प्यासी द्रोपती की प्यास बुन्देलखण्ड में भीम ने कैसे बुझाई..

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छतरपुर-सागर हाईवे स्थित बड़ामलहरा से लगभग 30 किमी दूर सुरम्य पहाड़ियों के बीच स्थित भीमकुण्ड बुंदेलखण्ड के प्रमुख तीर्थों में शुमार है। ऐसा माना जाता है कि यहां स्नान करने से सारे पाप धुल जाते हैं। मकर संक्रांति पर यहां डुबकी लगाने का विशेष महत्व माना जाता है। इसलिए प्रतिवर्ष मकर संक्रांति पर यहां भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। जिसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं।

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इस कुण्ड को लेकर प्रचलित लोकोक्ति के अनुसार भीमकुण्ड का संबंध महाभारत काल से है। अज्ञातवास के दौरान पांडवों के लिए जंगल और पहाड़ ही आसरा हुआ करते थे। कई दिनों से कोई जलाशय न मिलने के कारण एक दिन उनके पास उपलब्ध पानी खत्म हो गया। इसी बीच एक पहाड़ पर पहुंचने के बादा द्रोपदी को प्यास लगी, तो उन्होंने पानी पीने की इच्छा जताई। लेकिन दूर-दूर तक कोई जलस्त्रोत नहीं था। भीम ने अपनी गदा से प्रहार किया तो पहाड़ के बीच जमीन धंस गई और पानी की धार फूट पड़ी।तब द्रोपदी सहित पांडवों ने जलपान किया। नील की तरह हमेशा नीला रहता है यहां का पानी। कुण्ड का आकार भी गदा जैसा भीम द्वारा बनाए जाने कारण ही इसका नाम भीमकुण्ड पड़ा। पहाड़ के ऊपर से देखने पर कुण्ड का आकार आज गदा की भांति प्रतीत होता है। कुण्ड की यह खासियत है कि इसका पानी हमेशा साफ और नीला रहता है।अठारवीं सदी के अंतिम दशक में विजावर रियासत के राजा ने मकर संक्रांति पर यहां मेले का आयोजन किया। तब से यहां मेला लगाने की परंपरा अनवरत चली आ रही है।