चाचा नेहरु को प्यारे बच्चे……………..

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(बाल दिवस पर bundelkhandlive.com का  विशेष )

आज बाल दिवस है और पूरा देश पं.जवाहर लाल नेहरू का जन्म दिवस मना रहा है। एक बार फिर बच्चों के हितों में लम्बे चौडे़ भाषण दिये जाएंगे लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात ही रहेगा।

 आज के बच्चों को कल देश का भविष्य मानकर उनसे प्रेम करने वाले देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं.जवाहर लाल नेहरू ने कभी सपनों में भी नहीं सोचा होगा कि उनके प्रिय बच्चों की कभी देश में ऐसी दुर्दशा व उपेक्षा होगी। देश में बाल श्रम कानून लागू है। इसके बावजूद इसे दुर्भाग्य ही कहेगे कि नन्हे कंधों पर स्वयं का पेट भरने की जिम्मेदारी बनी हुई है। भले ही इस देश के संविधान की बुनियाद 6 से 14 वर्ष के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा देने पर रखी हो, लेकिन आर्थिक संकट के कारण नौनिहालों को स्कूलों में जाकर पढ़ने के बजाय आजीविका चलाने वाले साधनों को अपनाना पड़ता है। हवा में करतब दिखाने वाले बच्चे शौक के लिए अपनी जिंदगी दाव पर नहीं लगाते, वरन इसके पीछे पेट में धधकती भूख की ज्वाला है।

  बाल श्रम कानून के तहत 14 वर्ष तक के बच्चों से श्रम कार्य कराया जाना दण्डनीय अपराध है। इनसे घरेलू कार्य कराना भी प्रतिबंधित है। बावजूद इसके होटलों, ढाबों में जूठन साफ करते, दुकानों में ग्राहकों को सामान देते, कचरे के ढेर से प्लास्टिक व लोहे का सामान बीनते नौनिहाल आसानी से नजर आज आते है। इन बच्चों को सूरज की पहली किरण के साथ ही पेट की आग शात करने की चिंता सताने लगती है। इसके लिए वे ट्रेनों, बसों व सड़कों पर केले, मूंगफली, पानी के पाउच व अखबार बेचने निकल पड़ते है। ऐसे बच्चों की भी कोई कमी नहीं है जो हाथ में पॉलिश की डिब्बी व बु्रश लिए बूट पॉलिस करते दिखाई दे जाते है। होटलों, ढाबों पर चंद पैसों की खातिर जूठन साफ करने वाले छोटू, चवन्नी हीरो, अठन्नी, भैया, पप्पू, मुन्ना हीरो, छुटकू और न जाने ऐसे कितने जाने पहचाने व अनगिनत नाम है जो दिन भर अपने मालिक के इशारे पर इधर से उधर भागते फिरते है।

इसे विडम्बना नहीं तो और क्या कहेगे कि कई बच्चों के कंधों पर स्वयं के अलावा अपने माता-पिता व भाई बहनों का पेट भरने तक की जिम्मेदारी है। जिस उम्र में खेलकूद व धमा चौकड़ी करना बच्चों का स्वाभाविक गुण होता है उस उम्र में उनके कंधों पर परिवार चलाने की जिम्मेदारी है। जिसने उनका बचपन व बाल सुलभ इच्छाओं का दमन तो किया ही है उन्हे समय से पहले जिम्मेदार भी बना दिया है। मासूमियत से भरे जिन बच्चों के कंधों पर स्कूल के बस्ते होना चाहिए आज उस उम्र में वे रोजी-रोटी की खातिर दर-दर की ठोकरे व मालिकों की गाली खाने को मजबूर है। कई बच्चे तो ऐसे है जो पेट की खातिर फैक्ट्रियों में जोखिम भरे कार्य कर रहे है जो दण्डनीय अपराध है। इसके बावजूद सब बेरोकटोक व धड़ल्ले से किया जा रहा है। भले ही इस तकनीकि युग में आर्थिक उपलब्धि के लम्बे चौडे़ दावे किये जा रहे हों, लेकिन फेरी लगाकर चंद पैसों की खातिर गली मोहल्लों व चौराहों पर करतव दिखाने वाले बच्चों के हितों के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाये गए।

केन्द्र सरकार ने 6-14 वर्ष के बच्चों को शिक्षित करने के लिए सर्व शिक्षा अभियान चला रखा है लेकिन गरीबी व भुखमरी इस अभियान के लक्ष्य को पार नहीं करने दे रही है। भले ही बच्चों के पेट की भूख को मिटाने के लिए मध्याह्न भोजन योजना लागू है फिर भी स्कूली बच्चों को मानक के अनुसार भोजन नहीं दिया जा रहा है।

  इस बारे में झाँसी के कुछ नागरिको  का मानना है यदि बाल श्रम कानून का कड़ाई से पालन कराया जाएगा तो कोई व्यक्ति इन्हे अपने यहा काम पर नहीं रखेगा। ऐसे में भले ही यह बाल श्रम कानून का उल्लंघन ही क्यों न हो ये बच्चे ऐनकेन प्रकारेण अपना तथा अपने परिवार का पेट तो पाल रहे है। ये बच्चे फिर बेरोजगार हो जाएंगे। ऐसे में इनका अपराध की ओर मुड़ जाने का भी भय है। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि शासन प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारियों को इन बच्चों के शिक्षा व पुनर्वास के बारे में विचार कर योजनाओं का सही ढग से क्रियान्वयन करना चाहिए ताकि इन बच्चों को भी विकास की मुख्य धारा से जोड़ा जा सके। वास्तव में यदि इन बच्चों के हित में कार्य किये जाएं व योजनाओं का सही ढग से क्रियान्वयन हो तभी बाल दिवस मनाने की सार्थकता सिद्ध होगी।

vikas sharma
9415060119
(bundelkhandlive.com)JHANSI OFFICE

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