अस्तित्व बचाने को कराह रहा चंदेली इतिहास

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बेजोड़ नक्काशी और स्थापत्य कला के बेमिसाल नमूने को देख देशी विदेशी पर्यटक भी दांतों तले अंगुली दबा लेते थे। यही कारण था कि एक हजार साल से चंदेली इतिहास के गवाह इस खखरामठ को पुरातत्व विभाग ने एतिहासिक धरोहरों में शामिल कर इसे संरक्षित इमारत घोषित किया। स्थलीय उपेक्षा और कागजी संरक्षण से चंदेली इतिहास का यह अद्वितीय अध्याय अस्तित्व बचाने को कराह रहा है।

सन 1129 में चंदेल शासक मदन वर्मन ने मदन सागर का निर्माण कराया। सरोवर के बीचों बीच खखरामठ नाम से एक बैठक भी बनायी गयी। राजा यहां जल क्रीड़ा अथवा मंत्रियों से विशेष मंत्रणा के लिए बैठा करते थे। ग्रेनाइट शिला खंडों से तराशा गया यह मठ खजुराहो के मंदिरों की तर्ज पर बनाया गया था। बेमिसाल नक्काशी और स्थापत्य कला के संगम से यह इमारत दर्शनीय थी। एक हजार साल तक सीना ताने खड़ा रहा यह मठ चंदेली हुक्मरानो के कला कौशल का जीवन्त नमूना रहा है। पूरी इमारत में शिला खंडों की नक्काशी के जरिये एक दूसरे से इस तरह फंसाया गया कि कही कोई जोड़ नहीं दिखता। कारीगरों की अनोखी कला प्रतिभा के कारण आजाद भारत में इसे पुरातात्विक धरोहर माना गया। इसे संरक्षित इमारतों में शामिल करने के बाद भी विभाग ने कोई ध्यान नहीं दिया। कागजी संरक्षण का परिणाम है कि देशी विदेशी पर्यटकों को आश्चर्यचकित कर देने वाली इस इमारत का आधे से ज्यादा हिस्सा ढह गया है। विज्ञान और तकनीक ने चाहे जितना विकास कर लिया हो फिर भी आज के कारीगर मौके पर पड़े शिलाखंडों को सहेज कर उचित स्थान में लगाने में नाकाम है। बीते पांच वर्षो में लगभग पांच लाख रुपये व्यय करने के बाद भी ढह चुका एक भी पत्थर सही जगह में नहीं लगाया जा सका। इसके क्षरण का क्रम भी लगातार जारी है। इस तरह एक हजार साल तक चंदेली इतिहास का गवाह और महोबा की पहचान से जुड़ा रहा यह मठ अब अपना अस्तित्व बचाने को कराह रहा है।

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