खंड-खंड नहीं अखण्ड बुन्देलखण्ड चाहिए

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खंड-खंड नहीं अखण्ड बुन्देलखण्ड चाहिए, जब तक हमें पूरा बुन्देलखण्ड नहीं  मिलता है हमारा संघशZ जारी रहेगा यह बुन्देखण्ड मुक्ति मोर्चा के राश्ट्रीय अध्यक्ष राजा बुन्देला ने बातचीत करते हुए कहीं। छोटे राज्यों का जिन्न बोतल से बाहर निकल आने के बाद राजधानी में पहली धमक को धमाके के साथ करते हुऐ राजाबुन्देला ने मायावती के बुन्देलखण्ड को लेने से इनकार करते हुऐ कहा कि महाराजा छत्रसाल की सीमाओं वाला बुन्देलखण्ड चाहिऐ इस बुन्देलखण्ड में विकास की अपार संभावनाऐं छुपी है हम बदहाल और वेबस बुन्देलखण्डीयों को देश की मुख्य धारा में लाना चाहता है उनके साथ अंग्रेजों ने छल किया तो किया ही भारत सरकार भी छल कर रही है। 1948 में गृहमंत्री सरदार पटेल के साथ एक मसौदे पर बुन्देलखण्ड के 35 राजा-रजवाड़ों के साथ समझौता हुआ था इस समझौते में बुन्देलखण्ड राज्य की सीमा तक तय हो गई थी लेकिन संधिपत्र को आज तक लागू नहीं किया गया है। बुन्देलखण्ड मुक्ति मोर्चा एक जनहित याचिका भी सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की जायेगी।

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श्री बुन्देला ने एक सवाल के जवाब में कहा कि बुन्देलखण्ड के लोग अपने कुल की मार्यादा और प्रतिश्ठा के साथ स्वाभिमान के चलते आज तक ठगे जाते रहे है लेकिन बुन्देलखण्डी अपनी अभिलाशा को मन में पाले है यह अभिलाशा अपने राज्य, स्वराज्य की है। जिसके लिये मुगलों से, अंंग्रेजों से लोहा लेने में बुन्देलखण्ड के लोग कभी पीछे नहीं रहे है। लड़ते-लड़ते देश के लिये अपना सर्वस्व होम करने के बाद आजादी तो हमें मिल गयी लेकिन बुन्देलियों के साथ बहुत बड़ा धोखा उन्हें उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के पिछवाड़े के रूप में बांट कर सारी गंदगी यही उड़ेल दी गयी। जिसके कारण आज बीमारी और बेबस क्षेत्र के रूप में बुन्देलखण्ड जाना जा रहा हैं। खनिज सम्पदा, पुरातत्व सम्पदा से परिपूर्ण इस क्षेत्र में पर्यटन उद्योग के विकास की अपार सम्भावना है। हजारो करोड़ रूपया खनिज रायल्टी के रूप में सरकार को देने वाला यह क्षेत्र खुद अपने विकास के लिये कटोरा लेकर खड़ा होता है। इतनी न इन्साफी तो किसी के साथ नही होती है। हमारा पानी, हमारी बिजली, हमारी मूर्तियॉ, हमारी श्रमशक्ति का दोहन तो हो रहा है लेकिन इसका लाभ हमें नहीं मिल पा रहा है। हमारे बच्चे िशक्षा के अभाव में भटक रहे है। बेरोजगार है उनके सामने अन्धेरा ही अन्धेरा है। बुन्देलखण्ड राज्य बन जाने से हमे अपने विकास का माडल प्रकृतिक और भौगोलिक स्थिति के अनुसार चुनने का मौका मिलेगा। लखनऊ से निर्देश आते है बुन्देलखण्ड में केले की खेती की जाये लेकिन यहॉ पानी नहीं किसान बेचारा क्या करें। लेकिन अनुदान के खेल में कागजों पर केले की खेती होती है और अंगूर उगाये जाते है। यही कुछ हाल सभी सरकारी योजनाओं का है। बदहाल और बेहाल बुन्देलखण्ड के बनने के पीछे सही योजनाअों का न होना है।

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राजनीति का िशकार बुन्देलखण्ड, बुन्देलखण्ड के विकास के नाम पर अलग अलग पार्टियों द्वारा बुन्देलखण्ड का शोशण 63 साल से होेता रहा हैं आजादी की लड़ाई हो या मुगलों से युद्ध हो बुन्देलखण्ड सबसे आगे रहा है आज वही बुन्देलखण्ड अपनी बदहाली, भूखमरी, सूखे और बेरोजगारी के लिये पूरी दुनिया में चर्चित है। विकास की योजनायें तो 63 साल से लगातार बुन्देलखण्ड के नाम पर आती रही पर सरकारों में दूसरे क्षेत्रों का वर्चस्व होने की वजह से इन योजनाओं का लाभ कभी बुन्देलखण्ड को नही मिला, कहॉ आजादी से पहले का बुन्देलखण्ड और कहॉ आज आजादी के बाद का बुन्देलखण्ड, लोगों का मानना है अगर भारत में कोई नरक है तो इस वक्त बुन्देलखण्ड में है। आकड़ों की माने तो 62 प्रतिशत लोग बुन्देलखण्ड से पलायन कर चुके है। बुन्देलखण्ड राज्य की मॉग 1948 से चल रही है। टीकमगढ़ मध्यप्रदेश में मधुकर का बुन्देली राज्य अंक निकालकर पण्डित बनारसी दास चतुर्वेदी ने इस आन्दोलन को एक नहीं दिशा दी थी। जिसे 1960 में बाबू बिन्द्रावन लाल वर्मा, पंडित ब्रजकिशोर पटेरिया तत्कालीन विधायक, डालचन्द जैन, तत्कालीन मंत्री नरेन्द्र सिंह जूदेव ने नेतृत्व किया।  1968 में सागर मध्यप्रदेश में बुन्देलखंड राज्य के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक सम्मेलन तत्कालीन मंत्री नरेन्द्र सिंह जुदेव साहित्यकार डा0 ब‘न्दावनलाल वर्मा विधायक डाल चन्द जैन मध्यप्रदेश के पूर्व ग‘हमंत्री ब‘जकिशोर पटैरिया के नेत‘त्व में हुआ था। इस सम्मेलन में प्रस्ताव पारित करके कहा गया था उदल गरजे दस पुरवा में, दिल्ली में कांपे चौहान को फलित करने के लिए सभी को एक झण्डे के नीचे आना होगा लेकिन भोपाल के राजधानी बनते ही बुन्देलखंड राज्य आन्दोलन को उतनी गति नही मिल पायी जितनी की जरूरत थी लेकिन बुन्देलखंड राज्य के लिए झांसी, ललितपुर, हमीरपुर, बांदा, चित्रकूट, ग्वालियर, छतरपुर, पन्ना, सागर, कभी तेज तो कभी धीमी गति से आन्दोलन चलता रहा है बुन्देलखंड राज्य अन्दोलन के लिए पूर्व सांसद लक्ष्मी नारायण नायक तत्कालीन विधायक देव कुमार यादव, कामता प्रसाद विश्वकर्मा की बुन्देलखंड प्रान्तनिर्माण समिति
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bundelkhand ekikrat party ke sadasyon ne bundelkhand rajya ki mang ke samarthn me shaheed smarak par dia dharna

विधायक तथा अब मंत्री बादशाह सिंह की इन्साफ सेना तथा बुन्देलखंड विकास सेना समय-समय पर राज्य अन्दोलन की मुहिम चलाती रही है। 1989 में ‘ांकर लाल मल्होत्रा के नेत‘त्व में नौगाँव छावनी में बुन्देलखंड मुक्ति मोर्चा के गठन के साथ ही पिछले 17 वशोZ से बुन्देलखंड राज्य के लिए मुहिम तेज हो गई है। फिल्म अभिनेता और कांग्र्रेस के नेता राजा बुन्देला के नेत‘त्व में बुन्देलखंड राज्य के लिए बुन्देलखंड मुक्ति मोर्चा द्वारा चित्रकूट से खजुराहों तक जनजागरण यात्रा 15 अगस्त से शुरू की जा रही है।  तिन्दवारी (बांदा) विधायक विशम्भर प्रसाद निशाद जोश खरोश के साथ बुन्देलखण्ड राज्य का समर्थन विधानसभा के अन्दर और बाहर करते है। वही दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के बुन्देलखंड में सूपड़ा साफ करा चुकी भाजपा न हाँ कह पा रही हैं और न ही न कर पा रही हैं।  खनिज सम्पदा के लिए मशहूर बुन्देलखंड के अकेले पन्ना जनपद से 700 करोड़ रूपये केन्द्र सरकार को और मध्यप्रदेश सरकार को 1400 करोड़ राजस्व के रूप में प्राप्त होते है। राजाबुन्देला कहते है कि  बुन्देलखंड का आमजन बदहाली और बेबसी का शिकार है। सम्पन्न एवं मध्यम वर्ग का किसान कर्ज, टैªक्टर की किश्त, नमक-रोटी न जुटा पाने के कारण आत्महत्या कर रहा है। इधर के समय में सैकड़ों उदाहरण सामने आये है। सम्पन्न एवं मध्यम वर्ग के किसानों की अगर यह हालत है, तो गरीब एवं भूमिहीन परिवारों के हालात क्या होगें, कल्पना की जा सकती हैर्षोर्षो कांग्रेस के झांसी जिलाध्यक्ष सुधांशु त्रिपाठी कहते है बुन्देलखण्ड में सार्वजनिक वितरण प्रणाली पूरी तरह ध्वस्त है। 10-10 वशोZ से अन्त्योदय, बीपीएल कार्ड धारकों को राशन नहीं मिल रहा है। सम्पूर्ण सामग्री कानपुर, वाराणसी आदि के आटा मिलों में समा रही है। बुन्देलखण्ड में `भुखमरी´ की घटनाएं अब आम हो चली हैं। गरीब एवं वंचित वर्ग के लगभग 40 प्रतिशत लोगों का काम की तलाश में पलायन इसका प्रमाण है। बुन्देलखंड साहित्य एवं संस्क‘ति परिशद के राश्ट्रीय अध्यक्ष कैलाश मडवैया कहते है कि बुन्देलखंड को दो भागों में विभाजन करके अंग्रेजों ने इस वीर भूमि के साथ बहुत गहरी साजिश रची थी ताकि अंग्रेजों के छक्के छुड़ा देने वाले लोग कभी ताकतवर न हो सके लेकिन अफसोस है कि आजादी के बाद हमारे अपने ही हमे एक नही होने दे रहे है। जब दुनिया में पूर्वी और पिश्चमी जर्मनी एक हो गयी ऐसे वक्त में बुन्देलखंडवासियों के एक होने का  वक्त आ गया है। अंग्रेजों के पहले भाशायी अध्यन में यह बात निकल कर आई थी कि आठ करोड़ लोग बुन्देलीभाशा बोलते थे लेकिन बुन्देलीभाशा आज तक आठवी अनुसूची में ‘ाामिल नही हो पाई है।

लेकिन समय-समय पर अश्वासन के अलावा कुछ नहीं हासिल हुआ। दो दशक से बुन्देलखण्ड राज्य के मुक्ति मोर्चा मुहिम चला रहा है। इसी मुहिम के तहत 16 दिसम्बर को चित्रकूट से पैदल यात्रा शुरू की है। तो वही दूसरी ओर पूर्वाचंल में अपने राज्य को लेकर लड़ाई छिड़ने की आसार तेज हो गये है।

यूं तो बुंदेलखण्ड क्षेत्र दो राज्यों में विभाजित है-उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश, लेकिन भू-सांस्क‘तिक द‘िश्ट से यह क्षेत्र एक दूसरे से भिन्न रूप से जुड़ हुआ है। रीति रिवाजों, भाशा और विवाह संबंधों ने इस एकता को और भी पक्की नींव पर खड़ा कर दिया है। उत्तर प्रदेश के झांसी, बांदा, हमीरपुर, चित्रकूट, महोबा,ललितपुर और जालौन के अलावा इस क्षेत्र में ग्वालियर, दतिया, भिंड, मुरैना, शिवपुरी, सागर, छतरपुर, टीकमगढ़, अशोकनगर, पन्ना, दमोह, सतना, गुना जैसे जिले भी ‘ाामिल हैं। वैसे बुंदेलखण्ड के अनेक बुद्धिजीवियों का तो मानना है कि इस क्षेत्र के अंतर्गत उत्तर प्रदेश के सात जिले तथा, मध्य प्रदेश के 21 जिले आते हैं। इसी आधार पर कुछ लोगों ने बुंदेलखण्ड राज्य की स्थापना का आंदोलन भी प्रारंभ किया है। यदि कोई इस तर्क से न भी सहमत हो तो भी इस तथ्य से कोई इंकार नही कर सकता है के उत्तर प्रदेश तथा मध्यप्रदेश के योजना आयोग द्वारा घोिशत बुन्देली पिछड़े क्षेत्र को मिला कर बुंदेलखण्ड राज्य गठित किया जा सकता है। कभी अंग्रेजों की कूटनीति का िशकार बना बुन्देलखण्ड खण्ड-खण्ड होकर उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के रहनुमाओं के आगे भीख का कटोरा लेकर खड़ा है। बुन्देलखण्ड वासियों को यह समझ नहीं आ रहा है वह क्या करें। सत्ता की चेरी प्राप्त करते ही बुन्देलखण्ड के तथाकथित जन नेता मंत्री पद के मोह पाश में ऐसे जकड़ जाते है कि अपनी मिट्टी का कर्ज उतारना तक भूल जाते है। भोजपुरी बोलने वाले लालू यादव से लेकर नितीश कुमार को अपनी मात‘ भाशा बोलने में तनिक भी शर्म नहीं आती है लेकिन बुन्देली राजनेता दिल्ली जाते ही अंग्रेजी जुबान बोलने लगते है और अंग्रेजी कल्चर में फसकर यहॉ के बेवस भूखे लोगों से किनारा करने की रणनीति में लग जाते है।

जहां एक ओर लालू प्रसाद की अगुवाई वाला राश्ट्रीय जनता दल पूर्वाचंल राज्य के लिये खड़ा है तो पूर्वाचंल का ध्वज लम्बे समय तक धारण करने वाले शतरूद्र प्रकाश और अजंना प्रकाश की चुप्पी कहीं न कहीं सवालिया निशान खड़ा कर रही है। पूर्वाचंल राज्य की मांग जुझारू नेता विस्वनाथ सिह गहमरी ने देश की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा में उठाकर 60 के दशक में शुरू की थी। लेकिन आवाज को पूरबिया नेताओं ने सत्ता मिलते ही तिलाजंली दे डाली अभिनेता मनोज कुमार तिवारी  और रवि किसन द्वारा पूर्वाचंल राज्य के पक्ष में खड़े होने के बाद पूर्वाचंल में राज्य आन्दोलन एक बार फिर नई ताकत के साथ कुलांचे भरने लगा है। पूर्वाचंल की राजनीति पर लगे माफिया गिरोह का ग्रहण नये राज्य के गठन में सबसे बड़ी बाधा नजर आ रहा है। यहां की जनता अपने अधिकारों के लिये त्राहि -त्राहि कर रही है। लेकिन जगदिम्बका पाल से लेकर मोहन सिंह अलग ही अलाप लगा रहे है। उन्हें अपनी राजनीति के आगे जनता के दुख दर्द समझ नही आ रहे है।  आज का पुरबिया नेता माफिया गिरोहों के मकड़जाल में उलझ गया है। इस समय पूर्वांचल के किसी नेता को क्षमता माफिया गिरोहों से टक्कर लेने की नहीं है और पूर्वाचंल के माफिया गिरोह मुख्यमंत्री के दिशा निर्देश पर सुविधा शुल्क लेकर जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत चरितार्थ कर रहे है। इस स्थिति में कौन बनायेगा पूर्वाचंल राज्य यह यक्ष प्रश्न पूर्वाचंल के सामने खड़ा है। पूर्वाचंल की राजनीति पर माफिया गिरोह इस तरह हावी होते जा रहे है कि स्वच्छ राजनीति के पक्षधर लोगोें की बोलती बंद हो गयी है। कहने को बड़े-बड़े राजनीतिक दावा करने वाले लोग है, लेकिन टुटपूंजजियें माफिया के एक फोन के आगे उनकी बोलती बंद हो जाती है। इस स्थिति में पूर्वाचंल राजय के लिये शहादत देने कोई अपना बेटा नहीं भेजना चाहता। सब पड़ोसी के बेटे को शहीद बनाकर पूर्वांचल का ताज अपने माथे रखने को बेताब है। इस स्थिति में कैसे बनेका पूर्वाचंल राज्य। मुख्यमंत्री झुनझुना थमाने के बजाय यदि विधानसभा में पूर्वाचंल राज्य के लिये प्रस्ताव बनाकर केन्द्र के पास भेजती अथवा राज्य पुनर्गठन आयोग गठन के लिये केंद्र पर दबाव बनाती तो पूर्वाचंल राजय के सपने को साकार होने में देर नहीं लगती।

सुरेन्द्र अग्निहोत्री
लखनऊ

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