नववर्ष के उपलक्ष्य में साहित्यक गोष्ठी संपन्न

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प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वावधान में लक्ष्मीप्रसाद गुप्त की अध्यक्षता में नववर्ष के उपलक्ष्य में साहित्यक गोष्ठी बबेरू में संपन्न हुयी। गोष्ठी का संचालन शिशुपाल ने किया।

नववर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित गोष्ठी में सरस्वती वंदना के पश्चात रमाशंकर मिश्र ने सुनाया कि ‘राष्ट्र ब्यौम में घिरो वर्ष नव,सुधा वृष्टि कर गरल हरो। अपनी मां की काया धूमिल, कल्पलता को धवल करो।’ लक्ष्मीप्रसाद गुप्त ने पढ़ा कि ‘नववर्ष नव कूज सर्वत्र आनंद, नूतन वर्ष उमंगो का, इंद्र धनुष के रंगों का, स्वेद सृजन ने मांगा है साथ कलेंडर टांगा है, दाग न हो अब दंगों का, मेला लगे तिरंगो का।’ राजेंद्र दीक्षित ने कहा कि ‘नव वर्ष तुम्हारा अभिनंदन, आगमन-गमन दोनो शुभ हों, संसार मनाये नव खुशियां।’ शिक्षक अमरनाथ ने गाया कि ‘नव वर्ष तुम्हारा अभिनंदन, अर्पित तुमको मेरा वंदन, इस वीर प्रसूत धरती पर न पाक बचे और न लंदन।’ मनोज मर्दन ने पढ़ा कि ‘बूढ़ा दरिया सिमट कर बहता जाता, झुके हुये कंधो से जल का बोझ उठाता।’ डा.रामकिशोर विद्यार्थी ने पढ़ा कि ‘मन रे सम्मुख देख उजाल, अंधियारी जाने वाली है।’ शिक्षक नत्थीलाल ने कविता पाठ किया। शिशुपाल ने कविता के माध्यम से संदेश दिया। रामचंद्र सरस ने खजुराहो का वर्णन किया कि ‘मै तलाशता रह उकेरने वाले हाथों के नाम, वे नहीं मिले, सोंचता रहा आखिर क्यों नहीं होती ऐसे हाथों की पहचान, तब से आज तक।’ केशव प्रसाद मिश्र ने कहा कि ‘दो हजार दस क्या तुम भी वैसा करोगे, अनुज 2009 की राह पर चलोगे, करना चाहते हो तो कुछ ऐसा करो कि स्वर्णिम पल बन जाओ काल के।’ परमेश्वरी दयाल तिवारी ने सुनाया कि ‘आर्या वर्ष नवल लाया हर्ष नवरत्‍‌न, कैसा था अपना बीता हुआ कल, इसका करना है मंथन।’ के साथ आये हुये सभी प्रबुद्धजनों व कवियों का आयोजकों ने आभार जताया।