ज्यों-ज्यों दवा हुई बढ़ता गया मर्ज, अरबों खर्च पर नहीं बुझी प्यास

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महोबा। कुशल प्रबंधन के अभाव और स्थायी समाधान का प्रयास न होने से अरबों का खर्चा बेकार चला गया। योजनाओं में ईमानदारी के अभाव से ज्यों- ज्यों दवा दी गई मर्ज बढ़ता गया। अब भी सारा दारोमदार वर्षा जल पर आश्रित है। गर्मी शुरू होते ही पेयजल की मारा मारी शुरू हो गई है। गांव देहात तो दूर मुख्यालय में भी हाहाकार है। कारण यह है कि किसी जन प्रतिनिधि ने इस दिशा में ठोस व कारगर प्रयास की भी जरूरत नहीं समझी । सारी जन सेवा चहेतों के घर के पास है योजना हैंडपम्प लगवाने तक सीमित रह गई।

बीते चार साल जनपद के लिये भारी जलसंकट के रहे। हालत यह थी कि मुख्यालय सहित विभिन्न स्थानों की जलापूर्ति टैकरों द्वारा करनी पड़ी । शासन व प्रशासन की सक्रियता से प्यास से मौतें तो नहीं हुई पर बाकी सारी दुर्दशा हुई । बावजूद इसके जन प्रतिनिधियों ने जनजीवन से जुड़ी इस अहम समस्या को खास तरजीह नहीं दी । उनकी सारी जनसेवा अपने चहेतों के घर के पास हैन्डपम्प लगवाने तक सिमट कर रह गई । निधि में कमीशन के खेल के चलते इसमें भी भारी कंजूसी हुई । सीसी सड़क व अन्य निर्माण की तुलना में पानी के मद मे एक चौथाई पैसा भी जनप्रतिनिधि नहीं दे सके। जल प्रबंधन से जुड़े विभागीय अधिकारी भी स्थायी विकास की जगह कमाई की योजनायें बनाने को ज्यादा तहरीर देते है। 27 करोड़ की महोबा पुनर्गठित पेयजल योजना इसका नमूना है। इस बांध के पहले ही नदी के मध्य प्रदेश क्षेत्र में एक दर्जन से ज्यादा बड़े चेकडेम बन चुके है इससे पर्याप्त वर्षा होने पर ही यहां पानी आयेगा । गत वर्ष सूखे के दौरान सभी ने स्वीकार किया था कि उर्मिल बांध का विकल्प मान इसकी बड़ी योजना का कोई औचित्य नहीं है। । चूंकि 20 करोड़ से ज्यादा फुंक चुका है इस कारण तथ्यहीन तर्क दे इसे भविष्य में केन बेतवा गठजोड़ व अर्जुन सहायक परियोजना से जोड़ने का ख्वाबी पुलाव पकाया जा रहा है। सतही हकीकत है कि जल संचयन योजनाओं को अमली जामा पहनाये बिना अन्य कोई विकल्प नही जल संरक्षण की 1000 हजार वर्ष पुरानी चंदेल कालीन विधाओं का अनुसरण हो जाये तो सारी समस्या समाप्त हो जाये । सिंचाई विभाग के लिये यह कार्य सोने का अण्डा देनेवाली मुर्गी है। दो वर्ष पूर्व मुख्यालयों के तीन जलाशयों की खुदाई मे चार करोड़ रुपया व्यय किया गया पर मिट्टी चार इंच तक नहीं हट पाई । एकबार फिर 28 करोड़ की लागत से विभिन्न जलाशयों की जल संभरण क्षमता बढ़ाने की योजना बनाई गई है। पैसों की स्वीकृति हो गई है जनप्रतिनिधियों से धरातल में काम कराने की उम्मीद नहीं की जा सकती । कारण साफ है ठेकेदारी और बंदरबांट में प्रत्यक्ष न सही परोक्ष में वह स्वयं शामिल है अब तो यह आलम है ज्यों ज्यों दवा हुई मर्ज बढ़ता ही जा रहा है ।