उरई (जालौन)। किसानों को जैट्रोफा की खेती के संबंध में जो सब्जबाग दिखाये गये थे वे फलीभूत नहीं हुये। अधिकांश किसान इसमें गांठ की कमाई गंवाकर परेशान है। सरकार की योजनाओं को भी इसके चलते गहरा धक्का लगा है। कुछ वर्ष पहले उद्यान विभाग ने यह प्रचारित करवाया था कि अगर किसान जैट्रोफा के पेड़ लगायें तो उन्हे आमदनी का स्थायी जरिया मिल सकता है। 30 वर्षो तक वे हर साल बीजों की बिक्री से अच्छी खासी आमदनी बटोरेगे। अनेक प्रगतिशील किसानों ने इस सब्जबाग में फंसकर जैट्रोफा की बागवानी करा ली। नाहिली के मुरली मनोहर त्रिपाठी ने बताया कि उन्होंने एक लाख जैट्रोफा पौधों की नर्सरी बनायी थी पर जब वन विभाग से संपर्क किया तो पौध खरीदने से इंकार कर दिया गया। एक एकड़ खेत में जैट्रोफा पैदा किया था उसके बीज का भी खरीदार नहीं मिला। उद्यान विभाग और वन विभाग से इसकी बिक्री में कोई सहायता नहीं मिली। मड़ोरी के अशोक सिंह ने भी 5 कुंतल जैट्रोफा का बीज बिक न पाने की वजह से बर्बाद करना पड़ा। सिरसा दोगढ़ी के राम मनोहर सिंह ने जब एक एकड़ में जैट्रोफा बोया था तो तत्कालीन जिलाधिकारी तक उनकी पीठ थपथपाने गांव पहुंचे थे। उनकी भी मेहनत और पैसा बर्बाद चला गया। यह भी बताया गया है कि जैट्रोफा का खेत साफ कराने के लिये जेसीबी किराये पर लेनी पड़ती है क्योंकि इसकी जड़ें काफी गहरी होती है। गौरतलब है कि जैट्रोफा के तेल से बायोडीजल बनाने की योजना थी। इसकी जानकारी देने वाले उद्यान विभाग और कृषि विभाग को यह तक मालूम नहीं है कि जैट्रोफा के बीजों की पेराई कहां होती है। इसी तरह की झासेबाजी मूसली की खेती में भी किसानों को झेलनी पड़ी थी।















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