कृति- ‘कितने पानी में हैं आप’ , कविता संग्रह, कवि-कैलाष मड़बैया

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kailashसाहित्य्ाकार कैलाश मडबैय्ाा किसी परिचय्ा के मुहताज नहीं हैं। न इनका गद्य किसी परिचय्ा का मुहताज है, न काव्य्ा। रचनाकारों की तो लेखनी ही उनकी पहचान होती है। अभी अभी इनकी जिस कृति का विमोचन मध्यप्रदेष के राज्यपाल ने भोपाल में सम्पन्न बंुदेली समारोह -2012 में किया है, ’कितने पानी में हैं आप‘…का, वह इनकी उन्नीसवीं कृति है। बुंदेली और खडी बोली हिंदी, दोनों में कुल मिलाकर भाई कैलाशजी बहुत कुछ लिख चुके हैं। मुझ्ो य्ाह कहने में जरा भी संकोच नहीं कि य्ादि इन्होंने बुंदेली भाषा को छोड दिय्ाा होता और सिर्फ और सिर्फ हिंदी में साहित्य्ा की सेवा की होती, तो साहित्य्ा के आकाश में इनकी चमक कुछ अलग होती। मगर, बुंदेलखंडिय्ाों की दिक्कत क्य्ाा है…वैसे य्ाह बात सब पर लागू होती है, पर बुंदेलखंडिय्ाों पर ज्य्ाादा…कि हम ऐसे पेड होते हैं कि अपनी जमीन से उखड तो जाते हैं…जहां जाते हैं, वहीं रम जाते हैं…जम जाते हैं…पर हमारी जडें वहीं बनी रहती हैं, जहां के हम होते हैं। इसे य्ादि बाबू वृंदावन लाल वर्मा के शब्दों में कहें….तो अपनी आन, अपनी शान…अपनो पानी, अपनी बानी….य्ो चार चीजें बुंदेलखंडिय्ाों को बहुत प्य्ाारी होती हैं। य्ाह ’बानी‘ के प्रति मडबैय्ााजी का अनुराग ही है कि इन्होंने अपने रचना-कर्म में हिंदी के मुकाबले बुंदेली को ज्य्ाादा नहीं, बल्कि बहुत ज्य्ाादा तवज्जो दी है।

हां, य्ाहां य्ाह जरूर य्ााद रखा जाना चाहिए कि साहित्य्ा की भाषाई सीमाएं नहीं होतीं। क्य्ाा मराठी के साहित्य्ाकार शिवाजी सावंत से हम अपरिचित हैं? क्य्ाा अंतोन चैखब, लिय्ाो टाॅलस्टाय्ा से हम अपरिचित हैं? क्य्ाा हम विलिय्ाम शेक्सपीय्ार को नहीं जानते? ऐसे दर्जनों नाम गिनाए जा सकते हैं, जिनकी भाषाएं हम नहीं जानते, लेकिन साहित्य्ाकारों को हम जानते हैं, उनके रचनाकर्म से हम परिचित हैं, जैसे कि वे हमारे अपने ही हों।….तो कैलाश मडबैय्ााजी से य्ाही कहा जा सकता है कि भैय्ाा! लिखते रहो……लिखते रहो और बताओ कि आपकी बीसवीं कृति कब आने वाली है….?

कहना य्ाह भी है कि ’कितने पानी में हैं आप‘ कविता संग्रह मडबैय्ााजी की बहुत सुंदर कृति है। पढोगे, तो पाओगे कि कृति सचमुच अद्भुत है, प्रारंभ से अंत तक। कवि ने मनुष्य्ा की लाचारगी-बेचारगी को शब्द दिए हैं, जैसे…..पहली कविता में ही कहा गय्ाा है…..मन दौड रहा है, चारों ओर…जिह्वा लपलपाती है, होते ही भोर….कोई काम नहीं होता…राम य्ाा आराम भी नहीं होता…..इस पूरी कविता का सार य्ाह है कि मनुष्य्ा बस भाग रहा है, दिन-रात दौड रहा है, अपने लोभ के लिए प्रकृति का सत्य्ाानाश करने पर उतारू है, लेकिन उसको मिल कुछ नहीं रहा है। काश! समय्ा निकालकर य्ो कविता वे लोग भी पढते, कंक्रीट के जंगल खडे करते जाना ही जिनके लिए विकास है।

कवि के हृदय्ा में इस तथाकथित विकास से उत्पन्न पीडा य्ाहीं खत्म नहीं होती….य्ाह पीडा एक और कविता में बहुत अंदर से व्य्ाक्त हुई है….हृदय्ा की गहराइय्ाों से….लिखा है-कहां गए बऊआ और बब्बा के पीतल के हडा, गुंड और नादें……कांसे के थाल, सोने के गजरा और गाने…बाई को पहनाए दाऊ ने चांदी के लच्छा…इस्तेमाल करीं पीतल की थालीं, लोहे की बाल्टीं…खाय्ाा पीय्ाा अच्छा……..इसके बाद सीधा वर्तमान य्ाुग पर कटाक्ष किय्ाा गय्ाा है और य्ाह कटाक्ष नहीं, हकीकत है। लिखा है-और हमने…चीनी की रंग-बिरंगी प्लेटें…बेंटिक्स के गहने, प्लास्टिक की बाल्टिय्ाां……सचमुच कितना विकास किय्ाा है, हमने।…इस कविता में बुंदेली शब्दों को भी तहेदिल से सम्मान दिय्ाा गय्ाा है और य्ाही कैलाश मडबैय्ाा की पहचान है।

कवि को अपने गांव की भी य्ााद आती है। मैंने कहा था न कि बुंदेलखंडी अपनी माटी को नहीं भूल सकता…..। लिखा है-बहुत य्ााद आती है, अपने गांव की माटी की…..और इसी बहाने कवि अपने बचपन में जा पहुंचते हैं, सोचते हैं कि उनका गांव कैसा था। कविता में य्ाह चिंता भी बार-बार उभरती है कि पता नहीं, अब उनका गांव कैसा होगा। लिखा है-अब तो चारों ओर सडकें बन गई होंगी…आवागमन के साधन बढ गए होंगे…बांणाघाट की बाढ अब अंधेर नहीं मचाती होगी…ऊंचा-सा पुल बन गय्ाा होगा, उस पर। इसी कविता में राजनीति ने देश का जो बंटाढार किय्ाा है, उसका चित्र्ा भी उकेरा गय्ाा है। लिखा है-गांव बंट गय्ाा है, बसपाई, सपाई, भाजपाई उर कांग्रेसिय्ाों में…धर्म के नाम पर धंधे होने लगे हैं, अब गांव बासिय्ाों में…।

हमने पुराना क्य्ाा-क्य्ाा खोय्ाा, इसका वर्णन भी ’कितने पानी में हैं आप‘ में है। लिखा है-अब नहीं बनाते कुम्हार नक्काशी वाले घडे….इस कविता में उस जमाने की पूरी झ्ालक है, जिसको आधुनिक पीढी पुराना जमाना कहती है।…तो एक कविता में खाए-पीए, अघाए हुए लोगों और कुपोषितों की परस्पर तुलना भी की गई है। कहा गय्ाा है-गांव के घूरों के पास, रेंगते हुए बच्चे बडे पेट वाले…बस्तिय्ाों की बडी-बडी दुकानों में, गद्दिय्ाों से टिके सेठ बडे पेट वाले…दोनों ही देश के भाल पर कलंक हैं…एक कुपोषण के कारण, दूसरे शोषण से बढी हुई चरबी के कारण…। य्ाह तुलना रोचक है और भारत की वर्तमान व्य्ावस्था की पोल खोलने वाली भी।

इधर, शब्दों की महिमा से तो हम परिचित हैं ही। कवि ने भी इसका वर्णन किय्ाा है-शब्द आवरण का भाव, शब्द ज्ञान का रूप, शब्द आचरण हृदय्ा का, शब्द ब्रह्म स्वरूप है। और…शब्द कि जिनसे रामाय्ाण, गीता, कुरान सजती हैं। शब्द कि जिनसे जिनवाणी की अमृत ध्वनि रची है। शब्दों में ही पावन पौराणिक परपंरा बची है…। क्य्ाा कवि के इस विचार से कोई असहमत हो सकता है? नहीं, शब्द बहुत महिमावान् हैं, उनकी ताकत अपरंपार है। मडबैय्ााजी की कोई रचना हो और उसमें सावन का जिक्र न हो, भला ऐसा कैसे हो सकता है। लिहाजा, ’कितने पानी में हैं आप‘ में भी सावन का सुहाना मौसम आय्ाा है। लिखा है-य्ाह बादल, य्ाह पवन झ्ाकोरे…जगह-जगह जल भरे कटोरे…हरे खेत, मैदान, मेंड, गैले, गलिय्ाारे, आंगन, दौरे…लेकर आना खुशिय्ाां पाहुन का, मन को बहुत भला लगता है, मौसम सावन का।

मडबैय्ााजी कभी विज्ञान पढाय्ाा करते थे, तो उनकी कविता में इसकी झ्ालक भी मिल ही जाती है। एक कविता में आय्ाा है और य्ाह मुझ्ा जैसे अनीश्वरवादिय्ाों

-नास्तिकों के लिए शाय्ाद एक सीख देने की कोशिश ही है। मगर, दूसरों की दूसरे जानें, मैं नहीं मानूंगा कि ईश्वर का कहीं कोई अस्तित्व है भी। खैर, लिखा है-चलो हम मान लेते हैं कि ईश्वर नहीं है…य्ाह मानने में भी कोई हर्ज नहीं कि प्रकृति में सभी कुछ स्वतः घटित होता है…अब कवि के वे सवाल सुनिए, जो उन्होंने नास्तिकों से पूछे हैं…पर य्ाह कौन तय्ा करता है कि देह एक हो, चेहरे अलग-अलग…हाथ एक हो, पर रेखाएं अलग-अलग…लेखनी एक हो, पर लिखावट अलग-अलग…। भाई साहब! आपके इन सवालों में दम तो है। विचार करूंगा, इन पर।

कविता संग्रह में पयर््ाावरण की चिंता भी समाहित है। लिखा है-नदी पर बन गय्ाा है पुल…तलहटी में बनाय्ाा बांध…घिरता चिमनिय्ाों से बिष…कि पाॅलीथिन से बढती सडांध…। सचमुच पयर््ाावरण का संकट बहुत गंभीर हो गय्ाा है। इसके कारण मौसम के चक्र में बदलाव आ रहा है और चूंकि पयर््ाावरण को बचाने के नाम पर भाषणबाजी ही ज्य्ाादा होती है, य्ाोजनाएं कागजों पर बनती हैं, पर वे जमीन पर नहीं उतरतीं, इसलिए आने वाले समय्ा में मानवता के सामने संकट बढना ही है। तब कोई संवेदनशील व्य्ाक्ति, रचनाकार भला पयर््ाावरण की अनेदखी कैसे कर सकता है? दूसरा संक्रमण समाज के सामूहिक मानसिक प्रदूषण का है। क्य्ाा कोई मानसिक रूप से स्वस्थ्य्ा समाज बेटा और बेटी में फर्क कर सकता है? क्य्ाा कोई समाज इतना पाखंडी हो सकता है कि एक तरफ तो कन्य्ाा

को देवी का स्वरूप मानकर उसकी पूजा करने का दावा करे, तो दूसरी तरफ कन्य्ाा की भ्रूण में ही हत्य्ाा करा दे। जब हम कह रहे हैं कि समाज, तो इसका मतलब य्ाह नहीं है कि हमारे समाज के सभी व्य्ाक्ति इस दुष्कर्म में लिप्त हैं। अनुरोध सिर्फ इतना है कि जब दुष्कर्म हो रहा है, बेटिय्ाां भ्रूण में मारी जा रही हैं और हम कुछ कर नहीं पा रहे हैं, तो कम से कम मैं तो अपने आपको निर्दोष नहीं मानता। कवि ने इस विद्रूपता को भी पूरी शिद्दत से अपनी एक कविता में व्य्ाक्त किय्ाा है। लिखा है-क्य्ाों पुत्र्ा पर अपनी जान छिडकते हैं…पुत्र्ाी को झ्ािडकते और चाहरदीवारी में घेरते हैं…अब तो वह रहे ही न…इसलिए भ्रूण ही कुचलते हैं। मुझ्ो लगता है कि मडबैय्ााजी ने अपनी किताब के लिए जो शीर्षक चुना…’कितने पानी में हैं आप‘ वह बहुत सारगर्भित है। उसमें हर ज्वलंत मसले पर समाज को आईना दिखाने की एक सार्थक कोशिश की गई है।

अब समय्ा को ही लीजिए। हम जानते हैं कि जीवन का एक-एक पल, एक-एक क्षण कीमती है, पर क्य्ाा हम समय्ा की वैसी कद्र करते हैं, जैसी की जानी चाहिए। कवि ने इस संबंध में भी विस्तार से प्रकाश डाला है। लिखा है-हम समय्ा के साथ मिल पाते नहीं क्य्ाों… हम समय्ा के साथ चल पाते नहीं क्य्ाों… हम समय्ा के साथ जब करते मजाक… जब समय्ा करता हमारे साथ, सह पाते नहीं क्य्ाों…। य्ाहां सिर्फ समय्ा का महत्व ही नहीं बताय्ाा गय्ाा है, बल्कि समय्ा को आधार बनाकर अपने विचारों को पवित्र्ा करने का संदेश भी दिय्ाा गय्ाा है। लिखा है-समय्ा के हर प्रहर की अंशिका… व्य्ार्थ में इसको न खोएं… खोंट कर हम खेत खरपतवार बिन जैसे बनाते… ठीक वैसे ही प्रदूषित भावनाओं को विदा कर… जिंदगी रोशन बनाएं…। जब समाज अपने रास्ते से भटक जाता है, तो ऐसा भी होता कि अपात्र्ाों का सम्मान होने लगता है, जबकि सुपात्र्ाों का तिरस्कार। कवि ने इस पीडा को भी व्य्ाक्त किय्ाा है। लिखा है-कैसे, कैसे लोग हो गए… जिन्हें देख अपशकुन हुआ करता था… अब प्रणाम करना पडता है…य्ो पूजा के जोग हो गए… कैसे-कैसे लोग हो गए…। नसीहतें य्ाहीं आकर समाप्त नहीं होंती, बल्कि य्ाह भी लिखा है-बैठकर ऊंगने से नहीं, इधर-उधर सूंघने से नहीं, सोते रहकर सपने देखने से नहीं… काम, करने से होते हैं…। इसी कविता में आजकल के साहित्य्ा के चलन पर भी प्रहार किय्ाा गय्ाा है। लिखा है-काव्य्ा गुनगुनाने से नहीं… तुक मिलाने से नहीं… शब्दों को जोडने से नहीं… विचारों को जीने से रचे जाते हैं…। दरअसल, साहित्य्ा में आजकल कुछ भी हो रहा है। तब उसे देखकर मडबैय्ााजी जैसे सौ टंच शुद्ध्ा साहित्य्ाकार का चिंतित होना लाजिमी है। कवि कहीं-कहीं दार्शनिक भी हो उठे हैं। लिखा है-संसार तो ऐसे ही चलता आय्ाा है… ऐसे ही चल रहा है…और ऐसे ही चलता रहेगा…य्ाह तो तुम्हे सोचना है कि…स्वय्ां कहां खडे हो…। कितना जमीन में गडे हो…और कितना सामने अडे हो…अगला पांव कहां पडेगा…य्ाा वक्त का तमाचा…किस गाल पर पडेगा…। इस कविता में कवि ने साफ संदेश दिय्ाा है कि बस आगे ही बढते रहो, अपनी विफलताओं का दोष दूसरों को न दो।

एक छोटी-सी कविता में कवि ने बुंदेलखंड की तकलीफ का भी वर्णन किय्ाा है। लिखा है-वे सरकारी मदद पहुंचाने से पूर्व सर्वे करने…य्ाानी देखने आए थे गरीबी, पिछडे बुंदेलखंड की… आकलन करने आए थे आर्थिक स्थिति मध्य्ाखंड की…। नहीं गए गांव में, खेत में, खलिहान में… ’होरी‘ से मिले नहीं, होटल से हिले नहीं…कहते रहे आवेदन दे जाओ…मिलकर रहो, प्य्ाार से रहो…देखो तो कितना मालामाल है बुंदेलखंड, आंखे सेंककर पेट भरते रहो…देखकर खजुराहो…। चंद पंक्तिय्ाों में बुंदेलखंड की उपेक्षा का ऐसा वर्णन भाई कैलाश मडबैय्ाा ही कर सकते हैं।

समाज के बदलते हुए मापदंडों पर भी उन्होंने प्रकाश डाला है। लिखा है-अब य्ाह भी गारंटी नहीं कि आप सीधे चलोगे, तो एक्सीडेंट नहीं होगा…क्य्ाोंकि अगर सामने वाला टेढा चलने पर आमादा हो, तो आप कितने ही सीधे चलो, वह तो आप पर चढेगा…। इस कविता में समाज में जो अटपटा होने लगा है, प्राकृतिक निय्ामों के विरुद्ध्ा, उस पर चुटीली शैली में प्रकाश डाला गय्ाा है। लोगों की कथनी और करनी में जो अंतर आय्ाा है, उस पर भी कवि ने रोशनी डाली है। लिखा है-कैसे बेहतर मार्ग पकड लें…पथ पर अपने पांव जकड लें…स्वय्ां भेडिय्ाा चिल्लाता जब…भेडिय्ाा आय्ाा…। आगे लिखा है-सोने वाले जगने का संदेश दे रहे…सभी चोर उपदेश दे रहे…। ’कितने पानी में हैं आप‘ में दीपावली भी आई है। कवि ने दीपावली को प्रतीक बनाकर परस्पर प्रेम बढाने का संदेश दिय्ाा है। लिखा है-दीवाली है अगर, दिलों से आपस में मिल लिय्ाा… जहां अंधेरा देखा, बढकर एक दीय्ाा रख दिय्ाा…।

य्ाह तो हम जानते ही हैं कि मनुष्य्ा गुण और दोषों की खान होता है। न तो कोई इंसान पूरी तरह खराब होता है और न ही पूरी तरह गुणवान। दरअसल, हम सब गुणों और दुर्गुणों के समुच्य्ा हैं। य्ाह बात हम पर निर्भर करती है कि हम अपने दुर्गुणों को प्रोत्साहित करते हैं य्ाा सद्गुणों को। कवि ने अपनी एक कविता में इस पर भी गहराई से प्रकाश डाला है। साथ ही य्ाह संदेश भी दिय्ाा है कि कोई चोर तब तक ही सद्चरित्र्ा माना जाता है, जब तक कि वह पकडा न जाए। लिखा है- सबके भीतर रावण बैठा, सबके भीतर राम… जिसका पकड गय्ाा है रावण, वही हुआ बदनाम…। य्ाहां से आगे बढकर कवि धर्म को परिभाषित करने लगते हैं। लिखा है-धर्म आत्मा का स्वभाव है, निजता का भावार्थ… सडकों के धर्मोत्सव में अकसर होता है स्वार्थ…। इस कविता में बात तो और भी आगे तक गई है, पर उसकी चर्चा ठीक नहीं है। पता नहीं, सुनकर किसकी भावनाएं आहत हो जाएं। आपको एक सुझ्ााव देना चाहूंगा। ’कितने पानी में हैं आप‘ में ’संत ही क्य्ाों हुआ?‘ शीर्षक से एक कविता लिखी गई है। इस कविता को देखकर कवि के साहस को प्रणाम करने का मन करता है।

इस य्ाुग में खरी बात कहने वाले कबीर जैसे लोगों को कौन पूछता है। चलन तो य्ाह चल पडा है कि अगर कहीं से कोई आवाज उठे, तो मुंह बंद करवा दो। सरकारें भी मुंह बंद करवाने का काम करने लगी हैं, तो तथाकथित धर्मगुरु भी इसके अपवाद नहीं रह गए हैं। तब सच बोलने का खतरा उठाना बहुत जोखिम का काम है। बोलने वाले मुंह में लोग नोट ठूंस देते हैं और य्ादि सामने वाला नोटों से भी नहीं मानता है, तो फिर डंडा तो हमारा ऊंचा है ही। इस माहौल में मडबैय्ााजी ने खरी-खरी कहने की हिम्मत जुटाई। य्ाह हिम्मत सराहनीय्ा है।

आप लोग सोच रहे होंगे कि य्ो व्य्ाक्ति किताब की समीक्षा कर रहा है य्ाा कैलाश मडबैय्ाा और उनकी किताब का गुणगान? हर कृति में भाषागत खामिय्ाां होती ही हैं, मगर खामिय्ाों को ढूंढ निकालना जितना आसान है, कुछ लिखना उतना ही कठिन। इसलिए अपन दूरबीन लेकर छेद ढूंढने की संस्कृति पर विश्वास नहीं करते। जो लिखा गय्ाा, वह अद्भुत है और मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि ’कितने पानी में हैं आप‘ न केवल पठनीय्ा है, बल्कि संग्रहणीय्ा भी है।

सुरेन्द्र अग्निहोत्री
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