काश! सहेज लेते कुएं-बावड़ी

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ग्वालियर-काश शहर के कुएं-बावड़ी को सहेज लिया जाता तो शायद पेयजल संकट का सामना नहीं करना पड़ता। नगर निगम भले ही एशियन विकास बैंक की राशि से पेयजल व्यवस्था को सुचारु बनाने का प्रयास कर रहा है, लेकिन उसकी किसी भी योजना में ऐतिहासिक कुएं और बावड़ियों को स्थान नहीं दिया गया है।

महानगर में लगभग दौ सैकड़ा कुएं और बावड़ियां हैं। इसके बाद भी इनका इस्तेमाल पेयजल सप्लाई के लिए नहीं किया जा रहा है। नगर निगम के अधिकारियों की मानें तो महानगर के प्राकृतिक जलस्रोत समय के साथ जर्जर हो गए हैं और रखरखाव के अभाव में इनका पानी या तो सूख गया या पीने के काबिल नहीं रहा।

हालांकि इससे पूर्व भी जब कभी शहर को पेयजल संकट का सामना करना पड़ा तो अधिकारियों ने सबसे पहले प्राकृतिक जल स्रोतों की न सिर्फ समीक्षा की बल्कि इन्हें सहेजने की योजना भी बनाई। इसके बाद भी ये योजनाएं सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गई।

लगभग सात वर्ष पूर्व पानी की कमी के दौरान नगर निगम की जल समिति की 16 जुलाई 2002 की बैठक में शहर के कुएं-बावड़ी की सफाई को लेकर योजना बनाई गई थी। इस दौरान यह भी तय किया गया था कि पेयजल सप्लाई में सक्षम कुएं-बावड़ियों की सफाई कराकर उसमें मोटर पंप डाली जाएं।

नगर निगम द्वारा सात वर्ष पूर्व कराए गए सर्वे में यह बात सामने आई थी कि 55 कुओं पर मोटर पंप लगाकर सप्लाई की जा रही है और 82 ऐसे कुएं बताए गए थे, जिनका इस्तेमाल पेयजल संकट के समय किया जा सकता था। उसके बाद से फिर निगम ने इन कुओं की सुध नहीं ली।

नगर निगम द्वारा पेयजल के लिए संचालित योजनाओं में कुएं-वावड़ी को स्थान नहीं दिया गया है। करीब 210 करोड़ रुपए की एडीबी योजना के साथ शासन को भेजी गई लगभग आठ करोड़ रुपए की सूखा राहत योजना में भी इनके संबंध में कोई प्रावधान नहीं किया गया है।

नगर निगम के अधिकारी भले ही कुएं और बावड़ियों के महत्व को नकारें, लेकिन अभी भी बहोड़ापुर थाने के सामने, घोसीपुरा स्टेशन के पास तथा विनय नगर क्षेत्र में कुएं तथा बावड़ी में मोटर डालकर पानी की सप्लाई की जा रही है।