



बूंद-बूंद पानी को तरसता देश कोई लेकिन पानी की राजनीति ने प्रक्रति के इस स्वभाव को भुलाने की अक्षम्य गलती की है। इसलिए लोग बूंद-बूंद पानी के लिए बेहाल है। एक बड़ी गलती हमसे यह हुई कि हमने पानी रोकने के समय सिद्ध और स्वयं सिद्ध तरीकों को पुराना या परम्परागत कहकर छोड़ दिया।
भारत के पास विश्व की 2.45 प्रतिशत् धरती है और लगभग 17 प्रतिशत् आबादी। 1947 में देश के 223 गाव में पानी कम था। अब उनकी संख्या लगभग 90 हजार हो गई है। 90 प्रतिशत् ग्रामीण आबादी गहरे या उथले भूमिगत जल पर निर्भर है। देश की 80 प्रतिशत् आबादी भू-जल का अनियन्त्रण दोहन कर रही है। भारत वर्ष की आबादी दिन भर दिन बढ़ती ही जा रही है। परन्तु पानी के लिए आज तक सटीक कदम नहीं उठाया गया। जिससे आने वाले संकट से बचा जा सके।
हमारा देश कभी तो पानी की मार झेलता है तो कभी पानी की किल्लत को। अगर सही योजनाबद्ध तरीके से नदियों को एक-दूसरे से जोड़ा जाए तो ना पानी की मार और न ही किल्लत का सामना करना पड़ेगा परन्तु हमारे देश के कई राजनीतिज्ञ ही विकास में सबसे बड़ी बाधा डालने वाले है जो काम 2 वर्ष मे पूरा होना चाहिए उसे 4 वर्ष से पहले पूरा होने ही नहीं देते। हमारे देश की विकास दर बहुत धीमी गति से चल रही है। अगर राजनीतिज्ञ विकास में रोड़ा न बने तो यह देश बहुत तेज गति से विकास करे। जिस तरह अन्य देश बहुत तेज गति से विकास कर रहे है। उदाहरणार्थ चीन की विकास दर भारत देश के मुकाबले में बहुत ज्यादा है परन्तु चीन का बहुत सारा भू-भाग लगभग 2/3 भाग जो कि निर्जन है कहने का तात्पर्य है कि वह भाग जहां पर लगभग सारा वर्ष बर्फ पड़ी रहती है जहां पर जीवन व्यतीत करना काफी कठिन है। लेकिन फिर भी चीन अपने विकास का झण्डा फहराये हुए है। पता नहीं कि हमारा देश भ्रष्ट राजनीतिज्ञों की मार कब तक झेलेगा।
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Vikas Sharma
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May 2nd, 2010 at 6:55 am
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