कवि डा. सीता किशोर नहीं रहे

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ग्वालियर प्रतिष्ठित कवि डा. सीता किशोर खरे नहीं रहे। वे 74 वर्ष के थे और कुछ समय से बीमार चल रहे थे। गृह ग्राम सेंवढ़ा में गुरुवार की दोपहर उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन पर शहर के साहित्यकारों ने शोक व्यक्त किया है।

पत्रकार, साहित्यकार राकेश अचल ने शोक व्यक्त करते हुए कहा है कि दद्दा सीताकिशोर खरे ने बुन्देली के साथ-साथ खड़ी बोली में भी रचनाएं कीं। उनके निधन से साहित्य जगत ने बुन्देलखण्ड का दर्द गाने वाला कवि खोया है। कथाकार महेश कटारे ने अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा है कि वे खांटी गांव के रचनाकार थे। वे, न सिर्फ रचनात्मक स्तर पर बल्कि क्रियात्मक स्तर पर भी हमेशा वंचितों के साथ खड़े नजर आते थे।

युवा कवि पवन करण ने कहा है कि डा. सीताकिशोर ग्रामीण संस्कृति के बीच खड़े ऐसे रचनाकार थे, जिनकी कविताओं में प्रगतिशील तत्व समाहित हैं। प्रगतिशील लेखक संघ ग्वालियर जिला इकाई के अध्यक्ष डा. ओमप्रकाश शर्मा के मुताबिक डा. खरे की कविताओं में लोकजीवन की समस्याएं और संवेदनाएं ही नहीं, उसका सौन्दर्य भी समाहित है।

मुकुट बिहारी सरोज स्मृति न्यास की सचिव मान्यता सरोज ने डा. खरे को लोक चेतना और आधुनिकता के समन्वय का कवि बताया है। जनवादी लेखक संघ के जिला सचिव जहीर कुरैशी के मुताबिक डा.खरे प्रगतिशील मूल्यों के गीतकार, दोहाकार थे। रामअवध विश्वकर्मा ,रामसहाय वर्मा, मुस्तफा खान, मलिक रंजीत ने भी डा. खरे के निधन पर शोक व्यक्त किया है।