जड़ी-बूटी उत्पादन विकसित न होने से सिमटने लगीं फार्मेसियां

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जालौन- जड़ी-बूटी के उत्पादन में सकारात्मक प्रयास न होने से यहां पर खुलने वाली फार्मेसियां भी धीरे-धीरे कम होने लगी है और अस्पतालों में मिलने वाली तमाम औषधियों की बजाय अब केवल चूर्ण मिलने से लोग इस चिकित्सा पद्धति से विमुख हो रहे है। खास बात यह है कि जिले में कोई सरकारी आयुर्वेदिक शल्य चिकित्सक भी नहीं है।

जिले में आयुर्वेदिक औषधियों की मांग में कुछ समय पूर्व काफी बढ़ोत्तरी हुयी थी, जिसका परिणाम यह था कियहां पर कई फार्मेसियों का पंजीकरण कराया गया था। वैसे हर 3 वर्ष में मात्र 1200 रुपये देकर इनका नवीनीकरण हो जाता है परंतु कई फार्मेसियों ने अपना नवीनीकरण कराने के लिये इतना शुल्क जमा करना भी गवारा नहीं समझा। वर्तमान में जिले में सिर्फ 23 फार्मेसियां ही पंजीकृत रह गयीं है। इसका कारण यह भी रहा कि सरकारी सुविधाओं के साथ ही उनको जड़ी-बूटी नहीं मिल सकीं।जनपद ललितपुर में मिट्टी को उपयुक्त बताकर 150 एकड़ भूमि मे आयुर्वेदिक निदेशालय ने अर्जुन, बेड़, कवा, तुलसी, नीम, शंखपुष्पी के उत्पादन की योजना बनायी थी लेकिन उसे भी अंजाम पर नहीं पहुंचाया गया।

क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी डा.के जैन ने भी माना कि जड़ी-बूटियों की उपलब्धता सहज न होने की वजह फार्मेसियां बंद होने लगी है। उन्होंने बताया कि सफेद मूसली, नागरमोश, हर्र, बेहड़ी, आंवला आदि से दवाओं का उत्पादन होता है। 7-8 माह पूर्व सीडीओ एसपी अंजोर ने उद्यान विभाग को निर्देशित किया था कि जिले में इसके उत्पादन को बढ़ाने हेतु आयुर्वेदिक कार्यालय के सहयोग से प्रोजेक्ट तैयार करे लेकिन इस ओर अभी तक एक कदम आगे नहीं बढ़ाया गया। वैसे जिले में सीएमओ की देखरेख में आयुर्वेदिक-यूनानी-होम्योपैथी चिकित्सा को बढ़ावा देने के लिए आयुष गवर्निग बॉडी भी बनी हुयी है परंतु इसकी कार्यविधि इसी बात से समझी जा सकती है कि आज तक इस निकाय की कोई बैठक ही नहीं हुयी।

आयुर्वेद में काया चिकित्सा, बाल रोग, शल्य चिकित्सा, विष रोग चिकित्सा, बाजीकरण चिकित्सा विधियां मुख्य रूप से है। पहले आयुर्वेदिक अस्पतालों में भस्म, रस, अवलेह आदि मिलते थे परंतु वर्तमान केवल चूर्ण ही दे दिया जाता है। इस कारण आयुर्वेदिक उपचार की व्यवस्था अधूरी साबित हो रही है। डा. जैन का कहना है कि पहले आयुर्वेदिक निदेशालय औषधियां भेजता था परंतु अब रानीखेत स्थित आयुर्वेद विकास सहकारी समिति से दवाएं आती है। हालांकि एक रुपये के पर्चे पर ही 15 दिन की दवा दी जाती है। उन्होंने माना कि जिला आयुर्वेदिक चिकित्सालय में शल्य चिकित्सक का होना आवश्यक है। जिले में 30 अस्पतालों में से सिर्फ 7 के निजी भवन है। बाकी किराये के भवनों में संचालित है। हालांकि गधेला और माधौगढ़ में चिकित्सालयों का निर्माण चल रहा है। डा. जैन संसाधनों की कमी तो नहीं स्वीकारते परंतु उन्होंने भी माना कि पहले की तुलना में अब मरीज कम आ रहे है। उल्लेखनीय है कि कई अस्पतालों में चिकित्सक भी समय से नहीं बैठते।

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