आज धरती गर्म हो रही है पर्यावरण बचाओ यारो पेड़ लगाओ ……

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(बुंदेलखंड लाइव डट कॉम अभियान पर्यावरण बचाओ)

पर्यावरण को खतरा अब पूरी दुनिया के लिए खतरनाक चुनौती बन गई है। आने वाले सालों में इससे हमारी सुरक्षा एवं स्थायित्व को खतरा पहुंचेगा।
जलवायु परिवर्तन की समस्या हमारी मुख्य चुनौती है और  पिछड़े और सूखा प्रभावित जनपद में पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वाला कोई चर्चित चेहरा जनपद में नहीं है। दो दशक पहले तक वनाच्छादित रहे जिले को पर्यावरण क्षरण की समस्या जैसी कोई बात नहीं थी किंतु आज है। शुद्घ वायु की समस्या स्थायी भाव बन रही है।  लगभग बीस साल पहले तक हरे भरे पेड़ों से खुशहाल था। हवा में जहर नहीं घुल रहा था लिहाजा पर्यावरणीय प्रदूषण की समस्या नहीं थी। पर इधर के वर्षो में हरियाली को कोयले में बदलने सहित दूसरे अन्य कामों में तो झोंका ही गया साथ ही होटल व्यवसाय, ईधन से चलने वाले वाहन आदि बेतरह बढ़े, इन सबने मुंह भर भर के धुंयें सहित दूसरी अन्य रासायनिक गैसें यहां के वातावरण में फेंकना शुरू कर दिया जो आज भी जारी है। यहां का वातावरण लगातार प्रदूषित होता जा रहा है। जंगल खत्म हो रहे है। हरियाली बचाये रखने के प्रयास तो हो रहे है पर उनमें गंभीरता का अभाव है। पर्यावरणीय प्रदूषण को नियंत्रित करने वाली कोई संस्था जनपद में काम नहीं कर रही है। वन विभाग सहित दूसरी अन्य संस्थाओं के काम का हाल बताया ही जा चुका है। जहां खत्म हो रही हरियाली के बाद उसे तैयार करने के प्रति विभागों या संस्थाओं का कार्य संतोषजनक नहीं है वहीं संसाधनों के होते हुए भी काम करने की उपलब्धि यह है  सड़क के किनारे वन विभाग द्वारा कई सालों पहले जो पौधरोपण कराया गया था वह अब पेड़ बन रहे है पर वही, जो बचे है। विभाग ने सौ प्रतिशत काम करने के दावे दर्ज किये है पर तीन गुना से ज्यादा पौधे थलहा सहित गायब हो चुके है। यहीं नहीं सिंचाई और उचित देखभाल के अभाव में पौधरोपण वह भी काम की बानगी पेश कर रहा है। इसी के साथ साफ हो चुके वन क्षेत्र को वह माफिया की करामात है खनन पट्टा-धारकों द्वारा लीज के समय दिये गये शपथ पत्र की धज्जिायां उड़ाते हुये कंप्रेशर मशीनों से आये दिन क्षेत्र की पहाड़ियों का सीना छलनी किया जा रहा है। इसके साथ ही प्रतिबंधित बारूद भरकर पहाड़ों को उड़ाया जा रहा है जिससे क्षेत्र में वायु प्रदूषण के साथ साथ ध्वनि प्रदूषण भी तेजी से बढ़ रहा है। पहाड़ों का अस्तित्व समाप्त होने का खतरा बन गया है। खनन माफिया पहाड़ों को खोखला करने में जुटे हुये हैं।जानकारी के मुताबिक बरगढ़, भरतकूप व मानिकपुर क्षेत्र में दर्जन भर से अधिक अवैध खदान चल रही हैं। खदानों के जितने पट्टे हैं उससे ज्यादा स्थानों पर पत्थरों को निकाले जाने का काम चल रहा है। पाठा क्षेत्र में तो पत्थर की कई खदानें वर्षो से चल रही हैं। यहीं हाल बरगढ़ व भरतकूप क्षेत्र में हैं। भरतकूप इलाके में तो कई जगह ग्रेनाइट की अवैध खदानें चल रही हैं। इन अवैध खदानों से एक तो राजस्व क्षति हो ही रही है वहीं अक्सर असुरक्षित ढंग से खनन होने से मजदूर चुटहिल होते रहते हैं। कई मजदूरों की तो खदानें धंसने से मौत भी हो चुकी है। ज्यादातर खदान चलाने वाले दंबग लोग हैं जिनका वे लोग विरोध भी नही कर पाते हैं।

कांग्रेस के जिलाध्यक्ष पुष्पेन्द्र सिंह कहते हैं प्रदेश में माफिया हावी है। बालू और पत्थर के साथ ही गिट्टी पर तो बिना लिखापढ़ी का कर वसूला जा रहा है। फिर भी कोई बोलने को तैयार ही नही है। मुख्यालय के पास से ही चकला-चकौध के पहाड़ व नदी की बालू का चल रहा खनन इस बात का गवाह है कि जिले में यह व्यवसाय किस ढंग से चल रहा है। वहीं माकपा के रुद्रप्रसाद मिश्र कहते हैं कि अवैध खनन से लाखों रुपये प्रतिमाह का सरकारी नुकसान हो रहा है।  1990-91 में मुख्य मंत्री मुलायम सिंह यादव ने नीलामी प्रक्रिया की घोषणा की जिसका जमकर विरोध हुआ। 1994 में यह प्रक्रिया समाप्त कर दी गयी। 1998 में मुख्य कल्याण सिंह ने नई खनन प्रक्रिया घोषित कर नीलामी प्रक्रिया को बढ़ावा देने का प्रयास किया जिसका विरोध कर स्थानीय लोगों को पट्टा दिये जाने की मांग की गयी। आज खनन कार्य में बाहुबल एवं धनबल हावी हो चुका है। 2007 में लखनऊ के अंबेडकर पार्क में पत्थर लगाये जाने के लिये अहरौरा क्षेत्र की पहाड़ियों के गुलाबी पत्थरों का चयन हुआ उस समय भूतत्व एवं खनिकर्म निदेशक ने स्वयं यहां आकर हाथ से होने वाले खनन कार्य का अवलोकन किया। मजदूरों द्वारा पहाड़ों से निकाले गये बड़े-बड़े पत्थरों को लखनऊ ले जाया गया जो आज भी वहां के पार्को की शोभा बढ़ा रहे है। यहां के गुलाबी पत्थर जो अपनी बेजोड़ चिकनाई एवं मजबूती के चलते नक्कासी कार्य के लिये सर्वाधिक उपयुक्त है आज ब्लास्टिंग के चलते अपना अस्तित्व खोते जा रहे है।


Vikas Sharma
bundelkhandlive.com
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