बुंदेलखंड में सूखा व गरीबी छीन रही जिंदगियां

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बांदा-सूखा व गरीबी के चलते बुदेलखंड के हंसते खेलते परिवार तबाह हो रहे हैं। जीवन शैली में बदलाव के साथ आत्महत्या की प्रवृत्ति और मानसिक संतुलन गड़बड़ाने के मामले बढ़े है। पिछले छह माह में करीब 300 लोगों ने जान देने का प्रयास किया, जिनमें से करीब 60 लोगों की मौत हो गयी। इनमें से ज्यादातर मामले आर्थिक तंगी व गृह कलह के हैं।

प्राकृतिक संपदा का माफियाओं ने जबर्दस्त दोहन कर कोढ़ में खाज की हालत पैदा कर दी है। पर्यावरण असंतुलन से सूखे का सिलसिला बढ़ गया है। आजीविका के वैकल्पिक साधनों के लिए बुंदेलखंड में न तो विकास कार्यो को पर्याप्त धन दिया गया और न ही सार्थक औद्योगिकीकरणकराया गया। 1982 में जो औद्योगिक आस्थान तैयार कराये गये थे वे उजाड़ हो गये। फैक्ट्रियां बंद होने से बेरोजगार हुए कामगारों को कहीं खपाने पर ध्यान नहीं दिया गया। इन परिवारों से बुंदेलखंड में आत्महत्याओं की शुरूआत 1996 से ही हो गयी थी लेकिन 1999 के बाद तो खाते-पीते किसान तक बर्बाद होने लगे। एक अनुमान के अनुसार 2003 से 2008 के बीच बुंदेलखंड के 500 किसान-मजदूर आत्महत्या या सदमे की वजह से अकाल मौत का निवाला बने। इतना होने के बावजूद शासन प्रशासन ने इसे संज्ञान में नहीं लिया। बांदा जनपद में सूखा व गरीबी के कारण 1 जनवरी से 9 अक्टूबर तक 300 लोग बाल रंगने वाली डाई, जहरीला पदार्थ, फांसी, आग लगाकर जान देने का प्रयास कर चुके है। इनमें से 60 लोगों की मौत भी हो चुकी है। जुलाई में 14, अगस्त में 15, सितंबर में 11 व 9 अक्टूबर तक 5 लोग काल के गाल में समां चुके है। इनमें से ज्यादातर मामले गृह कलह व आर्थिक तंगी के है। जनपद के ज्यादातर परिवार खेती पर आश्रित है। मरने वालों में 18 से 45 साल के लोग है।

अगस्त में रानीपुर, कमासिन निवासी छुक्कू सिंह ने फांसी लगा ली। यह युवा किसान अपने संयुक्त परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने के लिए संघर्षरत था। पहले सूखे ने आहत किया और कर्ज लेने को मजबूर किया। उम्मीद थी कि धान की फसल अच्छी होगी। बारिश न होने के कारण धान की नर्सरी खेत पर ही सूख गयी। उसकी उम्मीद के दरवाजे बंद हो गये। इसके बाद वह तनाव में रहने लगा। 21 अगस्त को काजीपुर गिरवां, नरैनी निवासी मुन्ना ने आग लगाकर जान दी थी। वह लोगों के खेतों पर काम करके परिवार वालों का भरण पोषण करता था। सूखा पड़ जाने के कारण उसे काम मिलना बंद हो गया। घर में खाने के लाले पड़ने लगे। उसने जो सपना देखा था, वह चकनाचूर हो गया। गरीबी से तंग होकर उसने घर में मिट्टी का तेल छिड़ककर आग ली। अतरहट, चिल्ला निवासी किसान रामराज के कंधों पर बुजुर्ग माता-पिता समेत सात परिजनों की जिम्मेदारी थी। परिवार की आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं थी। आमदनी कम और घर खर्च अधिक होने के कारण उस पर कर्ज हो गया था। परेशान होकर रामराज ने जहरीला पदार्थ खाकर जान दे दी थी। तिंदवारा निवासी कल्ली ने जहर खाकर जान दे दी थी। वजह पति ने भैंस बेचने की कीमत में सौ रुपये खर्च कर दिये थे। क्योंकि परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। 26 सितंबर को रामरतन का पुरवा जसपुरा निवासी होमगार्ड बृजराज सिंह ने खेत पर खड़े पेड़ पर लुंगी से फांसी लगाकर जान दे दी थी। कारण उसे पिछले दो माह से ड्यूटी नहीं मिल रही थी। इस वजह से वह परेशान रहता था। घर खर्च को लेकर उसका पत्‍‌नी से विवाद हुआ था।

मनोचिकित्सक डॉ. वी.के सिंह का कहना है कि किसान व अन्य लोग अपनी क्षमता का सही आंकलन नहीं कर पाते हैं। किसान खेती से बहुत उम्मीद लगा लेते है। जब फसल खराब हो जाती है तो उनके मन में हीन भाव जन्म लेता है और लगातार यही स्थितियां अवसाद का कारण बन जाती हैं। रोगग्रस्त व्यक्ति दुखी व निराश होकर आत्महत्या करने पर उतारू हो जाते हैं।

कार्यवाहक अपर निदेशक/ मुख्यचिकित्साधिकारी एम.पी सिंह का कहना है कि बुंदेलखंड में बाल रंगने वाली डाई पीने की घटनाएं अधिक होती है। इसका मुख्य कारण वह सहज व कम दाम में उपलब्ध हो जाती है। चूंकि डाई में तेजाब होता है, जो पीने के बाद श्वास व आहार नली को जला देता है और व्यक्ति की मौत हो जाती है। डाई की बिक्री पर अभी तक कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। पहले लोग सल्फास या कीटनाशक पीकर जान देते थे। प्रशासन इनकी खुली बिक्री पर रोक लगा दी है, इसलिए खुलेआम नहीं बिक रही है।