्यपि कार्य प्रारम्भ हो गया है किन्तु उसका असर पैकेज का कार्य पूर्ण होने के बाद ही दिखाई देगा। अभी तो फिलहाल समस्या जस की तस है। बुन्देेलखण्ड में गरीबी, भुखमरी, बदहाली की तो समस्या है ही पिछले चार-पांच सालों से यहां धरती फटने की नयी समस्या पैदा हो गयी है जिसने किसानों को संकट में डाल दिया है। धरती फटने की घटनायें भी यहां अत्यधिक जलदोहन के कारण हो रही है।
गत 14 जून 2011 को हमीरपुर जिले के मदारपुर गांव में एक अजीब घटना हुयी रात्रि में 700 मीटर लम्बाई में धरती फट गयी जिसकी चैड़ाई ढाई मीटर तक पायी गयी जबकि गहराई 8 से 10 फीट तक है। वह तो गनीमत है कि धरती का सीना चाक होने की घटना रात्रि में हुई अन्यथा आम जन मानस को किसी बड़ी दुर्घटना का षिकार होना पड़ सकता था। इसी के बाद भरुआ सुमेरपुर में जमीन फटने तथा तीन मकानों में अच्छी खासी दरार पड़ने, एक जुलाई को भिलावा मेरापुर में 220 मीटर लम्बी डेढ़ मीटर चैड़ी दो मीटर गहरी भूमि फटने की घटना हुई है, जिससे वहां के निवासियों में दहषत व्याप्त है। घटना की सूचना मिलने पर यद्यपि उप जिलाधिकारी लवकुष द्विवेदी और अपर पुलिस अधीक्षक घटना स्थल का भ्रमण कर चुके हैं तथा अपनी रिपोर्ट भाी जिलाधिकारी को पे्रषित कर चुके हैं।
बुन्देलखण्ड में धरती फटने की यह कोई नई घटना नहीं है इसके पहले 2007 व 2008 में भी धरती फटने तथा उससे उत्पन्न तरह-तरह की घटनायें हो चुकी हैं। पिछली घटनाओं में धरती फटने से कहीं धुआं निकला था, कहीं पानी निकल पड़ा था और कहीं कहीं जोर जोर से आवाजें आ रहीं थीं जिससे ग्रामीण काफी भयभीत हुये थे। इन घटनाओं की आवाज प्रषासन तक पहुंचायी गयी थी तब प्रषासन ने सुरक्षा की व्यवस्था की थी और घटना स्थलों पर लोगों के आने जाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। जब पहली बार हमीरपुर जिले में धरती फटने की घटना अगस्त 2007 में जिगनी गांव में हुई थी तो उसमें 350 फीट लम्बी और एक फीट चैड़ी दरार हो गयी थी जो ग्रामीणों के लिये कौतुहल का विषय था। दूर – दूर से गांव वाले घटना देखने आ रहे थे, किन्तु ज्यादातर लोगों ने वैज्ञानिक कारण जानने का प्रयास नहीं किया बल्कि देवताओं के नाराज होने तथा बुन्देलखण्ड को श्राप देने जैसी बातें चर्चा में थीं जिनका प्रषासन ने मीडिया के माध्यम से खण्डन कराकर प्रकरण बन्द करा दिया था।
बुन्देलखण्ड में वर्ष 2007 – 08 में धरती फटने की लगातार हो रही घटनाओं के सम्बन्ध में जिला प्रषासन ने षासन को लिखा था तो फरवरी 2008 में वैज्ञानिकों की एक टीम आयी थी जिन्होंने इन घटना स्थलों का मौके पर भ्रमण किया था और अपनी रिपोर्ट तैयार की थी। वैज्ञानिकों ने इसका कारण बताते हुये कहा था कि ’’बुन्देलखण्ड में कई वर्षों से कम वर्षा हुई है जिससे भूगर्भ जल की कमी हो गयी है जबकि जमीन के अन्दर के जल का दोहन बराबर किया जा रहा है जिससे जमीन के अन्दर गैप बन गया है। इसी गैप को भरने के लिये जमीन पर तनाव पैदा हुआ जिसके कारण धरती फट गयी।’’ वैज्ञानिकों ने एक कारण और बताया था जिसमें उनका कहना था कि ’’जिस जगह धरती फटी है उसके नीचे बह रही दो विषाल धाराओं में सम्भवतः प्रभावित क्षेत्रों का भूजल चला गया हो और उसकी वजह से गैप बन गया जिसके कारण धरती फट गयी हो।’’ किन्तु वैज्ञानिकों ने अपने दूसरे तर्क पर उतना जोर नहीं दिया था बल्कि सम्भावना ज्यादा व्यक्त की थी। वैज्ञानिकों का आषय यही था कि बुन्देलखण्ड में पानी की कमी ही इसका मुख्य कारण है।
केन्द्रीय जल आयोग और जल संसाधन मंत्रालय भारत सरकार के जनवरी 2011 के आकड़े बताते हैं कि बुन्देलखण्ड में 4 लाख 42 हजार 299 हेक्टेयर मीटर में भूमिगत पानी बचा है। एक लाख 92 हजार 549 हेक्टेयर मीटर हर वर्ष जल दोहन हो रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वार्षिक दोहन के मामले में बुन्देेलखण्ड में हमीरपुर जनपद सबसे आगे है (ज्ञातव्य है कि 1995 से पहले महोबा जनपद हमीरपुर में सम्मिलित था) हमीरपुर का वार्षिक भूजल दोहन 41 हजार 779 हेक्टेयर मीटर बताया गया है सम्भवतः इसी कारण यहां धरती फटने की घटनाएं अधिक हो रही हैं। सबसे कम भूजल दोहन 10 हजार 642 हेक्टेयर मीटर चित्रकूट में हो रहा है। इन जिलों में भूगर्भ जल विकास दर भी दोहन की अपेक्षा कम है। केन्द्रीय जल आयोग और जल संसाधन मंत्रालय का कहना है कि आने वाले समय में खेतों और लोगों के जीवन यापन के लिये पानी का संकट बढ़ सकता है। भूगर्भ जल की कमी और असन्तुलन के कारण ही धरती फटने जैसी घटनायें हो रही हैं। नयी सदी के पहले दषक में बुंदेलखंड में धरती फटने की कुल 8 घटनायें हुई है जिसमें 6 घटनायें हमीरपुर तथा दो घटनायें बांदा जिले में हुई।
बुन्देलखण्ड में पानी की कमी के सम्बन्ध में भू विज्ञानियों की अपनी अलग राय है। भूगर्भ विज्ञानी सईद उल हक कहते हैं कि बुन्देलखण्ड की पानी की समस्या हमारी खुद की पैदा की हुयी है, यहां बारिष के पानी के संचयन और जल प्रबन्धन को लेकर गम्भीरता से काम नहीं किया गया। यह जानकार आष्चर्य होगा कि बुन्देलखण्ड में दिल्ली के बराबर ही बारिष होती है किन्तु यहां की मिट्टी में ग्रेनाइट होने के कारण जल संचयन में कठिनाई है फिर भी यदि बुन्देलखण्ड में ईमानदारी से जल प्रबन्धन होता तो यह समस्या नहीं पैदा होती। पानी की कमी के कारण ही चित्रकूट मंडल की सबसे कम कृषि उत्पादन वाली सर्वाधिक 18 न्याय पंचायतें हमीरपुर जिले की है।
धरती फटने की घटनाओं के सम्बन्ध में क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की अपनी अलग राय है। उनका कहना है कि बुन्देलखण्ड की नदियों और पहाड़ों में रातदिन अन्धाधुन्ध हो रहा खनन ही मुख्य कारण है। बड़ी-बड़ी औद्योगिक मषीनों से धरती छलनी की जा रही है। नदियों से निरन्तर रेत, मोरम बालू निकाला जा रहा है, पहाड़ों पर विस्फोट किये जा रहे हैं जिससे भूगर्भ जल निकल रहा है इसलिये बुन्देलखण्ड में दैवीय प्रकोप बचाने के लिये तत्काल खनिज दोहन पर प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहिये। लगातार हो रहे खनन के कारण ही धरती फटने जैसी घटनायें हो रही हैं।
बुंदेलखंड में जल की उपलब्धता बढाने तथा भूगर्भ जल स्तर बढाने के लिए बुंदेलखंड राहत पैकेज में अलग-अलग योजनाओं के माध्यम से व्यवस्था की गयी है जिसमें तालाब निर्माण, चेकडैम निर्माण तथा नहरों के निर्माण की योजनायें विषेषकर भूगर्भ जल में वृद्धि के हिसाब से ही बनायी गयी है। बुंदेलखंड राहत पैकेज से वर्ष 2009-10 में 300 करोड़ की लागत से पांच हजार तालाबों का निर्माण, 46 करोड़ से 178 चेकडैम का निर्माण तथा भूमि संरक्षण विभाग की रामगंगा कमाण्ड इकाई को 10 अरब की धनराषि से सिंचन क्षमता बढाने का प्रस्ताव किया गया है जिसमें जाखलौन पम्प कैनाल तथा राजघाट परियोजना की वर्तमान सिंचन क्षमता में वृद्धि 32688 हेक्टेयर से बढ़ाकर 51596 हेक्टेयर किये जाने का प्रस्ताव षामिल है। इसी परियोजना में बुंदेलखंड के वर्षा जल संचायन के लिए मृदा सर्वेक्षण, जल पुनर्भरण कर कृषि उत्पादकता में वृद्धि का भी प्रस्ताव किया गया है। वाटरषेड क्षेत्र के अंतर्गत भूगर्भ जल स्तर को 0.5 मीटर से एक मीटर तक बढ़ाने का प्रस्ताव किया गया है तथा सिंचन क्षमता 10 प्रतिषत से 20 प्रतिषत तक बढ़ाने का लक्ष्य है। इसी प्रकार बुंदेलखंड के अधिकतर एक फसलीय कृषि योग्य क्षेत्रफल को 20 प्रतिषत तक दो फसली बनाने का लक्ष्य है। ये सभी परियोजनायें बंुदेलखंड के उत्तर प्रदेष के सातों जिलों के लिए प्रस्तावित की गयी है। बुंदेलखंड के मध्य प्रदेष क्षेत्र के लिए वहां के लिये आंवटित धनराषि से अलग से योजनायें प्रस्तावित की गयी है। प्रस्तावित योजनाएं अभी निर्माणाधीन की स्थिति में है इनका अभी कोई लाभ भूगर्भ जल वृद्धि में नहीं हो रहा है निर्माण पूरा होने के बाद भले ही इनका लाभ मिल सके।
फरवरी 2008 में वैज्ञानिकों द्वारा रिपोर्ट प्रस्तुत किये जाने पर षासन ने काफी गम्भीरता दिखायी थी, तत्कालीन मुख्य सचिव अतुल कुमार गुप्ता ने कहा था कि जिन स्थानों पर धरती फटी है वहां भूमि संरक्षण विभाग प्राथमिकता के आधार पर भूमि संरक्षण का कार्य करेगा, किन्तु तीन वर्षों के बाद तक अब भी स्थिति जस की तस बनी हुयी है। वर्ष 2007 व 2008 की धरती फटने की घटनाओं के तीन साल बाद पुनः यह घटनाएं हुई हैं जो किसानों और ग्रामीणों के लिये चिन्ता का विषय बनी हुई हैं। प्रषासनिक कार्यवाही के नाम पर उपजिलाधिकारी लवकुष त्रिपाठी और अपर पुलिस अधीक्षक ने घटना स्थल का निरीक्षण कर अपनी रिपोर्ट दे दी है। अब देखना है कि इस पर कोई कार्यवाही होती है? किसानों, ग्रामीणों को कोई राहत मिलती है? या 2008 की तरह केवल आष्वासन ही बनकर रह जाता है।
यह अवष्य है कि इस वर्ष जून-सितम्बर 2011 में हुई अच्छी बारिस ने पिछले 5-7 साल के वर्षा के अभाव का इतिहास बदल दिया है। प्रदेष के अन्य क्षेत्रों की भांति बुंदेलखंड और हमीरपुर में पर्याप्त वर्षा हुई है जिससे यहां के बांध, जलाषय, तालाब, झील, पोखरे आदि भर गये है इनके भर जाने के कारण भूगर्भ जल स्तर भी बढ गया है। किन्तु बंुदेलखंड वासियों को इससे खुष होने की आवष्यकता नहीं है बल्कि बांधों जलाषयों, तालाबों, झीलों में संचित जल को संरक्षित करने तथा वर्षा जल को संचित करने पर विषेष ध्यान देने की आवष्यकता है। यह कोई आवष्यक नहीं है कि इस वर्ष की भांति अगले वर्षो में भी अच्छी वर्षा होती रहे। अधिकतर वर्षो में ऐसा भी होता है कि प्रदेष के अन्य जनपदों में तो संतोषजनक वर्षा होती है किन्तु बुंदेलखंड प्यासा का प्यासा ही रह जाता है। यदि हमने जल संरक्षण वर्षा जल के संकलन और भूगर्भ जल बढ़ाने का प्रयास नहीं किया तो कहीं ऐसा न हो कि गत 5-7 वर्षो की भांति बुंदेलखंड कहीं फिर से न प्यासा रह जाये।

शिव  प्रसाद भारती
गली न0 9, स्वराज कालोनी,
बांदा – 210001 (उ0प्र)
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सुरेन्द्र अग्निहोत्री
मो0 9415508695
upnewslive.com

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