पारंपरिक तरीके से मनाया गया करवाचौथ, सुहागिनों ने चाँद देख कर खोला व्रत..

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झांसी में करवा चौथ का व्रत पारंपरिक तरीके से मनाया गया। शुक्रवार को करवा चौथ के पर्व पर महिलाओं ने व्रत रखा और अपने पति की लंबी उम्र के लिए भगवान से प्राथना की। दिनभर सामूहिक रूप से एकत्रित होकर महिलाओं ने करवा चौथ की पौराणिक कथाएं सुनी।

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करवा चौथ पर सुबह से महिलाये अपने पतियों के साथ बाजार जाकर करवा चौथ की पूजा का सामान खरीदा। बाजारों में आज मिठाई की खूब बिक्री हुई। साथ में ब्यूटी पार्लरों में काफी संख्या में भीड़ देखी गई। करवा चौथ का पूजन करते समय सबसे पहले विवाहित महिलाएं छलनी से चंद्रमा को देखा उसके बाद में अपने पति को देखा। फिर पति के चरण छूकर आशीर्वाद लिया। उसके बाद पति के हाथ से पानी पीकर अपना व्रत तोड़ा।

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क्या है करवा चौथ की कहानी?
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को करवा चौथ का ब्रत रखा जाता है। इस दिन महिलाएं चंद्रमा की पूजा करके अपना व्रत पूरा करती है। चंद्रमा की पूजा को लेकर कई प्रकार के मत है। कहा जाता है कि रामचरितमानस के लंका कांड के अनुसार, जिस समय भगवान राम समुद्र पार कर लंका में स्थित सुबेल पर्वत पर उतरे और श्रीराम ने पूर्व दिशा की और चमकते हुए चंद्रमा को देखा तो अपने साथियों से पूछा कि चंद्रमा में जो कालेधब्बे दिख रहे है वे क्या है? भगवान राम की सेना में सभी ने अपने-अपने मत रखे। तब भगवान राम ने बताया कि जहर चंद्रमा का प्यारा भाई है। इसीलिए उसने विषको अपने ह्रदय में स्थान दे रखा है, इसी वजह से चंद्रमा में काले धब्बे दिखाई देते है। यह चंद्रमा अपनी विष से भरी हुई किरणों को चारों और फैलाकर नर-नारियों को जलाता रहता है। इससे मनौवैज्ञानिक पक्ष निकलकर आता है कि जो पति-पत्नी किसी कारण वश एक-दूसरे से दूर जाते है, चंद्रमा की विषयुक्त किरणें उन्हें अधिक कष्ट पहुंचाती है। इसलिए करवा चौथ के दिन चंद्रमा की पूजा कर के सुहागिने भगवान से यह प्रार्थना करती है कि कसी भी कारण उन्हें अपने पति से जुदा ना होना पड़े। यही वजह है जिससे सुहागिने करवा चौथ के दिन चंद्रमा की पूजा करती है।

पंच तत्व का प्रतीक माना जाता है करवा
मिट्टी का करवा पंच तत्व का प्रताक माना जाता है, मिट्टी को पानी में गला कर बनाया जाता है जो भूमि और जल तत्व का प्रतीक है, उसे बनाकर धूप और हवा से सुखाया जाता है जो आकाश तत्व और वायु के प्रतीक है फिर आग में तपाकर बनाया जाता है। भारतीय संस्कृति में पानी को ही परब्रह्म माना गया है, क्योंकि जल ही सब जीवों की उत्पत्ति का केंद्र है। इस तरह मिट्टी के करवे से पानी पिलाकर पति पत्नी अपने रिश्ते में पंच तत्व और परमात्मा दोनों को साक्षी बनाकर अपने दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने की कामना करते हैं।

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