नारी का अपमान पुरुष की दोहरी मानसिकता की परिचायक-आचार्य प्रपन्नाचार्य जी महाराज

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चित्रकूट- स्त्री का सम्मान ही जीवन जीने की कुंजी है जो सफलता के द्वार अपने आप खोल देता है। एक तरफ मां के रूप में पूजा और दूसरी तरफ महिलाओं का अपमान पुरुषों की दोहरी मानसिकता का परिचायक है। अब इसे बदलना आवश्यक है क्योंकि कोई भी बुराई ज्यादा दिनों तक नही टिक सकती।

आचार्य प्रपन्नाचार्य जी महाराज ने मुख्यालय के पुरानी बाजार स्थित प्राचीन हनुमान जी मंदिर के बाहर मुक्ति धाम समिति द्वारा आयोजित देवी भागवत के दूसरे दिन यह बातें कहीं।

उन्होंने नारी शक्ति के त्याग और बलिदान की चर्चा करते हुये कहा कि एक तरफ तो हम लक्ष्मी, सरस्वती, अंबे और दुर्गा को बुलाना चाहते हैं। फिर दूसरी तरफ अपने घरों में बैठी नारी शक्ति का अपमान क्यों करते हैं। आचार्य जी ने गृहस्थ धर्म के सूत्रों पर चर्चा करते हुये कहा कि गृहस्थी की गाड़ी महिला और पुरुष दो पहियों पर आधारित होकर चलती है। एक भी पहिया कमजोर हुआ या फिर खराब हुआ तो कठिनाई आ जाती है। दोनो को चाहिये कि छोटी-छोटी बातों में कटुता लाने के बजाय प्रसन्न रहकर जीवन जियें। कथा के दौरान बीच-बीच में सुमधुर भजनों से वातावरण काफी आनंदित हो रहा था। इस दौरान भारी संख्या श्रद्धालु मौजूद रहे। महिलाओं की भागीदारी सर्वाधिक दिखाई दी।

कथा के बीच में आचार्य प्रपन्नाचार्य जी महाराज ने जल संकट के प्रति आगाह करते हुये कहा कि पवित्र नदियों पर कचरा डालना श्रद्धा नही ढ़कोसला है। उन्होंने कहा कि नदी में कुछ भी न डाला जाये। यहां तक कि उन्होंने नदी में पूजा में चढ़ाये जाने वाले पुष्पों को भी डालना गलत बताया। विकल्प के तौर पर कहा कि नदी में डालने की अपेक्षा पुष्पों को किसी वृक्ष के नीचे रखा जा सकता है। सूख जाने पर वे स्वयं ही धूल हो जायेंगे।

उन्होंने लोगों को प्रेरित करते हुये कहा कि आपकी मां मंदाकिनी कष्ट से कराह रही है उसे बचाने के लिये सभी को आगे आना ही पड़ेगा। अन्यथा इसकी मौत से सभी की मौत निश्चित है। नदी को बचाने के लिये उन्होंने देवी प्रतिमाओं को भू विसर्जित किये जाने का आवाहन किया।

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