तब किसानों का दर्द नहीं पूछा, अब कैसे सुनें किसान उनकी बात

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हमीरपुर (उत्तर प्रदेश)। दो साल पहले सूखे के दौर में सरीला और हमीरपुर तहसील में कई किसानों की मौतें हुई। कारण सूखे से फसल का उत्पादन न हो पाना और किसानों को खाद, बीज, पानी समय पर न मिल पाना था। आज किसानों की यह मौतें चुनाव के दौरान मुद्दा बन गयी हैं।

मुस्करा क्षेत्र में लोधी बिरादरी के किसान के जब मटर की फसल खराब हो गयी और वह ट्रैक्टर के कर्ज की अदायगी नहीं कर पा रहा था, तो उसने मौत को गले लगाया। सुमेरपुर थाने के कंडौरा में कुशवाहा बिरादरी का एक किसान जब दाने-दाने को मोहताज हो गया, तो उसने भी जिंदा रहना उचित नहीं समझा। यही सब हाल तो सरीला तहसील के किसानों का रहा। इन पीडि़त किसानों को न तो किसी प्रकार की सहायता मिली, अलबत्ता सूखे आश्वासन जरूर मिले। जनता इस मुद्दे पर बहुत गंभीर है। वह अपने दुख दर्द को भुला नहीं सकी है, जिसका असर चुनाव में साफ दिखायी पड़ेगा। किसानों की मौतों को तत्कालीन सरकारों ने नजर अंदाज किया था। तो जनता अपने दर्द कैसे भूल सकती है। हालांकि हालात में अभी भी सुधार नहीं आया है। किसान को जब खाद, पानी की जरूरत होती है, तो नहीं मिलती और अब वह अपना उत्पाद लेकर क्रय केंद्रों में जाता है, तो लंबी लाइन लगवायी जाती है और बाद में निराश किसान बिचौलियों को 950 रुपये में गेहूं बेचकर चला आता है। जबकि बिचौलिए इससे 130 रुपया प्रति क्विंटल कमाई करते हैं। किसानों का यह दर्द इस चुनाव में रंग लायेगा।  किसान कहते हैं कि अब हमारी बारी है, हम हिसाब किताब पूरा करेंगे