इस बार भी मुद्दा न बन सकी बुंदेलखंड की बदहाली

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चित्रकूट। आजादी के बाद तीन सदस्यीय राज्य पुनर्गठन आयोग के सदस्य केएम पणिक्कर ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि ‘देश का हृदयस्थल बुंदेलखंड राज्य के रूप में ही जिंदा रह पायेगा’। सन् 1955 में इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद बुंदेलखंड को अलग राज्य बनाये जाने के वादे किये गये पर चौदह लोकसभा चुनाव हो जाने के बाद भी बुंदेलखंड राज्य के रूप में किसी भी दल के लिए मुद्दा नहीं बन सका। यह बात और है कि पिछले दो सालों में ‘बदहाल बुंदेलखंड’ पर केंद्र व प्रदेश सरकार की नजरें इनायत तो हुईं पर महज राजनीतिक रोटियां सेकने को। वीर बुंदेले प्रवंचना के इस दंश से आहत हैं लेकिन आश्चर्यजनक यह है कि उत्तर प्रदेश के 7 जिलों में फैले उक्त अंचल की चार संसदीय सीटों पर कहीं कोई मुद्दा नहीं दिख रहा। जातीय ध्रुवीकरण पूरे चुनावी परिदृश्य पर हावी है।

अल्प वर्षा और एक अंतराल के बाद पूरी तरह अवर्षण बुंदेलखंड में मौसम की फितरत है। इसी के चलते आठवीं शताब्दी में चंदेलकाल में यहां बड़े पैमाने पर तालाब, सरोवर व बाबड़ियां खुदवायी गयीं थीं लेकिन आजादी के बाद शासन, प्रशासन की उपेक्षा से दबंगों और रसूख वालों ने इन संसाधनों पर कब्जा जमा लिया। यहां की प्राकृतिक संपदा का माफियाओं ने भी जबर्दस्त दोहन कर कोढ़ में खाज की हालत पैदा कर दी। पर्यावरण असंतुलन से सूखे का सिलसिला बढ़ गया। आजीविका के वैकल्पिक साधनों के लिए बुंदेलखंड में न विकास कार्यो को पर्याप्त धन दिया गया और न ही सार्थक औद्योगिकीकरण कराया गया। 1986 में झांसी, ललितपुर, जालौन, बांदा और हमीरपुर में जो औद्योगिक आस्थान तैयार कराये गये थे 1993 तक वे उजाड़ हो गये। वजह यह थी कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कच्चा माल आधारित उद्योगों की स्थापना पर ध्यान नहीं दिया गया। बिजली, व्यापार कर व अन्य राहतों और अनुदान के लालच में यहां निवेश हुआ और फायदा उठाकर उद्योगपति चंपत हो गये। नये उद्योग तो पनपे नहीं बांदा की सूती मिल जैसे जमे जमाये उद्योग बंद हो गये। 1996 में झांसी के समीप विकसित औद्योगिक क्षेत्र भी परवान नहीं चढ़ सका। फैक्ट्रियां बंद होने से बेरोजगार हुये कामगारों को कहीं खपाने पर ध्यान नहीं दिया गया। इन परिवारों से बुंदेलखंड में आत्महत्याओं की शुरूआत 1996 से ही हो गयी थी लेकिन 1999 के बाद तो खाते पीते किसान तक बर्बाद होने लगे।

मसूरलैंड कहे जाने वाले उरई, जालौन और कोंच तहसील के गांवों में न ज्यादा पानी की जरूरत होती है, न ही खाद की। इस कारण यहां के किसान खुशहाल थे। पर क्रेडिट कार्ड योजना शुरू होने पर किसानों ने जमकर कर्ज लिया। 4-5 साल तक खेती में घाटा होने से कर्ज चुका नहीं पाने पर जब बैंकों ने जमीन नीलाम कराने की प्रक्रिया शुरू की तो तमाम किसानों ने मौत को गले लगा लिया। उरई के ग्राम गढ़र निवासी 14 एकड़ जमीन के मालिक नारायण दास निरंजन ने इन्हीं कारणों से आत्महत्या की।एक अनुमान के अनुसार 2003 से 2008 के बीच बुंदेलखंड के 500 किसान, मजदूर आत्महत्या या सदमे की वजह से अकाल मौत का निवाला बने। इतना होने के बावजूद शासन प्रशासन ने इसे संज्ञान में नहीं लिया। जब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अखबारों में छपी खबरों के आधार पर प्रदेश सरकार के बड़े अधिकारियों को तलब किया तो सभी पार्टियों के नेता घड़ियाली आंसू बहाते हुये बुंदेलखंड की और दौड़ पड़े।

2008 की शुरूआत में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने सूखे का जायजा लेने के लिये झांसी, जालौन, चित्रकूट और बांदा जिलों के गांवों में हेलीकाप्टर उतारा। झांसी में उत्तर प्रदेश कांग्रेस की कार्य समिति की बैठक के कुछ दिनों बाद राहुल गांधी ने झांसी में कलेक्ट्रेट के सामने प्रतीकात्मक धरना भी दिया। भाजपा ने भी बुंदेलखंड के सभी जिलों में धरना प्रदर्शन किया। सपा सांसदों ने कई बार संसद में बुंदेलखंड के लिए विशेष पैकेज की मांग उठायी। मुख्यमंत्री मायावती ने तात्कालिक राहत के लिए कई घोषणाएं करने के साथ बुंदेलखंड को अलग राज्य पर सहमति जतायी और केंद्र से इस प्रस्ताव को अमली रूप देने की मांग कर डाली। मगर योजना आयोग के अधिकारियों के कई बार सर्वे के बावजूद केंद्र से बुंदेलखंड के लिए विशेष पैकेज नहीं मिल सका। जबकि केंद्रीय वर्षा जल संचय प्राधिकरण के अध्यक्ष और वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. सामरा ने पूरे अध्ययन के बाद 8 हजार करोड़ रुपये के कार्यो का खाका तैयार किया। इसके बावजूद बुंदेलखंड के किसानों के लिए अलग से कर्ज माफी तक नहीं हुयी। केंद्र सरकार ने इस संबंध में जो घोषणा की उसका लाभ भी यहां कुछ ही किसानों को मिला। बुंदेलखंड राज्य बनाने की घोषणा तो पूरी तरह लफ्फाजी साबित हुयी।

प्रदेश सरकार ने जल संचयन के लिए जो योजनाएं शुरू की थी वो भी अधूरी रह गयीं। विशेष पौधरोपण के तहत लगाये गये एक करोड़ पौधों में से अधिकांश देखरेख के अभाव में सूखने की कगार पर है। अप्रैल में जिस तरह से पानी का संकट उभरने लगा है उससे साफ है कि इस बार गर्मियों में स्थिति काफी नाजुक रहेगी। आपदा निवारक मंच के अध्यक्ष रामकृष्ण शुक्ला कहते हैं कि सूखे के मुद्दे पर चुनाव में नेताओं को नहीं घेरा जा रहा यह आश्चर्यजनक है। परमार्थ के संजय सिंह के मुताबिक बुंदेलखंड विकास निधि की स्थापना के बाद भी इस अंचल में अभी तक सड़क, स्कूल और अस्पतालों का निर्माण प्रदेश के औसत से काफी कम है।महोबा मेंकिसानों के अर्धनग्न प्रदर्शन के कारण चर्चित हुये पृथ्वी सिंह यादव कहते हैं कि बुंदेलखंड में सभी किसानों को कर्ज माफी को लाभ मिलना चाहिए था पर यहां सिर्फ लघु और सीमांत किसानों को इसका लाभ मिल सका। बांदा के पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष केके भारती व डा. ओपी सिंह कहते है कि सिंचाई व पेयजल का दीर्घकालिक प्रबंध चुनाव में मुद्दा बनाना चाहिए।

हालांकि सिसोलर क्षेत्र में एसके चक्रवर्ती ने आंदोलन चला रखा है जिसका नारा है वोट वहीं लेगा जो पानी देगा। चित्रकूट में रामलखन द्विवेदी, डा. विनोद कुमार सिंह व उर्मिला जैसे सामाजिक कार्यकर्ता भी इस दिशा में सक्रिय हैं लेकिन यह प्रयास नक्कारखाने में तूती से ज्यादा नहीं है। चारों सीटों पर मतदान के रुख पर मतदाता जातिगत रुझान उलझे दिखते हैं।

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