प्रेम के वशीभूत हो कर निराकार ब्रम्ह हो जाता है साकार

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राम कथा का आयोजन शुरू

चित्रकूट – ईश्वर को किसी भी चीज को किसी चीज का लालच देकर नहीं प्राप्त किया जा सकता।  वह तो बस नि:स्वार्थ प्रेम का भूखा है। अपना सुख-दुख भूलकर केवल ईश्वर का हो जाने से ही उसकी प्राप्ति होती है। यह भक्त का नि:स्वार्थ प्रेम ही है जो निराकार ब्रम्ह् को साकार बना देता है। नवरात के अवसर पर जानकीकुण्ड स्थित रघुवीर मन्दिर ट्रस्ट बड़ी गुफा में सद्गुरु सेवा संघ ट्रस्ट द्वारा रामचरित मानस कथा का आयोजन किया गया है। जिसमें भोपाल से आए मृदुल जी महाराज संगीतमयी रामकथा का रसपान भक्तों को करा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि मानव सेवा से बढ़ कर कोई सेवा नहीं है। उन्होंने कहा कि राम कथा वह कथा है जो परिवार, समाज, देश का ही नहीं बल्कि तीनों लोकों का कल्याण करती है। उन्होंने कहा कि जिस तरह पवित्रा पावनी मां गंगा से लोग पवित्रा होकर निकलते हैं। उसी तरह रामकथा रूपी गंगा में स्नान करने से हमारा जीवन धन्य हो जाता है। उन्होंने कहा कि भागीरथी गंगा का स्थान तो सीमित है लेकिन रामकथा रूपी गंगा की कोई सीमा नहीं है। रामकथा वाचक मृदुल जी महाराज ने कहा कि जिस प्रकार पवित्रा पावन मां गंगा के द्वारा हर वर्ग के लोगों के लिए खुले हैं उसी प्रकार रामकथा भी बिना किसी भेदभाव के सबका कल्याण करती है। ऐसी महंगाई के समय में भी प्रभु से सस्ता और कुछ नहीं है। ईश्वर को यदि पाना है तो उससे बिना किसी स्वार्थ के ही प्रेम करना होगा। अपना स्वार्थ भूल कर ही मीरा ने कृष्ण की भक्ति की जिस पर रीझ कर ही मीरा को दिया गया जहर उन्होंने अमृत में बदल दिया था।  जहां सुमति तहां संपति नाना, जहां कुमति तहां विपति निधाना। की व्याख्या करते हुए कहा कि महाराज मनु और रानी सतरूपा की सुमति के कारण ही उन दोनों ने परमात्मा के दर्शन किए थे। कहा कि भगवान किसी को कष्ट नहीं देते बल्कि कष्टों का निवारण करते हैं। उन्होंने कहा कि हमारा देश ऋषि और कृषि प्रधान देश है। ऋषि मुनियो ने यज्ञ हवन करके भगवान राम को प्रगट किया और महराज जनक ने हल चलाकर सीता को प्रगट किया। बच्चों को प्रेरणा देते हुए कहा कि उनके लिए तो माता-पिता ही साक्षात ईश्वर हैं। एक भक्त भगवान की सेवा करके जितना पुण्य कमाता है उससे कहीं ज्यादा पुन्य  माता-पिता की सेवा करके प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि चैत्रा मास शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन भगवान राम ने अवतार लिया था इसी लिए यह चैत्रा मास का प्रमुख महत्व है। इसी माह में ही तुलसीदास की रामचरित मानस का प्रादुर्भाव हुआ था। रामचरित मानस मात्रा सुनन के लिए बल्कि अपने जीवन में उतारने के लिए है। तभी हम सबका कल्याण होगा।