तुलसी की खेती लाभप्रद

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उरई- जन सामान्य की धार्मिक भावनाओं से जुड़ी तुलसी की खेती लाभप्रद है। इसकी खेती में कम सिंचाई में भरपूर फसल होती है। तुलसी का अर्क कफ सीरप में प्रयोग किया जाता है। इस कारण तुलसी को व्यापारिक उपज की श्रेणी में रखा जा सकता है।

कृषि वैज्ञानिक डा.राजीव सिंह ने बताया कि बरसात के दिनों में बोई जाने वाली तुलसी की फसल 90 दिन में तैयार होती है। यदि बरसात अच्छी हो तो पानी की कोई आवश्यकता नहीं होती। यदि वर्षा कम हुयी हो तो एक या दो बार ही पानी लगाने की जरूरत पड़ती है। जबकि मैथा की खेती 120 दिन में तैयार होती है और जनवरी-फरवरी में इसकी बुवाई होती है। पहली कटिंग 120 दिन बाद, दूसरी कटिंग 70 दिन बाद की जाती है। यही नहीं मैथा की खेती में 12 से 15 बार पानी भी लगाना पड़ता है। उन्होंने बताया कि मैथा की खेती में लागत 10 से 15 हजार रुपये प्रति एकड़ आती है जबकि तुलसी की खेती में प्रति एकड़ 6 से 7 हजार रुपये ही लागत आती है। मैथा आयल 100 लीटर प्रति एकड़ तथा तुलसी अर्क 40 लीटर प्रति एकड़ निकलता है। मैथा आयल 500 से 600 रुपये लीटर बिकता है जबकि तुलसी अर्क 1200 से 1500 रुपये प्रति लीटर तक बिकता है। तुलसी की विशेषता है कि पत्ती तथा तना दोनों से अर्क निकाला जाता है। बुंदेलखंड क्षेत्र में पानी की कमी को देखते हुये तुलसी की खेती ज्यादा मुफीद है। कफ सीरप के लिये इसका अर्क बेहद कारगर होने के कारण फार्मेसी उद्योग में तुलसी के अर्क की मांग बहुत ज्यादा है।

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