धरती रेगिस्तान में तब्दील हो रही है

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महोबा- लगातार 6 वर्ष से जारी प्रकृति प्रकोप के कारण जिले के सैकड़ों गांव रेगिस्तान में तब्दील हो रहे है। वर्षा न होने से कृषि चौपट हो गई है। तंगहाली के शिकार दर्जनों लोग मर गये और लाखों पलायन कर गये। बांध सूखने से धरती के ऊपर का पानी रहा नहीं। अनावृष्टि से भूगर्भीय जल भी समाप्त हो गया है। कम उत्सर्जन वाले छोटे बोर छोड़ दें तो एक हजार फिट गहराई में भी पानी न मिलना यहां की उपजाऊ भूमि को रेगिस्तान में तब्दील करने की इबारत लिखता दिखाई देता है।

महोबा बुंदेलखंड का सर्वाधिक बांधों वाला इकलौता जिला है। पर यहां पूरी धरती पठारी है। विन्ध्य पर्वत श्रंखलाओं से भरपूर पूरी धरती में प्रकृति की तमाम अकूत संपदायें है। जीवन की संजीवनी पानी नहीं है। भूगर्भ वैज्ञानिक मुइनुद्दीन के अनुसार धरती के नीचे भारी मात्रा में पत्थर होने के कारण इसकी जल संग्रहण क्षमता वैसे भी कम है। सभी जगह पानी होने की बजाय यहां पानी के छोटे-छोटे पाकेट ज्यादा है। हजार साल पहले पठारी धरती की इसी विशेषता को ध्यान में रख चंदेल राजाओं ने दर्जनों बड़े तालाब बनवाये थे। वर्षा से यह तालाब भर जाते थे और भूजल स्तर को कायम रखते थे। इधर बीते 6 साल से ठीकठाक वर्षा न होने से तालाब और बांध खुद प्यासे रह गये। धरती की प्यास नहीं बुझी। सीधा असर भूगर्भीय जल पर पड़ा। जहां पचास फिट में पानी निकल आता था। वहां अब ढाई सौ फिट तक पानी नहीं है। बीते तीन माह में ही जल स्तर 28 फिट खिसक गया है। इस वर्ष का सूखा पिछले वर्षो की तुलना में ज्यादा भयावह और विनाशकारी साबित होगा। कारण 2007 के सूखे की तुलना में इस बार सारे बांध चार माह पूर्व ही जवाब दे गये है। सावन भादौं में ही सभी बांधों के डेड लेबिल पर आ जाने से रबी की फसल होना पूरी तरह नामुमकिन हो गया है। बांधों की जल स्थिति इससे पूर्व कभी इतनी खराब नहीं रही। 2007 के सूखे में भी अर्जुन, उर्मिल व कबरई जैसे बड़े बांधों ने मार्च तक साथ दिया था। इससे बीस प्रतिशत रबी की फसल हो गई थी। चिंता की सबसे खास वजह यह है कि बीते 6 वर्षो से बांधों का जल स्तर लगातार गिर रहा है। इनमें पर्याप्त पानी न रहने से भूगर्भीय जल स्तर भी अप्रत्याशित रूप से नीचे खिसक रहा है। 2007 के सूखे के दौरान तत्कालीन जिलाधिकारी ने भूगर्भीय जल खोजने के लिये केंद्रीय टीम बुलाई थी। टीम ने दो एक हजार फिट गहरे बोर किये और पानी नहीं मिला। जल संस्थान के अवर अभियंता एनपी वर्मा स्वीकारते है कि विभाग के नये ट्यूबवेलों की जल निकासी अभी से घटने लगी है। जाहिर है नवंबर दिसंबर आते-आते यह जवाब देने की स्थिति में आ जायेंगे। 250 से 300 फिट बोर के जिले के पांच सौ से ज्यादा हैण्डपंपों का असफल हो जाना भी समस्या की भयावह परिणति को रेखांकित करता है। मुख्य बात यह है कि मुख्यालय सहित विभिन्न कस्बों व गांवों में रह रहे लगभग तीन लाख लोगों की जलापूर्ति भी इन्हीं बांधों तालाबों पर आश्रित है। बांधों के अभी से डेड लेविल पर आ जाने से न धरती के ऊपर पानी है और न भीतर ऐसे में यहां की भूमि के रेगिस्तान में तब्दील होने का रास्ता बनता स्पष्ट दिखाई दे रहा है।