झांसी जिला अस्पताल में गंभीर बीमारियों का इलाज संभव नहीं

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देश को गणतंत्र बने इकसठ साल हो गए, लेकिन अभी भी झांसी जिला अस्पताल में गंभीर बीमारियों का इलाज संभव नहीं है। स्टाफ और संसाधनों के अभाव का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यह प्रतिदिन सत्ताइस चिकित्सक दो हजार मरीजों को परामर्श देते हैं। डेढ़ सौ से ज्यादा पलंग हमेशा भरे रहते हैं। मरीजों को बेहतर सुविधाओं के लिए मेडिकल कालेज या प्राइवेट नर्सिंग होम
के भरोसे रहना पड़ता है। जिला अस्पताल में प्रतिवर्ष मरीजों की संख्या में वृद्धि होती जा रही है। बावजूद इसके संसाधनों का टोटा बना है। शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्र की आसपास की ७ लाख आबादी को जिला अस्पताल कवर करता है। यहां प्रतिदिन पंद्रह सौ से दो हजार मरीज इलाज के लिए आते हैं, यानी एक वर्ष में करीब सात लाख मरीज आते है। अस्पताल में ७ वार्ड और इनमें १५६ बेड हैं। सामान्य दिनों में ९५ प्रतिशत पलंग मरीजों से भरे रहते हैं। यहां चौबीस घंटे इमरजेंसी संचालित की जाती है, लेकिन मात्र दो एंबुलेंस हैं। हमेशा भीड़ वाले अस्पताल में मात्र २७ चिकित्सक हैं, जबकि सृजित पद ४६ हैं। उक्त चिकित्सकों को ओपीडी, पोस्टमार्टम, मेडिकोलीगल, आपरेशन और वार्ड में मरीजों की देखभाल करनी पड़ती है। हड्डी, सर्जरी, एनेस्थेटिक, ईएनटी, कार्डियोलाजिस्ट व डेंटल विभाग में मात्र एक – एक चिकित्सक हैं। अगर कोई चिकित्सक लंबी छुट्टी पर चला जाता है तो ओपीडी बंद कर दी जाती है। वहीं, महत्वपूर्ण व गंभीर माने जाने वाले त्वचा रोग, न्यूरोलॉजिस्ट (नस व दिमाग रोग), साइकोलॉजिस्ट (मनोचिकित्सा), प्लास्टिक सर्जन, नेफ्रोलाजिस्ट (गुर्दा रोग) व गेस्ट्रोएंट्राइटिस (पेट रोग) का एक भी डाक्टर नहीं है।

इस कारण मजबूरन मरीजों को मेडिकल कालेज या प्राइवेट अस्पताल पर निर्भर रहना पड़ता है। नियमतः अस्पताल में लाउंड्री सर्विस होनी चाहिए, जिससे कपड़े अच्छी तरह से साफ हो सकें। लेकिन, गंदे कपड़ों की सफाई बाहरी धोबी के हवाले हैं। मरीजों की देखभाल के लिए पैरामेडिकल स्टाफ का भी टोटा है। यहां ७५ स्टाफ नर्सों की जरूरत है, लेकिन तैनाती मात्र २६ की है। फार्मासिस्ट भी आठ की जगह मात्र चार तैनात हैं। यह हालात जिला अस्पताल के हैं तो ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित सीएचसी, पीएचसी व एडिशनल पीएचसी की स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। अस्पताल के प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक डा. महावीर सिंह का कहना है कि सुविधाओं को बढ़ाए जाने का प्रयास किया जा रहा है।


Vikas Sharma
Editor
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