काला और सफेद ‘हीरा’ नाम से चर्चित यहां के ग्रेनाइट पत्थर की कई खदानें तालाब में बदल गई हैं

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ललितपुर जिले में सरकारें जिन खेतों को करोड़ों रुपये खर्च कर पानी नहीं दे पाई, उन खेतों को कथित तौर से विवादित रहीं पत्थर की खदानें मुफ्त पानी दे रही हैं।

काला और सफेद ‘हीरा’ नाम से चर्चित यहां के ग्रेनाइट पत्थर की कई खदानें तालाब में बदल गई हैं, जिनमें भरा बरसाती पानी पथरीली जमीन पर भारी मशक्कत से उगाई गई गेहूं व मटर की फसल की सिंचाई के काम आ रहा है।

ललितपुर जनपद की किसी सड़क पर खड़े होकर नजर डालें तो चारों तरफ कंकरीली और पथरीली भूमि में गेहूं व मटर की लहलहाती फसल देख ऐसा लगता है कि इस इलाके का किसान कुछ ज्यादा ही खुशहाल होगा, पर यह सच नहीं है। बुंदेलखण्ड में सबसे ज्यादा बांध इसी जिले में हैं, पर नहर या माइनरों के अभाव में फसलों की सिंचाई कर पाना हर किसान के वश की बात नहीं है।

जब सरकारी विभाग पानी देने में नाकाम रहा, तब मुख्यालय से करीब 14 किलोमीटर दूर विकास खंड जखौरा के गांव काला पहाड़, मड़वारी, भरतपुरा और चोंरसिल के सैकड़ों किसानों ने कथित तौर पर विवादित रहीं काला और सफेद ‘हीरा’ नाम से चर्चित पत्थर खदानों की शरण ली।

सियासी परिवार के पूरन सिंह बुंदेला की बुंदेला ग्रेनाइट, मांडा विक्टोरिया ग्रेनाइट लिमिटेड व झांसी के विश्वनाथ शर्मा की पीताम्बरा ग्रेनाइट के नाम की इस इलाके में आधा दर्जन पत्थर की खदानें हैं। पत्थर तोड़ाई से चोहड़ (तालाब) में तब्दील हुईं चार खदानों में बरसाती पानी लबालब भरा हुआ है।

पूरन सिंह बुंदेला की मंदिर वाली खदान में तीन सौ एकड़ भूमि की सिंचाई की क्षमता का पानी भरा है। इस पानी से आस-पास के कई गांवों के किसान निजी पम्पिंगसेट लगाकर मुफ्त में खेत की सिंचाई कर रहे हैं। सिंचाई के संसाधनों की त्रासदी झेल रहे किसान इन खदानों से मिल रहे पानी से बेहद खुश हैं।

किसान राजेश सहरिया बताता है, “पत्थर की ये खदानें जहां अल्प भूमिहीन किसानों को फसल की सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध करा रही हैं, वहीं गरीबों को रोजगार देकर दो वक्त की रोटी भी मुहैया कराती हैं।” इन पत्थर खदानों पर अक्सर नियम के विरुद्ध विस्फोट व अवैध खनन के आरोप लगते रहे हैं। तमाम जांच-पड़ताल के बाद भी खदान मालिकों की राजनीतिक पहुंच के कारण खदानों के आवंटन पर आंच नहीं आई।

इस जिले में सागर बांध के अलावा माताटीला बांध, जामनी बांध, रोहिणी बांध, शहजाद बांध, गोविंद सागर बांध व सजनाम बांध बने हैं। इन बांधों के रखरखाव में सरकार को हर साल करोड़ों रुपये का व्यय भार उठाना पड़ रहा है, फिर भी किसान सरकारी कर्ज लेकर अपने खेतों में कुएं का निर्माण करा या खुदाई से चोहड़ बनी खदानों से सिंचाई के संसाधन जुटाने को मजबूर हैं।

यहां बांधों की अधिकता के बावजूद नहरों का जाल नहीं है। भरतपुरा गांव के ग्राम प्रधान सोबरन सिंह यादव बताते हैं, “इर्द-गिर्द की तकरीबन एक हजार
एकड़ कृषि भूमि की सिंचाई के लिए सिर्फ 35 किलोमीटर दूरी से राजघाट के सागर बांध से देवगढ़ पम्प कैनाल निकली है, लेकिन यह कैनाल इतनी पतली है
कि किसानों को पर्याप्त पानी दे पाने में असक्षम है।”

सिंचाई विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि पूरा इलाका पथरीला है, जमीन के नीचे भी पत्थर की भारी चट्टानें हैं जिससे ट्यूबवेल नहीं लगवाए जा सकते।

पूरन सिंह बुंदेला की मंदिर वाली पत्थर खदान से सिंचाई कर रहे ठेके पर खेती करने वाले दलित किसान हरसिंह अहिरवार बताते हैं, “गांव में मेरे पास खुद की दो एकड़ पथरीली जमीन है, लेकिन मैं यहां ठेके पर खेती करता हूं। पत्थर खदान से पानी न मिले तो लहलहाती फसल सूख जाएगी।”

ग्राम प्रधान सोबरन सिंह यादव कहते हैं कि यहां सिंचाई के जरूरी प्रबंध हो जाएं तो किसान खुशहाल रहें, पर किसी जनप्रतिनिधि ने इस ओर ध्यान नहीं
दिया।

इस चुनाव में आध दर्जन गांवों के किसानों ने सिंचाई संसाधन को चुनावी मुद्दा बनाया है। इसी गांव के किसान तुलसी, आनंद, सीताराम, विनोद, आलम, ओमकार कुछ ऐसे किसान हैं जिनके परिवार की जीविका सिर्फ खेती-किसानी से चलती है। सिंचाई के पुख्ता इंतजाम न होने के कारण वे सरकार से बेहद खफा हैं।

सुरेन्द्र अग्निहोत्री
मो0 9415508695
upnewslive.com