जल दोहन पर नहीं कसी लगाम

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जालौन- बुंदेलखंड सहित कई क्षेत्रों में जमीन फटने की घटनाओं के मद्देनजर शासन ने करीब एक वर्ष पूर्व राजधानी में बड़ी-बड़ी बैठकें कर चिंता जताई थी कि अनियंत्रित भू जल दोहन के कारण ही यह घटनायें घटित हुई है। इस भूजल दोहन क्रिया को रोकने के लिये अधिनियम बनाया जाये लेकिन गंभीरता किस स्तर की थी यह इसी बात से साबित हो जाता है कि इतने दिनों बाद भी कोई कारगर उपाय नहीं किये जा सके है और एक बार फिर जल संकट गहराने लगा है।

जनपद के कई क्षेत्रों में जमीन फटने की घटनायें हुई थी। विशेषज्ञों ने माना था कि अधिक जल दोहन के चलते ही यह घटनायें हुई है तभी जल दोहन पर अधिनियम बनाये जाने की कोशिशें शुरू हो गयी थीं लेकिन आज तक शासन स्तर से जल दोहन रोकने के लिये कोई ठोस निर्देश नहीं आये और न ही प्रशासन ने ही इस ओर कोई कदम उठाये है। बीते वर्ष तीस से चालीस फीट जल स्तर नीचे चला गया था। बावजूद इसके जल दोहन करने वालों पर कोई लगाम नहीं लगाई गयी। जल संरक्षण का काम जल दोहन की अपेक्षा लचर रहा। यहां तक कि जनपद में मैथा खेती को जिसमें बहुत ज्यादा पानी सिंचाई में खर्च होता है प्रशासन स्तर पर हतोत्साहित करने की जरूरत थी लेकिन शासन से लक्ष्य निर्धारित होने के कारण उसको भी रोकने के बजाय प्रोत्साहित करने का काम मौन रह कर किया गया। बीते वर्षो में पशुओं के पीने के पानी को भी मैथा किसानों ने नहीं छोड़ा। जल संस्थान अधिशासी अभियंता एसके वर्मा ने बताया कि जल दोहन रोकने के लिये केवल कवाल टाउन में जवाहर लाल राष्ट्रीय अर्बन रिनूवल मिशन अंतर्गत अधिनियम को मंजूरी के लिये केंद्र को भेजा गया था लेकिन उसे भी आज तक मंजूरी नहीं मिली है तो फिर नगर पालिकाओं तथा नगर निगमों को जल दोहन रोकने का अधिकार मिलना मुश्किल ही है।