जागरूकता के बिना बुन्देलखण्ड बन जायेगा मरुस्थल

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ललितपुर- सूखे की विभीषिका से जूझ रहे बुन्देलखण्ड के इस भू भाग में बसने वाले लोगों को जागरूक बनाने के लिए बुन्देलखण्ड भविष्य एकता परिषद द्वारा यात्रा निकाली जा रही है। इस यात्रा में शामिल कार्यकर्ताओं ने जिले में आकर लोगों को पर्यावरण व जल संरक्षण के प्रति जागरूक किया। कार्यकर्ताओं ने कहा कि इस वर्ष बुन्देलखण्ड में सूखा नहीं बल्कि अकाल जैसे हालात है। यदि समय रहते जागरूकता नहीं आयी तो बुन्देलखण्ड भविष्य में मरुस्थल में तब्दील हो जायेगा।

यात्रा प्रमुख पुष्पेन्द्र भाई के अनुसार श्रृंखलाबद्ध आपदाओं के कहर से बदहाल हुए बुन्देलखण्ड क्षेत्र की गहराती समस्याओं के स्थायी समाधान पर आधारित ऐसी योजनाओं की त्वरित आवश्यकता है, जो ग्रामीण, किसान परिवारों के शरीर, श्रम और मानस को ऊर्जावान रख आजीविका के पनप रहे भय, भूख, विपदाओं का शमन कर वर्तमान और भविष्य को संवार सके। बुन्देलखण्ड भविष्य परिषद की यात्रा ग्रामीणों की तकलीफों, चिंताओं और बढ़ती समस्याओं के स्थायी समाधान को सरकारों के कानों तक पहुचाने का माध्यम बनाया जा रहा है, जिससे इस क्षेत्र की जलवायु के मुताबिक परम्परा में प्रमाणित उन विधियों के पुनरुत्थान समयक नीति निर्धारक कर योजनायें बन सकें, जिन्हे अब तक उपेक्षित किया गया। परिषद उन सभी नीतियों, परियोजनाओं और कृषि पर्यावरण, स्वास्थ्य को हानि पहुचाने वाली किसी वस्तु के क्षेत्र प्रवेश पर भी जन सामान्य को विचार विनिमय के लिए सवाल छोड़े है, जिसका जवाब जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों से लेना होगा। बुन्देलखण्ड के वर्तमान और भविष्य को संवारना उनकी ही प्राथमिकता है। उन्होंने बताया कि यह यात्रा चित्रकूट, बादा, महोबा, हमीरपुर, उरई, जालौन, झासी का भ्रमण करती हुई ललितपुर पहुची। इसके अलावा मध्य प्रदेश के दतिया, टीकमगढ़, सागर, छतरपुर, पन्ना, रीवा, सतना आदि क्षेत्रों का भ्रमण कर दिल्ली में जाकर समाप्त होगी जहा प्रधानमंत्री को ज्ञापन सौंपा जायेगा।

उन्होंने बताया कि बुन्देलखण्ड क्षेत्र 1937 से लेकर आज तक 19 बार सूखा और अकाल का ग्रास बन चुका है। जबकि असमय वर्षा, ओला, पाला सहित बाधों के प्रबंधन की खामी से कई बार आपदाओं से हताहत हुआ। बुन्देलखण्ड क्षेत्र में सरकार द्वारा चलायी गयी गरीबी उन्मूलन उद्यमिता विकास, रोजगार सृजन, कुपोषण निवारण, सूखा राहत योजनायें अब तक समस्याओं के निदान पर खरी नहीं उतरीं। परिणामस्वरूप वह भी समस्याओं का हिस्सा बन गयीं। रोजगार गारटी कानून, मिड डे मील, सामुदायिक रसोई, बीपीएल खाद्यान्न, पेंशन योजना लूट का हिस्सा बनकर नाकाम साबित हुई। बैंकों व साहूकारों के कर्जो में फंसे किसान अपना घर, जमीन बेचने को विवश है। कईयों ने तो कर्जदारों से परेशान होकर खुदकुशी कर ली।

एशिया में सर्वाधिक बाधों वाला क्षेत्र होने के बावजूद इस क्षेत्र की नहरे कमाण्ड एरिया की प्यास नहीं बुझा सकतीं। बाधों के निचले इलाके के पारम्परिक जलस्रोत व भूगर्भ जल पर पड़ने वाले प्रभाव से जल संकट बढ़ रहा है। बुन्देलखण्ड के किसानों को लघु, सीमात किसानों को बाटने वाला पैमाना व्यवहार संगत नहीं। इस इलाके की वर्षा जल आश्रित, अति, न्यूनतम बाजारू मूल्य की तुलना पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा सहित अन्य उन क्षेत्रों से नहीं की जा सकती, जिनकी जमीनों का मूल्य और उत्पादन इस क्षेत्र से कई गुना अधिक है। उन्होंने बुद्धिजीवियों से भी सहयोग की अपील की। इस अवसर पर बृजेश सिंह, शिवजीत सिंह, राम किशोर दुबे, संतोष शर्मा, सूरज सिंह, मनमोहन जड़िया, रजनीश चड्डा, मनीष पुरोहित आदि मौजूद थे।