जल संचयन योजनां के हालात बद से बदतर

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महोबा- चार साल भीषण सूखे से पानी की मारामारी रही।  भूमि संरक्षण इकाइयां हर साल इसके लिए नये प्रोजेक्ट बना भारी बजट की मांग करती हैं। पैसा भी खूब मिलता है पर काम कब और कहां होता है यह नहीं मालूम।अरबों रुपया खर्च हो जाने के बाद भी जल संचयन के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। सरकारों के साथ योजनओं के नाम बदल जाते हैं। जिले में इसके लिए चार कार्यदायी संस्थाओं के लगभग ढाई सौ कर्मचारियों का लंबा चौड़ा अमला है। हर साल करोड़ों रुपये मिट्टी में मिलाये जा रहे हैं। जो सपा सरकार में भूमि सेना योजना थी वह बसपा सरकार में किसान हित योजना हो गयी। यहां इस कार्य के लिए तीनों तहसीलों में भूमि संरक्षण इकाइयों का लंबा चौड़ा अमला है। रामगंगा कमांड नाम से भी एक संस्था यही काम कर रही है। बीते 25 सालों में अनुमान के तौर पर एक अरब रुपया से ज्यादा व्यय किया जा चुका है। बीते तीन वर्ष में ही इन चारों संस्थाओं ने तकरीबन 15 करोड़ रुपया फूंक डाले पर जल संचयन का सपना नहीं पूरा हो सका। कहा जाता है कि इन योजनाओं में जल संचयन के साथ ही भूमि सुधार भी शामिल है। जिन गांवों में 15 साल पहले काम शुरू किया गया था अब भी वहीं चल रहा है। विभागीय लोग कहते हैं मिट्टी का काम है। किसी तरह एक बार बंधी बनाई तो हर बरसात में उसका बहना और फिर अनुरक्षण करना दोनों जरूरी है। यही वजह है कि योजनाओं में तेज प्रगति नहीं दिखाई देती। कुलपहाड़, चरखारी व कबरई क्षेत्र के दर्जनों गांवों से पुरानी बंधियों पर मिट्टी डाल पैसा निकालने की शिकायतें आती रहती हैं।